एमपी: ओंकारेश्वर में पहली बार बना भारत माता मंदिर, दीपावली पर आरएसएस सरकार्यवाह होसबाले ने किया लोकार्पण
ओंकारेश्वर में नर्मदा तट स्थित मार्कंडेय संन्यास आश्रम में पहली बार भारत माता मंदिर का निर्माण किया गया। दीपावली पर आरएसएस के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने इसका लोकार्पण किया। उन्होंने इसे आध्यात्मिक चेतना और राष्ट्रीय भावना का संगम बताया।
विस्तार
द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रतिष्ठित भगवान ओंकारेश्वर की पावन नगरी में दीपावली के अवसर पर एक नया ऐतिहासिक और सांस्कृतिक अध्याय जुड़ गया। नर्मदा तट स्थित मार्कंडेय संन्यास आश्रम में ओंकारेश्वर का पहला भारत माता मंदिर बनाया गया है। रविवार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने विधिवत लोकार्पण कर मंदिर को श्रद्धालुओं और राष्ट्रभावना से जुड़े लोगों को समर्पित किया।
इस अवसर पर दत्तात्रेय होसबाले ने सबसे पहले ज्योतिर्लिंग भगवान ओंकारेश्वर के दर्शन-पूजन किए। इसके बाद उन्होंने ॐकार पर्वत स्थित आदि गुरु शंकराचार्य की विशाल प्रतिमा के दर्शन किए और नर्मदा तट पर स्थित मार्कंडेय संन्यास आश्रम पहुंचे। यहां दीपावली के पावन अवसर पर नवनिर्मित भारत माता मंदिर का लोकार्पण किया गया।
नर्मदा तट पर आध्यात्मिक चेतना और राष्ट्रीय भावना का संगम
लोकार्पण समारोह को संबोधित करते हुए दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि मां नर्मदा के पावन तट पर भारत माता मंदिर का शुभारंभ होना प्रसन्नता और गौरव का विषय है। यह क्षेत्र आदि गुरु शंकराचार्य की तपस्या, साधना और आध्यात्मिक चेतना से जुड़ा हुआ है। नर्मदा के एक ओर आदि गुरु शंकराचार्य की प्रतिमा और दूसरी ओर भारत माता मंदिर का होना आध्यात्मिक चेतना एवं राष्ट्रीय भावना के अद्भुत संगम का प्रतीक है।
उन्होंने कहा कि भारत की पहचान केवल भौगोलिक सीमाओं से नहीं, बल्कि उसकी हजारों वर्षों पुरानी ऋषि परंपरा, आध्यात्मिक ज्ञान और सांस्कृतिक विरासत से है। भारत ऋषि-मुनियों, ब्रह्मर्षियों और राजर्षियों की भूमि रहा है। यहां के महापुरुषों ने अपने ज्ञान, तपस्या और आध्यात्मिक चेतना से देश ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व को मार्गदर्शन दिया है। होसबाले ने कहा कि भारत माता की रक्षा, सम्मान और स्वतंत्रता के लिए अनेक वीर सपूतों ने अपना जीवन न्योछावर किया। भारत माता के प्रति श्रद्धा केवल भावना नहीं, बल्कि राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों और जिम्मेदारियों का बोध भी कराती है।
वैदिक संस्कृति और राष्ट्रीय एकात्मता का संदेश
आश्रम प्रमुख स्वामी प्रणवानंद सरस्वती ने कहा कि आदि गुरु शंकराचार्य सहित देश के संत-महर्षियों ने वैदिक संस्कृति को नई दिशा प्रदान की। उन्होंने आध्यात्मिक ज्ञान के माध्यम से देश को राजनीतिक, सांस्कृतिक और सामाजिक रूप से एक सूत्र में बांधने का महत्वपूर्ण कार्य किया। भारत की सांस्कृतिक एकता और सनातन परंपरा को सशक्त बनाने में संतों का योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा।
स्वामी प्रणवानंद सरस्वती ने भारत माता मंदिर के निर्माण के लिए मार्कंडेय संन्यास आश्रम का चयन करने पर संघ के पदाधिकारियों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि इस मंदिर के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों में राष्ट्रप्रेम, भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक मूल्यों के प्रति श्रद्धा का भाव मजबूत होगा।
ओंकारेश्वर की धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान में जुड़ा नया अध्याय
भगवान ओंकारेश्वर, मां नर्मदा और आदि गुरु शंकराचार्य की साधना स्थली होने के कारण ओंकारेश्वर का देशभर में विशेष आध्यात्मिक महत्व है। ऐसे में नर्मदा तट पर भारत माता मंदिर का निर्माण नगरी की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान में एक नई कड़ी जोड़ता है। दीपावली पर मंदिर का लोकार्पण आध्यात्मिक आस्था के साथ राष्ट्रभक्ति का संदेश भी लेकर आया। कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के क्षेत्रीय एवं प्रांतीय पदाधिकारी, विभिन्न संत-महात्मा, ओंकारेश्वर के समाज प्रमुख, गणमान्य नागरिक तथा अन्य अतिथि उपस्थित रहे।
