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India@75: मध्यभारत के फ्रीडम मूवमेंट का केंद्र था जबलपुर, नेताजी को यहीं आया था फॉरवर्ड ब्लॉक के गठन का विचार
Mon, 15 Aug 2022 07:52 AM IST
अंकिता विश्वकर्मा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जबलपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जबलपुर
Published by: अंकिता विश्वकर्मा
Updated Mon, 15 Aug 2022 07:52 AM IST
सार
India@75: मध्यभारत में फ्रीडम मूवमेंट का केंद्र था जबलपुर, नेताजी को यहीं आया था फॉरवर्ड ब्लॉक के गठन का विचार
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जबलपुर का कमानिया गेट 1939 में कांग्रेस के त्रिपुरी अधिवेशन की याद में बनाया गया था
- फोटो : सोशल मीडिया
मध्यप्रदेश का जबलपुर जिला आजादी के दौर में मध्यभारत के स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन के केंद्र के रूप में जाना जाता था। आजादी के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 की क्रांति में अमर शहीद संग्राम शाह और शंकर शाह ने अपना बलिदान देकर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ जंग का बिगुल फूंका था, उसने गुलाम भारत के बाद के सालों में स्वतंत्रता सेनानियों में आजादी की भूख को पैदा किया। क्रांतिकारी गतिविधियों के चलते ही इस क्षेत्र ने स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े महात्मा गांधी, लोकमान्य गंगाधर और नेताजी सुभाष चंद्र बोस जैसे दिग्गज क्रांतिवीरों को इस धरा पर बार-बार आने के लिए विवश किया। आजादी की दास्ता इस क्षेत्र का जिक्र किए बिना पूरी नहीं हो सकती।
सेंट्रल जेल में मौजूद नेताजी सुभाष चंद्र बोस की शयनपट्टिका
- फोटो : सोशल मीडिया
जबलपुर से है नेताजी सुभाष चंद्र बोस का रिश्ता
जबलपुर में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की कई खास निशानियां मौजूद हैं। आजादी की लड़ाई लड़ते हुए वे यहां कई बार आए और काफी वक्त गुजारा। जबलपुर की सेंट्रल जेल में उनकी स्मृतियों को सहेजकर रखा गया है। जब नेताजी सुभाष चंद्र बोस कांग्रेस के अधिवेशन में शामिल होने जबलपुर पहुंचे थे, तब अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर जबलपुर की सेंट्रल जेल में ही कैद किया था। जेल में आज भी नेताजी की शयनपट्टिका और वो जंजीर मौजूद है, जिससे उन्हें बंधक बनाया गया था। पहली बार नेताजी को इस जेल में छह महीने के लिए कैद किया गया था, वहीं दूसरी बार वे चार दिन यहां कैदी के रूप में रहे। नेताजी पहली बार दिसंबर,1931 में इस जेल में आए थे। 22 दिसंबर, 1931 से 16 जुलाई, 1932 तक यानी 6 महीने 25 दिन यहां रहे। फिर 18 फरवरी, 1933 को उन्हें यहां रखा गया। हालांकि इस बार वे 4 दिन ही रहे और 22 फरवरी को यहां से चले गए। नेताजी सुभाषचंद्र बोस बैरक में आज भी उनके हस्ताक्षर किया गया रजिस्टर, तत्कालीन अंग्रेज जेलर को लिखा गया पत्र मौजूद है। गुलाम भारत और ब्रिटिश हुकूमत की क्रूरता को दर्शाने वाली चक्की और हंटर भी यहां मौजूद हैं। 1874 में अंग्रेजों द्वारा निर्मित इस जेल को नेताजी सुभाष चंद्र बोस केंद्रीय जेल के नाम से जाना जाता है।
जबलपुर में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की कई खास निशानियां मौजूद हैं। आजादी की लड़ाई लड़ते हुए वे यहां कई बार आए और काफी वक्त गुजारा। जबलपुर की सेंट्रल जेल में उनकी स्मृतियों को सहेजकर रखा गया है। जब नेताजी सुभाष चंद्र बोस कांग्रेस के अधिवेशन में शामिल होने जबलपुर पहुंचे थे, तब अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर जबलपुर की सेंट्रल जेल में ही कैद किया था। जेल में आज भी नेताजी की शयनपट्टिका और वो जंजीर मौजूद है, जिससे उन्हें बंधक बनाया गया था। पहली बार नेताजी को इस जेल में छह महीने के लिए कैद किया गया था, वहीं दूसरी बार वे चार दिन यहां कैदी के रूप में रहे। नेताजी पहली बार दिसंबर,1931 में इस जेल में आए थे। 22 दिसंबर, 1931 से 16 जुलाई, 1932 तक यानी 6 महीने 25 दिन यहां रहे। फिर 18 फरवरी, 1933 को उन्हें यहां रखा गया। हालांकि इस बार वे 4 दिन ही रहे और 22 फरवरी को यहां से चले गए। नेताजी सुभाषचंद्र बोस बैरक में आज भी उनके हस्ताक्षर किया गया रजिस्टर, तत्कालीन अंग्रेज जेलर को लिखा गया पत्र मौजूद है। गुलाम भारत और ब्रिटिश हुकूमत की क्रूरता को दर्शाने वाली चक्की और हंटर भी यहां मौजूद हैं। 1874 में अंग्रेजों द्वारा निर्मित इस जेल को नेताजी सुभाष चंद्र बोस केंद्रीय जेल के नाम से जाना जाता है।
तिलवारा स्थित गांधी स्मारक जहां विसर्जन से पहले बापू की अस्थियां रखी गई थीं।
- फोटो : सोशल मीडिया
जबलपुर में हुआ था कांग्रेस का 52 वां अधिवेशन
जबलपुर आजादी की जंग का एक अहम पड़ाव था। महात्मा गांधी स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े आंदोलनों में शामिल होने के लिए यहां चार बार आए थे। बापू के निधन के बाद उनकी अस्थियां तिलवारा घाट के नजदीक जिस स्थान पर रखी गई थीं, वहां आज गांधी स्मारक मौजदू है। 1939 में कांग्रेस का 52वां अधिवेशन जबलपुर जिले के त्रिपुरी में आयोजित किया गया था। ये अधिवेशन इसलिए भी यादगार है क्योंकि इसी में नेताजी सुभाषचंद्र बोस को कांग्रेस का दूसरी बार अध्यक्ष चुना गया था, वहीं उनके अध्यक्ष बनने के बाद उनकी और महात्मा गांधी की राहें अलग-अलग हो गई थीं। कांग्रेस के त्रिपुरी अधिवेशन में नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने महात्मा गांधी के प्रतिनिधि पट्टाभि सीतारमैया को 203 वोटों से हरा कर दूसरी बार कांग्रेस का अध्यक्ष पद हासिल किया था। लेकिन बाद में महात्मा गांधी से मनमुटाव के चलते उन्होंने अध्यक्ष के पद से इस्तीफा दे दिया था। अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने के बाद ही नेताजी ने 1939 में ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक का गठन किया था, कहा जाता है फॉरवर्ड ब्लॉक के गठन का विचार उन्हें जबलपुर में ही आया था।
नेताजी सुभाष चंद्र बोस, महात्मा गांधी के अलावा लोकमान्य गंगाधर तिलक भी जबलपुर में आए थे। जिस स्थान पर तिलक जी ने लोगों को संबोधित किया था उस जगह को आज तिलक भूमि के नाम से जाना जाता है। वहीं, जहां महात्मा गांधी की याद में स्मारक बना है उस जगह पर तिलक जी के आने के चलते उसे तिलवारा के नाम से जाना जाता है।
जबलपुर आजादी की जंग का एक अहम पड़ाव था। महात्मा गांधी स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े आंदोलनों में शामिल होने के लिए यहां चार बार आए थे। बापू के निधन के बाद उनकी अस्थियां तिलवारा घाट के नजदीक जिस स्थान पर रखी गई थीं, वहां आज गांधी स्मारक मौजदू है। 1939 में कांग्रेस का 52वां अधिवेशन जबलपुर जिले के त्रिपुरी में आयोजित किया गया था। ये अधिवेशन इसलिए भी यादगार है क्योंकि इसी में नेताजी सुभाषचंद्र बोस को कांग्रेस का दूसरी बार अध्यक्ष चुना गया था, वहीं उनके अध्यक्ष बनने के बाद उनकी और महात्मा गांधी की राहें अलग-अलग हो गई थीं। कांग्रेस के त्रिपुरी अधिवेशन में नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने महात्मा गांधी के प्रतिनिधि पट्टाभि सीतारमैया को 203 वोटों से हरा कर दूसरी बार कांग्रेस का अध्यक्ष पद हासिल किया था। लेकिन बाद में महात्मा गांधी से मनमुटाव के चलते उन्होंने अध्यक्ष के पद से इस्तीफा दे दिया था। अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने के बाद ही नेताजी ने 1939 में ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक का गठन किया था, कहा जाता है फॉरवर्ड ब्लॉक के गठन का विचार उन्हें जबलपुर में ही आया था।
नेताजी सुभाष चंद्र बोस, महात्मा गांधी के अलावा लोकमान्य गंगाधर तिलक भी जबलपुर में आए थे। जिस स्थान पर तिलक जी ने लोगों को संबोधित किया था उस जगह को आज तिलक भूमि के नाम से जाना जाता है। वहीं, जहां महात्मा गांधी की याद में स्मारक बना है उस जगह पर तिलक जी के आने के चलते उसे तिलवारा के नाम से जाना जाता है।
