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Janmashtami: मजबूती देखने हाथी को घुमाया, तोपों से सलामी; 200 साल पुराने गोपाल और बांके बिहारी मंदिर की कहानी

Sat, 16 Aug 2025 10:18 AM IST
Kamlesh Sen कमलेश सेन
Updated Sat, 16 Aug 2025 10:18 AM IST
सार

Janmashtami 2025: इंदौर के राजवाड़ा के पास स्थित 200 साल पुराने गोपाल और बांके बिहारी मंदिर का निर्माण होल्कर राजघराने की महिलाओं ने कराया था। ये मंदिर इंदौर की ऐतिहासिक और धार्मिक धरोहर हैं। जानिए, क्या है इनकी कहानी...।

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Janmashtami: Indore’s 200-Year-Old Gopal and Banke Bihari Temples Built by Holkar Royal Women
आज मनाई जाएगी जन्मअष्टमी। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव शनिवार को देशभर में धूमधाम से मनाया जाएगा। इंदौर के राजवाड़ा के समीप स्थित दो ऐतिहासिक मंदिरों गोपाल मंदिर और बांके बिहारी मंदिर में जन्माष्टमी पर विशेष अभिषेक और पूजन होंगे। ये मंदिर करीब 200 साल पुराने हैं। इनके निर्माण में होल्कर राजघराने की महिलाओं की प्रमुख भूमिका रही।

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दरअसल, इंदौर के जन्म की कहानी 1725 के बाद से आरंभ हुई है। इंदौर होल्कर रियासत का केंद्र था। मराठा शासकों के क्षेत्र में शिव और देवी के मंदिर अधिक संख्या में मिलते हैं। अन्य देवताओं के मंदिर तो हैं पर कम संख्या में। इनमें से राजवाड़ा के समीप स्थित प्राचीन गोपाल मंदिर और बांके बिहारी मंदिर ऐतिहासिक हैं। 

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उज्जैन में हुई थी कृष्ण की शिक्षा
होल्करों का इंदौर दो ज्योतिर्लिंगों के मध्य में स्थित है। यह भी संयोग है कि प्राचीन उज्जैन नगरी के महर्षि सांदीपनि आश्रम में श्रीकृष्ण, बलराम और सुदामा ने शिक्षा प्राप्त की थी। श्रीकृष्ण ने जब उज्जैन में शिक्षा प्राप्त की थी तब इंदौर तो अस्तित्व में भी नहीं था।

80 हजार में बना था गोपाल मंदिर
इंदौर का गोपाल मंदिर महारानी कृष्णाबाई (मूल नाम  केसरबाई होल्कर) ने 1832 में करीब 80 हजार रुपये की लागत से बनवाया था। यह राशि कृष्णा भाई होल्कर की निजी खासगी की प्राप्त हुई थी। कृष्णाबाई होल्कर महाराजा यशवंत राव प्रथम की उप पत्नी थी। गोपाल मंदिर शुद्ध रूप से लकड़ी का प्रयोग कर निर्मित करवाया था। मंदिर में प्रवेश द्वार के सामने गरुड़ एवं गणेश की मूर्तियां प्रतिष्ठित हैं। द्वार के दोनों ओर विष्णु द्वारपाल एवं चंद्रशिला अलंकृत हैं। मंदिर का बाहरी विन्यास और शिखर नागर शैली से निर्मित हैं। यह मंदिर मूलतः मराठा शैली को दर्शाता है। 


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Janmashtami: Indore’s 200-Year-Old Gopal and Banke Bihari Temples Built by Holkar Royal Women
मंदिरों में होंगे विशेष आयोजन। - फोटो : अमर उजाला

हाथी घुमाकर किया छत का परीक्षण
गोपाल मंदिर निर्माण के वक्त लकड़ी और गर्डर फर्शी का उपयोग किया गया था। तब यह आशंका जताई गई थी कि मंदिर की छत कमजोर नहीं रह जाए। छत की मजबूती के परीक्षण के लिए ठेकेदार ने इस तरह की सीढ़ियां बनाई कि उस पर हाथी को चढ़ा कर उसे घूमाया गया। होल्कर राज परिवार को हाथी के घूमने के बाद संतोष हुआ कि मंदिर मजबूत बना है। मंदिर निर्माण के बाद जन्माष्टमी पर विधिवत प्राण प्रतिष्ठा समारोह आयोजित हुआ। गोपाल मंदिर में राज परिवार के लोग पूजन दर्शन आदि के लिए आया करते थे। गोपाल मंदिर में श्रीकृष्ण जन्म उत्सव का शुभारंभ मध्य रात्रि को पांच तोपों की सलामी से शुरू होता था। करीबन 58,000 वर्ग फीट जमीन पर निर्मित गोपाल मंदिर के एक भाग में अन्न  क्षेत्र भी था। महाराजा यशवंत राव होल्कर ने 1937 में गोपाल मंदिर में हरिजनों के प्रवेश पर प्रतिबंध को समाप्त किया था। स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत गोपाल मंदिर का जीर्णोद्धार और सौंदर्यीकरण भी किया गया है। 

मल्हारराव की पत्नी ने बनवाया बांके बिहारी मंदिर 
इंदौर में होल्कर राज्य के संस्थापक सूबेदार मल्हारराव  होल्कर ने जब राजवाड़ा बनाने का निर्णय लिया, उसी समय उनकी पत्नी हरकू बाई (अहिल्या बाई की सास) ने जो भगवान कृष्ण की उपासक थीं और महानुभाव पंथ की अनुयायी थीं, ने बांके बिहारी मंदिर का निर्माण करवाया। इस मंदिर में स्थापित श्रीकृष्ण का विग्रह वृंदावन में बने बांके बिहारी मंदिर में स्थापित विग्रह की तरह होने के कारण सूबेदार मल्हारराव होल्कर ने इस मंदिर का नाम बांके बिहारी मंदिर रख दिया। 

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यहां कृष्ण के साथ दत्तात्रेय का भी विग्रह
इस दो मंजिला बांके बिहारी मंदिर में श्रीकृष्ण के तीन विग्रह के साथ भगवान दत्तात्रेय का भी विग्रह है तथा यहां श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की तरह दत्तात्रेय जयंती भी मनाई जाती है। मंदिर की पूजा में मंदिर में पंच अवतार श्रीकृष्ण, दत्तात्रेय, चक्रपाणि महाराज, चक्रधर महाराज, गोविंद प्रभु की पूजा होती है।   

क्या है महानुभाव पंथ 
देश में सर्वाधिक समाज सुधारक संत महराष्ट्र में हुए। इसी तरह महानुभाव पंथ का जन्म भी महाराष्ट्र  में हुआ था। इस पंथ के प्रमुख चक्रधर स्वामी थे। वे एक समाज सुधारक थे। इस पंथ में कृष्ण को ही महत्व दिया गया है। यह जाति प्रथा का विरोधी था। राज परिवार की महिलाएं भी महाराष्ट्र से जुड़ी थीं, इसलिए वे भी महानुभाव पंथ की अनुयायी थीं।

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