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Who Will Be The CM: नेता के नाम पर विधायक बंटे, हो सकता है 2005 जैसा हंगामा
Sun, 10 Dec 2023 07:39 PM IST
आनंद पवार
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल
Published by: आनंद पवार
Updated Sun, 10 Dec 2023 07:39 PM IST
सार
मध्य प्रदेश भाजपा के लिए मुख्यमंत्री के चेहरे पर मुहर लगाना आसान नहीं रहता। 2004 में भी हंगामा हुआ था और जब 2005 में शिवराज सीएम बने थे, तब भी। अब 2023 में वैसे ही हालात बन रहे हैं। विधायक दल की बैठक में आलाकमान का एक लाइन का संदेश आएगा, लेकिन कई विधायक शिवराज सिंह चौहान के नाम को लेकर हंगामा कर सकते हैं।
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मध्य प्रदेश मुख्यमंत्री के नाम का सस्पेंस कल होगा खत्म
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री कौन बनेगा, इसका फैसला कुछ ही घंटों बाद हो जाएगा। भाजपा ने विधानसभा चुनावों के नतीजों के आठ दिन बाद सोमवार को विधायक दल की बैठक बुलाई है। इसमें हंगामा होने की आशंका व्यक्त की जा रही है। इस वजह से विधायकों को भेजे गए पत्र में साफ तौर पर लिखा है कि बैठक से पहले तक कोई भी विधायक मीडिया के सामने प्रतिक्रिया नहीं देगा। पार्टी भी हर कदम फूंक-फूंककर रख रही है।
मध्य प्रदेश में 17 नवंबर को मतदान हुआ और तीन दिसंबर को विधानसभा चुनावों के नतीजे आए। भाजपा ने 230 सीटों वाली विधानसभा में 163 सीटों के साथ बम्पर बहुमत हासिल किया है। कांग्रेस को 66 और अन्य को एक सीट से संतोष करना पड़ा। हैरानी की बात यह है कि चुनावों में बम्पर जीत के बाद भी भाजपा अब तक मुख्यमंत्री के चेहरे पर एक राय होती नजर नहीं आ रही है। केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर और प्रहलाद पटेल अपने केंद्र के पद छोड़कर मध्य प्रदेश की राजनीति में अपनी भूमिका तलाशने को तैयार हैं। भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय भी लंबे अरसे के बाद विधानसभा में दिखाई देने वाले हैं। इतना ही नहीं मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने नतीजों के बाद जिस तरह का संयम दिखाया है, वह भी सियासी हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है। वह पार्टी के 2024 के लोकसभा चुनावों के लिए मिशन-29 पर जुट गए हैं। छिंदवाड़ा, राघौगढ़ समेत तमाम उन जगहों पर गए, जहां कांग्रेस को जीत मिली थी।
यह है सीएम पद के दावेदार
शिवराज सिंह चौहानः चार बार के मुख्यमंत्री हैं। लाड़ली बहना योजना को भी भाजपा की जीत का अहम फेक्टर माना जा रहा है, जो शिवराज की महत्वकांक्षी योजना है। लोगों के बीच मामा और भैया के रूप में छवि गढ़ी और जन-नेता बनकर उभरे हैं।
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नरेंद्र सिंह तोमरः चुनाव अभियान समिति का नेतृत्व किया। केंद्र में कृषि मंत्री थे। सांसदी और केंद्रीय मंत्री पद छोड़कर आए हैं। सत्ता व संगठन पर पकड़ के लिए जाने जाते हैं।
प्रहलाद पटेलः पार्टी के बड़े ओबीसी चेहरा हैं। लोधी समाज से आते हैं। महाकौशल और बुंदेलखंड में महत्वपूर्ण साबित होंगे। केंद्रीय मंत्री पद और सांसदी छोड़कर आए हैं।
कैलाश विजयवर्गीयः भाजपा संगठन में लंबा अनुभव है। उमा भारती, बाबूलाल गौर और शिवराज सिंह चौहान कैबिनेट में मंत्री रहे हैं। हरियाणा और पश्चिम बंगाल में पार्टी को अच्छी सफलता दिलाई। केंद्रीय नेतृत्व से नजदीकी है।
ज्योतिरादित्य सिंधियाः अवसर कम है, लेकिन प्रबल है। राष्ट्रपति से लेकर गृहमंत्री तक का आतिथ्य सत्कार ग्वालियर के अपने महल में कर चुके हैं। ग्वालियर-चंबल और मालवा-निमाड़ में पार्टी को अच्छी सफलता दिलाई। कैम्पेन में पूरी ताकत झोंकी थी।
नए नाम भीः पिछले कुछ दिनों में आदिवासी चेहरा सुमेर सिंह सोलंकी, पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा, केंद्रीय मंत्री फग्गनसिंह कुलस्ते और सांसदों का नाम भी चर्चा में आया है।
विधायकों को भेजे पत्र में दी है चेतावनी
भाजपा के प्रदेश कार्यालय में विधायकों की बैठक 11 दिसंबर को बुलाई गई है। राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा की ओर से नियुक्त पर्यवेक्षक- हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर, पिछड़ा वर्ग मोर्च के राष्ट्रीय अध्यक्ष के. लक्ष्मण और राष्ट्रीय सचिव आशा लाकड़ा बैठक में भाग लेंगे। इस दौरान विधायकों का पंजीयन और भोजन होगा। साथ ही समूह फोटो खींची जाएगी। बैठक के बाद स्वल्पाहार और चाय होगी। हालांकि, विधायकों को स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि बैठक में उनका कोई सहायक या अंगरक्षक शामिल नहीं होगा। साथ ही बैठक से पहले उन्हें मीडिया को प्रतिक्रिया न देने को कहा गया है।
2005 में शिवराज की ताजपोशी पर हुआ था हंगामा
नवंबर 2005 में जब भाजपा के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष शिवराज सिंह चौहान का नाम मुख्यमंत्री के तौर पर आगे बढ़ा था, तब उमा भारत के समर्थकों ने बैठक का बहिष्कार और हंगामा किया था। उस समय 154 मत शिवराज के पक्ष में पड़े थे और उमा भारती समेत 17 समर्थकों ने बैठक का बहिष्कार किया था। उमा भारती ने शिवराज को चुने जाने के तरीके पर सवाल उठाया था और भोपाल से अयोध्या तक राम रोटी यात्रा निकालने की घोषणा की थी। उमा ने कुछ समय के लिए पार्टी छोड़कर भारतीय जनशक्ति भी बनाई थी। उस समय प्रहलाद पटेल भी उनके साथ पार्टी छोड़कर गए थे।
एक लाइन का आएगा प्रस्ताव
आलाकमान ने जो नाम तय किया है, उसके आधार पर बैठक में एक लाइन का प्रस्ताव आएगा। उस पर विधायकों की सहमति ली जाएगी। यदि इससे पहले विधायकों से रायशुमारी हुई तो करीब 50 विधायक शिवराज का नाम ले सकते हैं। एक लाइन के प्रस्ताव पर उनका रुख देखने लायक रहेगा। खासकर बैठकों और मेल-मुलाकातों का दौर तेज हो गया है। रविवार शाम को भी शिवराज ने कैलाश विजयवर्गीय से मुलाकात की।
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मध्य प्रदेश में 17 नवंबर को मतदान हुआ और तीन दिसंबर को विधानसभा चुनावों के नतीजे आए। भाजपा ने 230 सीटों वाली विधानसभा में 163 सीटों के साथ बम्पर बहुमत हासिल किया है। कांग्रेस को 66 और अन्य को एक सीट से संतोष करना पड़ा। हैरानी की बात यह है कि चुनावों में बम्पर जीत के बाद भी भाजपा अब तक मुख्यमंत्री के चेहरे पर एक राय होती नजर नहीं आ रही है। केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर और प्रहलाद पटेल अपने केंद्र के पद छोड़कर मध्य प्रदेश की राजनीति में अपनी भूमिका तलाशने को तैयार हैं। भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय भी लंबे अरसे के बाद विधानसभा में दिखाई देने वाले हैं। इतना ही नहीं मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने नतीजों के बाद जिस तरह का संयम दिखाया है, वह भी सियासी हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है। वह पार्टी के 2024 के लोकसभा चुनावों के लिए मिशन-29 पर जुट गए हैं। छिंदवाड़ा, राघौगढ़ समेत तमाम उन जगहों पर गए, जहां कांग्रेस को जीत मिली थी।
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यह है सीएम पद के दावेदार
शिवराज सिंह चौहानः चार बार के मुख्यमंत्री हैं। लाड़ली बहना योजना को भी भाजपा की जीत का अहम फेक्टर माना जा रहा है, जो शिवराज की महत्वकांक्षी योजना है। लोगों के बीच मामा और भैया के रूप में छवि गढ़ी और जन-नेता बनकर उभरे हैं।
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नरेंद्र सिंह तोमरः चुनाव अभियान समिति का नेतृत्व किया। केंद्र में कृषि मंत्री थे। सांसदी और केंद्रीय मंत्री पद छोड़कर आए हैं। सत्ता व संगठन पर पकड़ के लिए जाने जाते हैं।
प्रहलाद पटेलः पार्टी के बड़े ओबीसी चेहरा हैं। लोधी समाज से आते हैं। महाकौशल और बुंदेलखंड में महत्वपूर्ण साबित होंगे। केंद्रीय मंत्री पद और सांसदी छोड़कर आए हैं।
कैलाश विजयवर्गीयः भाजपा संगठन में लंबा अनुभव है। उमा भारती, बाबूलाल गौर और शिवराज सिंह चौहान कैबिनेट में मंत्री रहे हैं। हरियाणा और पश्चिम बंगाल में पार्टी को अच्छी सफलता दिलाई। केंद्रीय नेतृत्व से नजदीकी है।
ज्योतिरादित्य सिंधियाः अवसर कम है, लेकिन प्रबल है। राष्ट्रपति से लेकर गृहमंत्री तक का आतिथ्य सत्कार ग्वालियर के अपने महल में कर चुके हैं। ग्वालियर-चंबल और मालवा-निमाड़ में पार्टी को अच्छी सफलता दिलाई। कैम्पेन में पूरी ताकत झोंकी थी।
नए नाम भीः पिछले कुछ दिनों में आदिवासी चेहरा सुमेर सिंह सोलंकी, पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा, केंद्रीय मंत्री फग्गनसिंह कुलस्ते और सांसदों का नाम भी चर्चा में आया है।
विधायकों को भेजे पत्र में दी है चेतावनी
भाजपा के प्रदेश कार्यालय में विधायकों की बैठक 11 दिसंबर को बुलाई गई है। राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा की ओर से नियुक्त पर्यवेक्षक- हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर, पिछड़ा वर्ग मोर्च के राष्ट्रीय अध्यक्ष के. लक्ष्मण और राष्ट्रीय सचिव आशा लाकड़ा बैठक में भाग लेंगे। इस दौरान विधायकों का पंजीयन और भोजन होगा। साथ ही समूह फोटो खींची जाएगी। बैठक के बाद स्वल्पाहार और चाय होगी। हालांकि, विधायकों को स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि बैठक में उनका कोई सहायक या अंगरक्षक शामिल नहीं होगा। साथ ही बैठक से पहले उन्हें मीडिया को प्रतिक्रिया न देने को कहा गया है।
2005 में शिवराज की ताजपोशी पर हुआ था हंगामा
नवंबर 2005 में जब भाजपा के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष शिवराज सिंह चौहान का नाम मुख्यमंत्री के तौर पर आगे बढ़ा था, तब उमा भारत के समर्थकों ने बैठक का बहिष्कार और हंगामा किया था। उस समय 154 मत शिवराज के पक्ष में पड़े थे और उमा भारती समेत 17 समर्थकों ने बैठक का बहिष्कार किया था। उमा भारती ने शिवराज को चुने जाने के तरीके पर सवाल उठाया था और भोपाल से अयोध्या तक राम रोटी यात्रा निकालने की घोषणा की थी। उमा ने कुछ समय के लिए पार्टी छोड़कर भारतीय जनशक्ति भी बनाई थी। उस समय प्रहलाद पटेल भी उनके साथ पार्टी छोड़कर गए थे।
एक लाइन का आएगा प्रस्ताव
आलाकमान ने जो नाम तय किया है, उसके आधार पर बैठक में एक लाइन का प्रस्ताव आएगा। उस पर विधायकों की सहमति ली जाएगी। यदि इससे पहले विधायकों से रायशुमारी हुई तो करीब 50 विधायक शिवराज का नाम ले सकते हैं। एक लाइन के प्रस्ताव पर उनका रुख देखने लायक रहेगा। खासकर बैठकों और मेल-मुलाकातों का दौर तेज हो गया है। रविवार शाम को भी शिवराज ने कैलाश विजयवर्गीय से मुलाकात की।
