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हाईकोर्ट: न्यायालय के क्षेत्राधिकार पर आदेश पारित होने के बाद नहीं ले सकते आपत्ति, फैमिली कोर्ट का फैसला यथावत
Sun, 04 Oct 2026 08:39 PM IST
जबलपुर ब्यूरो
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जबलपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जबलपुर
Published by: जबलपुर ब्यूरो
Updated Sun, 04 Oct 2026 08:39 PM IST
सार
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने मंडला फैमिली कोर्ट के पत्नी को तीन हजार रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण देने के आदेश को बरकरार रखा। कोर्ट ने कहा कि कार्यवाही के दौरान क्षेत्रीय अधिकारिता पर आपत्ति नहीं उठाने के बाद पुनरीक्षण स्तर पर इसे चुनौती नहीं दी जा सकती। हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।
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मप्र हाईकोर्ट
विस्तार
हाईकोर्ट ने अपने अहम आदेश में कहा है कि आदेश पारित होने के बाद न्यायालय के अधिकार क्षेत्र को चुनौती नहीं दी जा सकती है। हाईकोर्ट जस्टिस डीडी बसंल की एकलपीठ ने सुनवाई के बाद अपील को खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट द्वारा भरण-पोषण के संबंध में पारित आदेश को बरकरार रखा है।
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मंडला फैमिली कोर्ट द्वारा पत्नी के लिए भरण-पोषण की राशि निर्धारित किए जाने के खिलाफ महेश अहिरवार ने हाईकोर्ट में पुनरीक्षण याचिका दायर की थी। याचिका में कहा गया था कि उसका विवाह 7 मई 2017 को अनावेदिका से हुआ था। अनावेदिका पत्नी फरवरी 2018 से अलग रह रही थी। इसके बाद उसकी तरफ से दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत भरण-पोषण की मांग करते हुए फैमिली कोर्ट के समक्ष आवेदन दायर किया गया था। फैमिली कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश ने 3 जनवरी 2020 को पत्नी के पक्ष में फैसला देते हुए तीन हजार रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण की राशि निर्धारित की थी।
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याचिका में कहा गया था कि याचिकाकर्ता व अनावेदक दोनों मंडला जिले के अलग-अलग क्षेत्र के निवासी हैं। ग्राम न्यायालय अधिनियम, 2008 लागू होने के बाद धारा 125 के तहत फैमिली कोर्ट में मामले की सुनवाई करने का क्षेत्राधिकार नहीं था। नियमानुसार मामले की सुनवाई ग्राम न्यायालय के समक्ष होनी चाहिए थी। हाईकोर्ट के निर्देश पर संबंधित न्यायालय द्वारा भेजी गई रिपोर्ट में भी बताया गया है कि दोनों पक्ष तहसील मंडला या नगर पालिका परिषद के क्षेत्र में निवास नहीं करते थे।
एकलपीठ ने सुनवाई के दौरान पाया कि फैमिली कोर्ट में कार्यवाही के दौरान कभी भी क्षेत्रीय अधिकारिता पर आपत्ति नहीं उठाई थी। एकलपीठ ने पूर्व में पारित आदेश का हवाला देते हुए कहा है कि किसी पक्ष को अदालत की क्षेत्रीय अधिकारिता पर आपत्ति है, तो उसे उचित समय पर उठाना चाहिए। पूरी कार्यवाही में हिस्सा लेने के बाद पहली बार पुनरीक्षण के स्तर पर ऐसी आपत्ति को स्वीकार नहीं किया जा सकता है। एकलपीठ ने फैमिली कोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हुए याचिका को खारिज कर दिया।
