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संजय गांधी का सबसे करीबी दोस्त रहा ये नेता, आज भी गांधी परिवार करता है भरोसा

Wed, 12 Dec 2018 06:35 PM IST
Trainee Trainee अमित कुमार मंडल, अमर उजाला, नई दिल्ली
अमित कुमार मंडल, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Trainee Trainee Updated Wed, 12 Dec 2018 06:35 PM IST
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madhya pradesh election 2018: Rise of Kamal Nath in Congress
कमलनाथ का सफरनामा

मध्यप्रदेश में कांग्रेस को 15 साल से मिल रही हाल का सिलसिला तोड़ने के लिए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने इस बार जिस शख्स पर दांव खेला वह हैं छिंदवाड़ा से सांसद कमलनाथ। वो शख्स जो कभी संजय गांधी का अभिन्न मित्र रहा, जो हर मुश्किल दौर में गांधी परिवार के साथ खड़ा रहा। कानपुर में जन्मा ये शख्स किस तह मध्यप्रदेश का हो गया इसकी कहानी बेहद दिलचस्प है। गांधी परिवार का बेहद करीबी ये नेता आज मध्यप्रदेश में कांग्रेस की वापसी कराने के लिए पूरा दम लगा रहा है। कमलनाथ इस बार सीएम पद के प्रबल दावेदार भी हैं। कमलनाथ के सफरनामा पर डालते हैं एक नजर।  

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कानपुर में हुआ जन्म 

कमलनाथ का जन्म 18 नवंबर 1946 को उत्तर प्रदेश के कानपुर में एक बिजनेसमैन परिवार में हुआ था। उनकी शुरुआती शिक्षा देहरादून के दून स्कूल में हुई और कोलकाता के सेंट जेवियर कॉलेज से उन्होंने उच्च शिक्षा हासिल की। मध्यप्रदेश से कमलनाथ का गहरा राजनीतिक रिश्ता है। इंदिरा गांधी ने ही उन्हें चुनाव लड़ने के लिए छिंदवाड़ा भेजा था और फिर वह यहीं के होकर रह गए। आज छिंदवाड़ा और कमलनाथ एक दूसरे के पर्याय बन गए हैं।
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गांधी परिवार के करीबी

छिंदवाड़ा से नौ बार सांसद कमलनाथ गांधी परिवार के बेहद करीबी रहे हैं। 70 के दशक में संजय गांधी और कमलनाथ की दोस्ती के चर्चे आम थे। बताया जाता है कि दोनों की दोस्ती दून स्कूल से शुरू हुई थी। इसी दोस्ती ने उन्हें गांधी परिवार के बेहद करीब ला दिया था। संजय गांधी की मौत के बाद भी गांधी परिवार से उनकी करीबी बरकरार रही। मध्यप्रदेश की कमान उनके हाथों में सौंपना इस बात को साबित करता है कि उनपर से गांधी परिवार का भरोसा कायम है। इस बार वह सीएम पद के प्रबल दावेदार हैं।  
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ऐसे हुई राजनीति में एंट्री

उच्च शिक्षा के लिए कमलनाथ देहरादून से कोलकाता चले गए लेकिन संजय गांधी से दिलों की दूरी कम नहीं हुई। वह गांधी परिवार के करीब ही बने रहे। बताया जाता है कि जब कमलनाथ की कंपनी संकट में थी तब इसे उबारने में संजय गांधी ने अहम भूमिका निभाई थी। दोनों की दोस्ती उस दौर में सियासी गलियारों में खूब चर्चित थी। दोनों को हर वक्त साथ ही देखा जाता था। राजीव गांधी राजनीति में आने के इच्छुक नहीं थे, ऐसे में संजय गांधी को कमलनाथ जैसा साथी मिला जो उनके साथ कंधे से कंधा मिला रहा था। 1975 का दौर इंदिरा गांधी और कांग्रेस के लिए बेहद मुश्किल भरा था। संजय गांधी की असमय मौत ने भी इंदिरा गांधी को तोड़ दिया था। कांग्रेस लगातार कमजोर हो रही थी। उसी दौर में उन्होंने कमलनाथ को छिंदवाड़ा की सीट से टिकट देकर राजनीति में उतार दिया।

सिर्फ एक बार चुनाव हारे

कमलनाथ छिंदवाड़ा से शानदार जीत हासिल करते हुए 34 साल की उम्र में लोकसभा पहुंचे। इसके बाद उन्होंने फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। वह पूरी तरह छिंदवाड़ा के हो गए। वह इस सीट से 9 बार जीते, हालांकि 1997 में सिर्फ एक बार उन्हें सुंदरलाल पटवा के हाथों हार मिली। दरअसल, 1996 में हवाला कांड में नाम आने के कारण उनकी जगह उनकी पत्नी पत्नी अलका नाथ को टिकट दिया गया और उन्होंने जीत भी हासिल की। एक साल बाद कोर्ट से क्लीन चिट मिलने के बाद अलका ने इस्तीफा दे दिया और कमलनाथ ने उपचुनाव लड़ा। लेकिन उन्हें सुंदरलाल पटवा के हाथों हार मिली। यही एक मौका था जब उन्हें पहली बार हार का मुंह देखना पड़ा। लेकिन अगले चुनाव में उन्होंने जीत के साथ वापसी की। केंद्रीय मंत्री रहते उन्होंने छिंदवाड़ा में कई काम कराए जिसका प्रतिसाद उन्हें हर बार चुनाव में जीत के रूप में मिला। 2014 में भी उन्होंने तब चुनाव जीता जब कांग्रेस की हालत बेहद बुरी थी और वह महज 44 सीटों पर ही सिमट गई थी।


कांग्रेस सरकार में रहे मंत्री

कमलनाथ ने 1985, 1989, 1991 में लगातार चुनाव जीता। 1991 से 1995 तक उन्होंने नरसिम्हा राव सरकार में पर्यावरण मंत्रालय संभाला। 1995 से 1996 तक वह कपड़ा मंत्री रहे। हवाला कांड में नाम आने की वजह से वह 1996 में चुनाव नहीं लड़ पाए थे। तब पार्टी ने उनकी जगह उनकी पत्नी अलका को टिकट दिया था जिन्हें भारी मतों से जीत भी मिली। एक साल बाद जब वह इस कांड में बरी हुए तो पत्नी अलका ने छिंदवाड़ा की सीट से इस्तीफा दे दिया और कमलनाथ ने दोबारा चुनाव लड़ा। लेकिन वह बीजेपी के सुंदरलाल पटवा से हार गए। लेकिन इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने 1999 से फिर से जीत का सिलसिला कर दिया जो अब तक जारी है।
 

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