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खंडवा उपचुनाव: जीत हुई पाटिल की मगर फर्क पड़ेगा चौहान-चिटनीस के राजनीतिक भविष्य पर

Tue, 02 Nov 2021 09:12 PM IST
सुभाष कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, खंडवा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, खंडवा Published by: सुभाष कुमार Updated Tue, 02 Nov 2021 09:12 PM IST
सार

खंडवा लोकसभा इसलिए भाजपा के लिए अहम थी क्योंकि इस सीट से लगातार नंदकुमार सिंह चौहान जीते थे। इस कारण भाजपा ने यहां पूरी ताकत झोंकी और नतीजे पक्ष में आए लेकिन यह जीत इतनी आसान नहीं रही क्योंकि कांग्रेस ने मुकाबला एकतरफा नहीं होने दिया।

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Madhya pradesh Patil won in khandwa bypolls but it will make a difference on the political future of Chauhan-Chitnis
भाजपा के ज्ञानेश्वर पाटिल। - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

उपचुनाव हो गए, नतीजे आ गए, भाजपा खुश हुई तो कांग्रेस मायूस। आरोप-प्रत्यारोप हुए, रूठने-मनाने का सिलसिला चला। किसी ने दल बदला तो किसी ने निष्ठा, मगर जनता ने अपना मत देकर अपनी मंशा बता दी। इन उपचुनावों में सबसे ज्यादा चर्चा हुई खंडवा लोकसभा की और इसके परिणामों ने भविष्य के राजनीतिक संकेत भी दिए हैं। 

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दरअसल खंडवा लोकसभा इसलिए भाजपा के लिए अहम थी क्योंकि इस सीट से लगातार नंदकुमार सिंह चौहान जीते थे। इस कारण भाजपा ने यहां पूरी ताकत झोंकी और नतीजे पक्ष में आए लेकिन यह जीत इतनी आसान नहीं रही क्योंकि कांग्रेस ने मुकाबला एकतरफा नहीं होने दिया। भाजपा को वोट प्रतिशत भी घटा तो कुछ विधानसभा क्षेत्रों से भाजपा की लीड कम भी हुई। अपनों के बगावती तेवर भी भाजपा को भुगतने पड़े और जो नेता तीन से पांच लाख की जीत के दावे कर रहे थे उनको भी इस जीत की चमक फीकी लगी। अब चर्चा चल रही है कि आखिर क्या हुआ ऐसा और अब आगे क्या होगा। 
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चौहान की राजनीतिक राह कठिन
भाजपा के ज्ञानेश्वर पाटिल की जीत के बाद अब बात हो रही है नंदकुमार सिंह चौहान की राजनीतिक विरासत की और पूर्व मंत्री अर्चना चिटनीस के राजनीतिक भविष्य की। चौहान के बेटे हर्षवर्धन का टिकट ऐनवक्त पर कटा और इससे उन्हें दुख भी हुआ। यह दुख कई मौकों पर झलका और भाजपा के प्रत्याशी के साथ वे नजर नहीं आए। सीएम, प्रदेशाध्यक्ष व अन्य नेताओं के साथ जरूर मंच साझा किया लेकिन मन में टीस बनी रही। बीच में यह बात सामने आई कि हर्ष चौहान चुनाव में नुकसान कर सकते हैं। 
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संगठन भी इससे चिंतित था और मान मनौव्वल तक की गई। बाद में हर्ष चौहान ने कहा कि वे भाजपा के साथ हैं। कोई नाराजगी नहीं है। इतना कहने के बावजूद मन से वे साथ नहीं दिखे। भीतरघात की आशंका  लगातार बनी रही और शिकायतें भी हुई कि चौहान व समर्थकों ने मेहनत नहीं की। अब जबकि पाटिल सांसद बन गए हैं तो चौहान का राजनीतिक भविष्य फिलहाल उज्जवल नहीं दिख रहा। भाजयुमो की कार्यकारिणी में बतौर सदस्य वे काम कर रहे हैं लेकिन अभी उन्हें लंबा सफर तय करना होगा। 

चिटनीस के रास्ते खुले हुए
खंडवा संसदीय क्षेत्र से दूसरा बड़ा नाम है अर्चना चिटनीस जो मप्र की सरकार में मंत्री रह चुकीं हैं। 2018 के विधानसभा चुनाव में वे हारीं थी और सवाल उठे थे। वे नंदू चौहान के विरोधी गुट की मानी जाती है और इस चुनाव में दावेदारी भी की थी। पाटिल के साथ वे भी पूरे मन से नहीं थीं लेकिन उनको इस बात की राहत थी कि चौहान का टिकट न  हुआ। दूसरा यह भी कहा जा रहा है कि पाटिल आगामी विधानसभा चुनाव में दावेदारी कर सकते हैं, लिहाजा इस चुनाव ने चिटनीस के लिए आगे की राह आसान कर दी है। 

हालांकि सूत्रों का कहना है कि सीएम शिवराज से उनकी पटरी नहीं बैठती इस कारण शिवराज नहीं चाहते थे कि चिटनीस का टिकट हो। यही मूल वजह रही कि चिटनीस और चौहान की लड़ाई के बीच पाटिल टिकट ले आए। कहा जाता है कि चिटनीस की संघ में पकड़ है और शिवराज विरोधी नेताओं से नजदीकियां है इसलिए उनके लिए राजनीतिक रास्ते अभी खुले हुए हैं। आगामी सालों में विधानसभा चुनाव होने हैं और चिटनीस के पास टिकट का मौका है। ऐसे में पाटिल के सांसद बनने से चिटनीस के राजनीतिक जीवन को ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा।


ओबीसी चेहरा बनकर उभरे पाटिल
अब बात करते हैं सांसद ज्ञानेश्वर पाटिल की। पाटिल इस जीत के साथ ही ओबीसी वर्ग के बड़े नेता के रूप में उभरे हैं। बुरहानपुर से लगे महाराष्ट्र में ओबीसी नेता के एनसीपी में जाने के बाद इस क्षेत्र में ओबीसी का बड़ा चेहरा भाजपा के पास नहीं था। खासकर निमाड़-मालवा और महाराष्ट्र के खानदेश में। ऐसे में ज्ञानेश्वर पाटिल के लिए आगे का राजनीतिक सफर अच्छा माना जा रहा है।

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