फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Madhya Pradesh ›   High Court verdict on 72-year-old Ramola temple dispute Lord Ram declared the owner of the properties

एमपी: रामोला मंदिर के 72 साल पुराने विवाद पर हाईकोर्ट का फैसला, भगवान श्रीराम को माना संपत्तियों का मालिक

Wed, 26 Aug 2026 07:56 PM IST
शबाहत हुसैन न्यूज डेस्क, अमर उजाला, इंदौर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, इंदौर Published by: शबाहत हुसैन Updated Wed, 26 Aug 2026 07:56 PM IST
सार

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने खाचरौद के रामोला मंदिर के 72 साल पुराने विवाद पर फैसला सुनाते हुए मंदिर और करीब 100 करोड़ की संपत्तियों का वास्तविक स्वामी भगवान श्रीराम को माना। उज्जैन कलेक्टर प्रबंधक होंगे और पुजारी रतनदास की नियुक्ति वैध मानी गई।

 

विज्ञापन
High Court verdict on 72-year-old Ramola temple dispute Lord Ram declared the owner of the properties
72 साल पुराना रामोला मंदिर विवाद खत्म - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ ने उज्जैन जिले के खाचरौद स्थित ऐतिहासिक रामोला मंदिर और उससे जुड़ी करीब 100 करोड़ रुपये की संपत्तियों के 72 साल पुराने विवाद पर बड़ा फैसला सुनाया है। न्यायमूर्ति विनय सराफ ने जिला अदालत के पुराने फैसले को निरस्त करते हुए कहा कि मंदिर और उसकी सभी संपत्तियों के वास्तविक स्वामी भगवान श्रीराम हैं। अदालत ने अयोध्या के रामलला मंदिर से जुड़े फैसले का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि इन संपत्तियों पर किसी निजी व्यक्ति या समाज का अधिकार नहीं होगा।

विज्ञापन

उज्जैन कलेक्टर होंगे मंदिर के प्रबंधक
हाईकोर्ट ने मंदिर के प्रशासनिक प्रबंधन की जिम्मेदारी राजस्व विभाग को सौंपने की व्यवस्था की है। इसके तहत उज्जैन कलेक्टर मंदिर के प्रबंधक होंगे। मंदिर के पुजारी की नियुक्ति या उन्हें हटाने का अधिकार भी किसी निजी समाज के पास नहीं रहेगा।

विज्ञापन


पढ़ें: विदिशा के पास एंबुलेंस में ऑक्सीजन हुई खत्म, 16 साल के किशोर ने तोड़ा दम; भोपाल लेकर जा रहे थे

विज्ञापन
विज्ञापन

पुजारी रतनदास की नियुक्ति वैध
अदालत ने वर्तमान पुजारी रतनदास की नियुक्ति को वैध माना है। पीठ ने कहा कि रामोला मंदिर कोई मठ नहीं है, इसलिए पुजारी के लिए ब्रह्मचारी होना अनिवार्य नहीं है। इसी आधार पर रतनदास के विवाह के बाद भी पुजारी पद पर बने रहने को लेकर माहेश्वरी समाज की आपत्ति को खारिज कर दिया गया। अदालत ने माहेश्वरी समाज के सभी सदस्यों को मंदिर में दर्शन और पूजा-अर्चना का अधिकार भी दिया है।

1907 की वसीयत से शुरू हुआ विवाद
मंदिर के प्रबंधन को लेकर विवाद की शुरुआत 19 दिसंबर 1907 को महंत गोपालदास की वसीयत से हुई थी। वसीयत में माहेश्वरी समाज के पंचों की प्रबंधन में भूमिका का उल्लेख था। रतनदास पक्ष ने इसका विरोध किया था। विवाद बढ़ने के बाद रतनदास के पिता महंत मुरलीदास ने मंदिर को राज्य सरकार के संरक्षण में देने का अनुरोध किया। इसके बाद 15 अक्तूबर 1930 को औकाफ विभाग, जिसे वर्तमान में धार्मिक न्यास विभाग के रूप में जाना जाता है, ने मंदिर और उससे जुड़ी संपत्तियों का प्रबंधन अपने नियंत्रण में ले लिया।

1954 में पहली बार अदालत पहुंचा मामला
मंदिर के प्रबंधन और वसीयत से जुड़ा मामला वर्ष 1954 में पहली बार अदालत पहुंचा था। इसके बाद यह कानूनी विवाद हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक चला। वर्ष 2020 में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद मामले की दोबारा सुनवाई शुरू हुई। अब हाईकोर्ट ने इस पर अपना फैसला सुनाते हुए मंदिर और उसकी संपत्तियों का वास्तविक स्वामी भगवान श्रीराम को माना है।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed