Exclusive News एक्सक्लूसिव खबरें
Free E-Paper फ्री में ई-पेपर पढ़ें
ऐप डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Madhya Pradesh ›   Indore News ›   Indore: High Court Quashes FIR Against Student for Joining Protest Against FIR Targeting Tribals

इंदौर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: मेधावी छात्र के खिलाफ दर्ज एफआईआर और चार्जशीट रद्द, मामला खारिज

Wed, 04 Nov 2026 09:59 AM IST
प्रिया वर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, इंदौर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, इंदौर Published by: प्रिया वर्मा Updated Wed, 04 Nov 2026 09:59 AM IST
सार

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर पीठ ने आदिवासी युवाओं के प्रदर्शन में शामिल छात्र के खिलाफ दर्ज एफआईआर रद्द कर दी है। कोर्ट ने कहा कि संबंधित लोक सेवक की लिखित शिकायत के बिना BNS की धारा 223 के तहत संज्ञान नहीं लिया जा सकता।

विज्ञापन
Indore: High Court Quashes FIR Against Student for Joining Protest Against FIR Targeting Tribals
मप्र हाईकोर्ट - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ ने एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए आदिवासी युवाओं के प्रदर्शन मामले में याचिकाकर्ता के विरुद्ध दर्ज प्राथमिकी, आरोप पत्र और निचली अदालत द्वारा लिए गए संज्ञान को रद्द कर दिया है। न्यायमूर्ति पवन कुमार द्विवेदी की एकल पीठ ने आदेश में स्पष्ट किया कि संबंधित लोक सेवक की लिखित शिकायत के बिना भारतीय न्याय संहिता की धारा 223 के तहत अदालत संज्ञान नहीं ले सकती।

विज्ञापन


अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता बारहवीं कक्षा में पांच में से चार विषयों में विशेष योग्यता प्राप्त मेधावी छात्र है। केवल इसलिए कि वह आदिवासी समुदाय के सदस्यों पर दर्ज प्राथमिकी के विरोध में छह अन्य लोगों के साथ प्रदर्शन में शामिल हुआ, उसका पूरा कॅरिअर आपराधिक प्रक्रिया में उलझाकर खराब नहीं किया जा सकता।
विज्ञापन


बिना लिखित शिकायत दर्ज एफआईआर रद्द
यह मामला बड़वानी जिले के पलसूद थाने से जुड़ा है। पुलिस ने 30 जून 2024 को आदिवासी समुदाय के कुछ सदस्यों पर प्राथमिकी दर्ज की थी। इसके विरोध में जय आदिवासी युवा शक्ति के कार्यकर्ताओं ने 6 जुलाई 2024 को पलसूद थाने में प्राथमिकी निरस्त करने के लिए आवेदन दिया था। इस दौरान सुमेर सिंह, सीमा, विक्रम, तुकाराम, कमल, अनिल और राजेश अचालिया सहित सात लोग बैनर लेकर पहुंचे और नारेबाजी की। 
विज्ञापन
विज्ञापन


पुलिस का दावा था कि राजपुर के उपविभागीय अधिकारी से जुलूस और प्रदर्शन की अनुमति नहीं ली गई थी। जिला दंडाधिकारी द्वारा 7 जून 2024 को धारा 144 के तहत जारी आदेश के उल्लंघन के आरोप में सातों लोगों के खिलाफ बीएनएस की धारा 223 के अंतर्गत मामला दर्ज किया गया। जांच के बाद पुलिस ने आरोप पत्र में बीएनएस की धारा 126(2) भी जोड़ दी, जिसमें आरोप लगाया गया कि प्रदर्शनकारियों के एकत्र होने से पुलिसकर्मियों के शासकीय कार्य में बाधा पहुंची। निचली अदालत ने 16 दिसंबर 2024 को संज्ञान लिया था।

ये भी पढ़ें: भोपाल में सफाई व्यवस्था ठप: बाजारों से नहीं उठा कचरा, क्या दिवाली पर शहर को मिलेगी गंदगी से राहत?

घटनास्थल के नक्शे और नजीर से खुली पोल
याचिकाकर्ता राजेश अचालिया की ओर से अधिवक्ता पर्व बिरला ने तर्क रखा कि बीएनएस की धारा 223 के मामलों में बीएनएसएस की धारा 215 के अनुसार संबंधित लोक सेवक या उसके वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी की लिखित शिकायत अनिवार्य है। जिला दंडाधिकारी की ओर से ऐसी कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई गई थी और पुलिस ने स्वयं प्राथमिकी दर्ज कर ली। उच्च न्यायालय ने इस तर्क को स्वीकार किया और कहा कि बीएनएसएस की धारा 215 के तहत धारा 206 से 223 तक के अपराधों में लिखित शिकायत के बिना संज्ञान संभव नहीं है।


अदालत ने स्पष्ट किया कि धारा 223 और धारा 126(2) के आरोप एक ही घटना से जुड़े हैं, इसलिए इन्हें अलग-अलग करके कार्रवाई नहीं हो सकती। उच्चतम न्यायालय के देवेंद्र कुमार मामले का हवाला देते हुए न्यायालय ने कहा कि लिखित शिकायत की बाध्यता से बचने के लिए एक ही घटना के अपराधों को पृथक नहीं किया जा सकता। इसके अलावा जांच एजेंसी द्वारा 8 जुलाई 2024 को तैयार अपराध विवरण फॉर्म और घटनास्थल का नक्शा देखने पर पाया गया कि प्रदर्शनकारी थाना भवन से कुछ दूरी पर खड़े थे। इससे शासकीय कार्य में बाधा पहुंचाने का आरोप भी गलत साबित हुआ।

मेधावी छात्र के उज्ज्वल भविष्य की रक्षा
उच्च न्यायालय ने आदेश में याचिकाकर्ता की शैक्षणिक उपलब्धियों का विशेष रूप से उल्लेख किया। राजेश अचालिया ने बारहवीं कक्षा में पांच में से चार विषयों में और दसवीं कक्षा में दो विषयों में विशेष स्थान हासिल किया है। उसने डिप्लोमा इन एलीमेंट्री एजुकेशन पूरा किया है और प्राथमिक शिक्षक चयन परीक्षा भी उत्तीर्ण की है। न्यायमूर्ति ने माना कि ऐसे प्रतिभाशाली और मेधावी छात्र को महज विरोध प्रदर्शन का हिस्सा बनने के कारण अनावश्यक रूप से आपराधिक कार्रवाई में नहीं घसीटा जाना चाहिए। न्यायालय ने याचिकाकर्ता की याचिका स्वीकार करते हुए 16 दिसंबर, 2024 के संज्ञान आदेश, पलसूद थाने में दर्ज प्राथमिकी तथा उसके आधार पर प्रस्तुत आरोप पत्र को निरस्त कर दिया है।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed