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Ramadan Special: रमजान में तोप की आवाज से होते हैं सेहरी और इफ्तार, भोपाल रियासत में जारी है परंपरा

Sun, 02 Mar 2025 10:44 PM IST
दिनेश शर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल Published by: दिनेश शर्मा Updated Sun, 02 Mar 2025 10:44 PM IST
सार

मध्यप्रदेश के रायसेन और उज्जैन में रमजान के दौरान सेहरी और इफ्तार की सूचना तोप दागकर दी जाती है। यह परंपरा 300 साल पुरानी है, जब ध्वनि प्रसार के साधन नहीं थे। रायसेन किले पर तोप चलाने के लिए कलेक्टर से लाइसेंस जारी होता है। उज्जैन में भी 150 साल से यह परंपरा जारी है।

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MP News: Sehri and Iftar are done with the sound of cannon in Ramzan, tradition continues in Bhopal state
सेहरी और इफ्तार के समय की सूचना भोपाल रियासत के कुछ शहरों खासकर रायसेन में तोप चलाकर दी जाती है। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

पवित्र रमजान की शुरुआत से लेकर पूरे माह सेहरी और इफ्तार के समय की सूचना भोपाल रियासत के कुछ शहरों खासकर रायसेन में तोप चलाकर दी जाती है। यह व्यवस्था उस समय की है, जब ध्वनि विस्तार के कोई साधन नहीं हुआ करते थे। ढोल, नगाड़ों, आतिशबाजी और तोप के गोलों से सांकेतिक सूचना प्रसारित की जाती थी। नवाब शासन काल में भोपाल समेत प्रदेश के कई शहरों में यह व्यवस्था लागू थी।
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राजधानी भोपाल में रमजान माह की आमद की पहली सूचना शाही मोती मस्जिद से तोप की सांकेतिक आवाज से दी गई। इसके बाद पूरे शहर की मस्जिदों से भी यही क्रम दोहराया गया। माह ए रमजान के दौरान हर सुबह सेहरी का समय खत्म होने की सूचना इसी माध्यम से दी जाएगी। इसी तरह शाम को इफ्तार की इत्तिला का भी यही तरीका अपनाया जाएगा। माह ए रमजान पूरा होने पर और ईद का चांद दिखाई देने पर भी इसी तरह लोगों को सूचित किया जाएगा। राजधानी भोपाल में अलग अलग समय पर होने वाली ईद की नमाज हो जाने के बाद भी इसी तरह सूचित किया जाता है।
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रायसेन किले पर मौजूद है तोप 
प्रदेश का रायसेन जिला रमजान के दौरान आज भी यह परंपरा जारी रखे हुए है। यहां इफ्तार और सेहरी तोप के गोले की गूंज से शुरू और खत्म होती है। इसका इस्तेमाल केवल रमजान के महीने में किया जाता है। यह परंपरा 300 साल पहले से चली आ रही है। जब सेहरी और इफ्तारी की सूचना देने के लिए कोई साधन नहीं हुआ करते थे। नवाबी शासन में ही लोगों को इफ्तार और सेहरी की खबर देने के लिए तोप के गोले दागे जाने की शुरुआत हुई थी।

पुरानी परंपरा कायम
सुंदर दुर्ग पहाड़ी पर बने रायसेन के किले पर रखी तोप की गूंज रमजान में इफ्तार और सेहरी की शुरुआत का इशारा करती है। इसकी आवाज 15 से 20 किलोमीटर दूर तक सुनाई देती है। इसे सुनकर मुस्लिम समाज के लोग इफ्तार करते हैं। 
बता दें, पहले मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में भी रमजान के पाक महीने में तोप चलाई जाती थी, लेकिन वक्त के साथ यह चलन बंद हो गया। रायसेन में पहले बड़ी तोप का इस्तेमाल होता था। लेकिन किले को नुकसान न पहुंचे इसलिए अब इसे दूसरी जगह से चलाया जाता है। बताया जाता है कि इस परंपरा की शुरुआत भोपाल की बेगमों ने 18 वीं सदी में की थी। शहर काजी को इसकी देखरेख कि जिम्मेदारी सौंपी गई थी।


लाइसेंस होता है जारी
रायसेन जिले की इस तोप में एक वक्त में कई ग्राम बारूद का उपयोग होता है। रायसेन में रमजान के दौरान चलने वाली तोप के लिए बकायदा लाइसेंस जारी किया जाता है। कलेक्टर एक महीने के लिए लाइसेंस जारी करते हैं। इसे चलाने का एक महीने का खर्च करीब 50,000 रुपये आता है। नगर पालिका 5000 रुपए अपनी तरफ से देती है, बाकी के पैसों का इंतजाम चंदा करके किया जाता है। रमजान की समाप्ति पर ईद के बाद तोप की साफ-सफाई कर सरकारी गोदाम में जमा कर दिया जाता है।

उज्जैन में भी परंपरा
उज्जैन जिले में भी रमजान में इफ्तार और सहरी तोप के गोलों की गूंज से शुरू और खत्म होती है। यह परंपरा 150 साल पहले से चली आ रही है, जब सेहरी और इफ्तारी के बारे में जानकारी देने का कोई साधन नहीं था। बाबा महाकालेश्वर की नगरी उज्जैन में रमजान का महीना होली, दीपावली, दशहरा और अन्य त्योहारों की तरह ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। धार्मिक नगरी में वर्षों से एक परंपरा चली आ रही है। उज्जैन का तोपखाना क्षेत्र मुस्लिम बहुल है। यहां एक पुरानी तोप है, जिस पर रमजान के महीने में सुबह सेहरी और शाम को इफ्तार के वक्त तोप चलाई जाती है। स्थानीय निवासी बताते हैं कि 150 साल पुरानी तोप आज भी तोपखाना क्षेत्र की मस्जिद में हमारे पास है। 
 

वक्त : सेहरी और इफ्तार 
इफ्तार (3 मार्च) शाम 6.29 बजे
सेहरी  (4 मार्च) सुबह 5.01 बजे

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