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MP High Court: पदोन्नति को देरी से चुनौती देने से खत्म होती है समानता, सात साल बाद याचिका दायर करना लापरवाही
Wed, 12 Feb 2025 07:10 PM IST
जबलपुर ब्यूरो
न्यूूज डेस्क, अमर उजाला, जबलपुर
न्यूूज डेस्क, अमर उजाला, जबलपुर
Published by: जबलपुर ब्यूरो
Updated Wed, 12 Feb 2025 07:10 PM IST
सार
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने कहा, पदोन्नति को देरी से चुनौती देने से समानता खत्म होती है। सात साल बाद याचिका दायर करना देरी और लापरवाही है।
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मध्यप्रदेश हाईकोर्ट, जबलपुर
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
पदोन्नति को चुनौती देते हुए सात साल बाद याचिका दायर की गई थी। हाईकोर्ट जस्टिस संजय द्विवेदी की एकलपीठ ने याचिका को खारिज करते हुए अपने आदेश में कहा है कि पदोन्नति को देरी से चुनौती देने से समानता खत्म हो जाती है। अनावेदकों को साल 2014 और 2015 में पदोन्नति प्रदान की गई, जिसे साल 2021 में चुनौती दी गई। याचिका स्पष्ट रूप से देरी और लापरवाही से ग्रस्त है। याचिका पर विचार करना तय स्थिति को अस्थिर करने के बराबर होगा।
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मप्र पुलिस हाउसिंग इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन लिमिटेड में पदस्थ जितेन्द्र कुमार पांडे की तरफ से दायर की गई याचिका में कहा गया था कि वह साल 1984 में उप अभियंता के पद पर पदस्थ हुए था। इसके बाद उसे परियोजना अधीक्षण के पद पर पदोन्नति प्रदान की गई थी। साल 2014 में अधीक्षण यंत्री के लिए विभागीय डीपीसी हुई। डीपीसी में उनसे कनिष्ठ जेपी पस्तोरे का चयन किया गया। इसके बाद साल 2015 में हुई डीपीसी में किशन विधानी का चयन किया गया। डीपीसी में पिछले पांच साल की एसीआर के साथ 13 अंक बेंचमार्क के रूप में थी। इसके बाद उसने विभागीय स्तर पर इस संबंध में जानकारी मिली। उसे बताया गया कि डीपीसी में उसे 12 अंक मिले थे और दोनों चयनित व्यक्तियों को 15 तथा 17 अंक मिले थे। विभाग ने उसे पांच वर्षों के एसीआर की जानकारी प्रदान नहीं की थी।
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इसे चुनौती देते हुए उसने साल 2020 में हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। हाईकोर्ट ने याचिका का निराकरण इस आदेश के साथ किया था कि वह विभागीय स्तर पर अभ्यावेदन प्रस्तुत करे। विभागीय स्तर पर अभ्यावेदन पेश करने पर उसका निराकरण इस आदेश के साथ किया गया कि भविष्य में उसके मामले में सहानुभूतिपूर्वक विचार किया जाएगा, जिसके बाद उसने सूचना के अधिकार के तहत एसीआर की जानकारी प्राप्त की थी। उसे डी ग्रेड दिया गया था और रिमार्क में बहुत अच्छा लिखा गया था। याचिका में कहा गया था कि जब याचिकाकर्ता को एसीआर की जानकारी प्रदान नहीं की गई थी तो नियम अनुसार डीपीसी को उनके एसीआर पर विचार नहीं करना था। युगलपीठ ने सुनवाई के उक्त आदेश के साथ याचिका को खारिज कर दिया। अनावेदक अधिकारियों की तरफ से अधिवक्ता पंकज दुबे ने पैरवी की।
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