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MP High Court: प्राथमिक शिक्षक भर्ती मामले में 45 दिन के भीतर निर्णय लें, पढ़ें हाईकोर्ट की कई बड़ी खबरें
Tue, 17 Dec 2024 10:16 PM IST
अरविंद कुमार
न्यूूज डेस्क, अमर उजाला, जबलपुर
न्यूूज डेस्क, अमर उजाला, जबलपुर
Published by: अरविंद कुमार
Updated Tue, 17 Dec 2024 10:16 PM IST
सार
प्राथमिक शिक्षक भर्ती मामले में 45 दिन के भीतर निर्णय लें। हाईकोर्ट ने निर्देश के साथ याचिका का निराकरण किया। हाईकोर्ट से संबंधित कई बड़ी खबरें एक साथ पढ़ें।
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मध्यप्रदेश हाईकोर्ट, जबलपुर
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के जस्टिस विनय सराफ की एकलपीठ ने एक याचिका का इस निर्देश के साथ पटाक्षेप कर दिया कि याचिकाकर्ता के अभ्यावेदन पर लागू नियमों व विज्ञापन की शर्तों के अनुसार विचार कर निर्णय लें। आयुक्त लोक शिक्षण संचालनालय को इसके लिए 45 दिन की मोहलत दी जाती है। मामला प्राथमिक शिक्षक भर्ती प्रक्रिया से संबंधित था।
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याचिकाकर्ता शहडोल निवासी सविता नामदेव की ओर से कहा गया कि याचिकाकर्ता व्यावसायिक परीक्षा मंडल द्वारा आयोजित परीक्षा में शामिल हुई थी। उसने नियुक्ति के लिए योग्य पाया गया था। इसके बावजूद आज तक नियुक्ति नहीं की गई, जिसे लेकर उसने समय-समय पर अभ्यावेदन प्रस्तुत किए, जिनका निराकरण नहीं किया गया। इसीलिए हाईकोर्ट हाईकोर्ट की शरण ली गई है। याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि उनकी रैंकिंग अच्छी थी। 2022 में उसका नाम चयन सूची से नदारद था। 2023 में भी चयन नहीं किया गया। इस बीच याचिकाकर्ता के बीएड उत्तीर्ण होने को जिला शिक्षा अधिकारी, कटनी द्वारा सत्यापित कर दिया गया था। यह जानकारी प्रस्तुत करने पर भी कोई राहत नहीं दी गई। हाईकोर्ट ने सभी तर्क सुनने के बाद याचिकाकर्ता के हक में राहतकारी आदेश पारित किया।
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पूर्व विधायक किशोर समरीते को राहत
विशेष न्यायिक मजिस्ट्रेट एमपी-एमएलए विश्वेश्वरी मिश्रा की अदालत ने बालाघाट लांजी से समाजवादी पार्टी के पूर्व विधायक किशोर समरीते को राहत प्रदान की है। दरअसल, उन पर भयाक्रांत करने का आरोप लगाया गया था। आरोपी की ओर से कहा गया कि नबंवर 2020 में राजेश पाठक ने पुलिस थाना भरवेली, बालाघाट में शिकायत दर्ज कराई थी, जिसमें आरोप लगाया था कि समरीते ने हटा स्थित कार्यालय में घुसकर कर्मचारी बब्बू सिंह, फूलचंद तिवारी, खेलचंद मसकरे व राजेश पाठक को भयाक्रांत किया।
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हत्या सहित दूसरे अपराध में फंसा देने की धमकी दी। 20 हजार रुपये प्रतिमाह भेजते रहने का दबाव बनाया। लेकिन अभियोजन यह साबित करने में नाकाम रहा है कि घटना के दिन आरोपी वहां उपस्थित था। चूंकि अभियोजन अभियोग को संदेह रहित रूप से सिद्ध नहीं कर सका है, जिससे स्पष्ट है कि आरोप लगाकर पूर्व विधायक समरीते की प्रतिष्ठा को चोट पहुंचाने का नाकाम प्रयास किया गया है। अदालत ने तर्क से सहमत होकर राहत प्रदान कर दी।
मप्र राज्य उपभोक्ता आयोग के चेयरमैन की सेवानिवृत्ति पर रोक निरस्त
मध्यप्रदेश राज्य उपभोक्ता आयोग के चेयरमैन अशोक तिवारी की सेवानिवृत्ति पर लगाई गई रोक को हटाने की मांग करते हुए सरकार की तरफ से आवेदन पेश किया गया। हाईकोर्ट जस्टिस सुरेश कुमार कैत तथा जस्टिस विवेक जैन की युगलपीठ ने सुनवाई के दौरान पाया कि याचिकाकर्ता की तरफ से इंटरवेशन आवेदन प्रस्तुत किया गया था। याचिका पर उक्त जानकारी का उल्लेख नहीं किया गया था। युगलपीठ ने उक्त आदेश के साथ मप्र राज्य उपभोक्ता आयोग के चेयरमैन की सेवानिवृत्ति पर रोक के आदेश को निरस्त कर दिया है।
गौरतलब है कि रोहित दुबे की तरफ से दायर जनहित याचिका में कहा गया था कि सुप्रीम कोर्ट में आयोग के अध्यक्ष व सदस्यों की नियुक्ति के संबंध में याचिका विचाराधीन है। इसी बीच प्रदेश के फोरम और जिलों में गठित आयोग के अध्यक्ष व सदस्यों का कार्यकाल समाप्त हो रहा है या फिर होने वाला है। बिहार, केरल, उत्तर प्रदेश में भी राज्य व जिला उपभोक्ता आयोग के अध्यक्ष, सदस्यों का कार्यकाल सुप्रीम कोर्ट में लंबित याचिका को देखते हुए अंतरिम रूप से बढ़ा दिया गया है। जिला आयोग में हजारों की संख्या में मामले लंबित हैं। आयोग के अध्यक्ष व सदस्यों का कार्यकाल समाप्त हो गया तो सरकार चाहकर भी नई नियुक्ति नहीं कर पाएगी। ऐसे में नए प्रकरण दायर होते चले जाएंगे और पुराने प्रकरणों की सुनवाई भी नहीं हो पाएगी। हाईकोर्ट ने याचिका की सुनवाई करते हुए राज्य व जिला उपभोक्ता आयोग के अध्यक्ष व सदस्य फिलहाल अपने पदों पर बने रहेंगे के आदेश जारी किये थे।
हाईकोर्ट के उक्त आदेश तथा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित आदेश के बावजूद भी मध्यप्रदेश राज्य उपभोक्ता आयोग के चेयरमैन से हटाये जाने को चुनौती देते हुए अशोक तिवारी ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिका में कहा गया था कि 65 वर्ष की आयु पूर्ण करने पर जबरन सेवानिवृत्त कर दिया गया। सुप्रीम कोर्ट और मुंबई हाईकोर्ट के न्याय दृष्टांत के अनुसार आयोग के चेयरमैन व सदस्यों का कार्यकाल 67 वर्ष होना चाहिए। इसलिए याचिकाकर्ता को पद से हटाना न केवल मनमाना है, बल्कि पहले से असंवैधानिक घोषित किए गए नियम-2020 का उल्लंघन भी है। याचिकाकर्ता के स्थान पर अपेक्षाकृत कनिष्ठ को आयोग का प्रभारी बना दिया गया। एकलपीठ ने सरकार की कार्यवाही पर रोक लगा दी थी।
हाईकोर्ट का आदेश पालन नहीं करते हुए मध्यप्रदेश राज्य उपभोक्ता आयोग के चेयरमैन को हटाये जाने के खिलाफ अवमानना आवेदन दायर किया गया था। जिसके बाद युगलपीठ ने दोनों याचिकाओं की संयुक्त रूप से सुनवाई करने के आदेश जारी किये थे। दोनों याचिकाओं पर हाईकोर्ट द्वारा संयुक्त रूप से सुनवाई के निर्देश जारी किये थे। सरकार की तरफ से एकलपीठ द्वारा लगाई गयी रोक हटाने के लिए आवेदन पेश किया गया। जिस पर सुनवाई के बाद युगलपीठ ने याचिकाकर्ता से जवाब मांगा था। सुनवाई के दौरान युगलपीठ ने पाया कि याचिकाकर्ता ने जनहित याचिका में इंटरवेंशन आवेदन प्रस्तुत किया था। उसके द्वारा प्रस्तुत याचिका में उक्त जानकारी छुपाई गयी थी। युगलपीठ ने सेवानिवृत्ति पर लगे रोक के आदेश को निरस्त करते हुए दोनों याचिकाओं पर अगली सुनवाई 10 फरवरी को निर्धारित की है।
भर्ती नियम बदलकर दो दिन में पेश करो रिपोर्ट
मप्र हाईकोर्ट ने हाई स्कूल शिक्षक भर्ती नियमों को चुनौती देने वाले मामले को सख्ती से लिया। चीफ जस्टिस सुरेश कुमार कैत व जस्टिस विवेक जैन की युगलपीठ ने मामले में मंगलवार को हुई सुनवाई दौरान सरकार को निर्देशित किया है वह दो दिन में भर्ती नियम संशोधित कर अपनी रिपोर्ट पेश करे। इसके साथ ही न्यायालय ने रिक्त पदों पर याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति के संबंध में भी जवाब पेश करने करने के निर्देश दिये है, अन्यथा पचास फीसदी से कम अंक वाले सभी उम्मीदवारों की नियुक्तियां निरस्त करके फिर से संशोधित काउंसलिंग कराने के निर्देश दिये है।
उल्लेखनीय है कि यह मामले शिवानी शाह सहित अन्य की ओर से दायर किये गये थे। जिसमें कहा गया था कि स्कूल शिक्षा विभाग तथा जनजाति कार्य विभाग द्वारा 2021 से 2024 तक एनसीटीई के नियमों के विरुद्व लगभग 18 हजार से अधिक हाई स्कूल शिक्षकों की भर्ती की गई हैं। आवेदकों की ओर से कहा गया किडीपीआई ने न्यायालय में शपथ पत्र पेश कर कहा था कि 448 शिक्षकों की स्नातकोत्तर की मार्कशीट में 45 प्रतिशत से अधिक तथा 50 प्रतिशत से कम अंक हैं तथा उनकी अंकसूची में द्वितीय श्रेणी लिखा होने के कारण नियुक्ति दी गई है।
वहीं याचिकाकर्ताओं के अंक 50 प्रतिशत से कम तथा 45 प्रतिशत से अधिक हैं लेकिन उनकी अंकसूची में तृतीय श्रेणी लिखा होने के कारण नियुक्ति नहीं दी गर्इं, जो अवैधानिक है। सुनवाई दौरान आवेदकों की ओर से कहा गया कि 17 हजार से अधिक पदों पर भर्ती का विज्ञापन जारी हुआ था, लेकिन सिर्फ 12 हजार पदों पर ही नियुक्तियां की गर्इं और शेष पद अभी भी रिक्त हैं। सुनवाई पश्चात् न्यायालय ने उक्त निर्देश दिये है। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर ने पक्ष रखा।
जवाब पेश नहीं करने पर विमानन कंपनियां लगेगा जुर्माना
मप्र हाईकोर्ट ने जबलपुर से अन्य बड़े शहरों के लिए एयर कनेक्टिविटी नहीं होने के संबंध में दायर याचिका की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस सुरेश कुमार कैत तथा विवेक जैन की युगलपीठ ने स्पाईस जेट व आकाशा एयरलाइंस द्वारा जवाब पेश नहीं किये जाने को गंभीता से लिया। युगलपीठ ने दोनों विमानन कंपनियों को चेतावनी के साथ अंतिम अवसर प्रदान किया है। युगलपीठ ने कहा है कि अगली सुनवाई पर जवाब नहीं प्रस्तुत करने पर पर उन पर बीस-बीस हजार रुपये का जुर्माना लगाया जायेगा। इसके साथ ही न्यायालय ने इंडिया एक्सप्रेस एयरलाइंस को पक्षकार बनाने के निर्देश देते हुए नोटिस जारी किये है। युगलपीठ ने मामले की अगली सुनवाई 16 जनवरी को निर्धारित की है।
उल्लेखनीय है कि जनहित का मामला नागरिक उपभोक्ता मार्गदर्शक मंच के डॉ. पीजी नाजपांडे व रजत भार्गव की ओर से दायर किया गया है। जिसमें कहा गया है कि जबलपुर में अन्य शहरों की तुलना में कम फ्लाइट हैं। पूर्व में जबलपुर से मुम्बई, पुणे, कोलकाता, बेंगलुरू आदि शहरों के लिए फ्लाइट संचालित होती थी। जबलपुर की एयर कनेक्टिविटी प्रदेश के इंदौर, ग्वालियर तथा भोपाल के सामान थी। लेकिन लगातार फ्लाईट के बंद होने से लोगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। पूर्व में जबलपुर से औसतन 15 फ्लाइट संचालित होती थीं। वर्तमान में घटकर इनकी संख्या 5 हो गयी है। जिससे जबलपुर का विकास अवरुद्ध हो रहा है। उक्त मामले में इंडिगों विमान कंपनी ने अपना जवाब पेश कर दिया था। जबकि अनावेदक स्पाईस जेट व आकाषा एयरलाईंस का जवाब प्रतीक्षित था। मामले में मंगलवार को हुई सुनवाई पश्चात् न्यायालय ने उक्त निर्देश दिये। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता दिनेश उपाध्याय ने पक्ष रखा।
