फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Madhya Pradesh ›   Bhopal News ›   MP Foundation Day: Even after 69 years, MP has the highest infant mortality rate in the country, challenges re

MP Foundation Day: 69 साल बाद भी MP की शिशु मृत्यु दर देश में सर्वाधिक, स्वास्थ्य क्षेत्र में चुनौतियां बरकरार

Sat, 01 Nov 2025 07:48 AM IST
संदीप तिवारी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल Published by: संदीप तिवारी Updated Sat, 01 Nov 2025 07:48 AM IST
सार

मध्य प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में सुधार के प्रयास लगातार जारी हैं, लेकिन शिशु मृत्यु दर में शीर्ष पर होना राज्य के लिए गंभीर चिंता का विषय है। विशेषज्ञों का कहना है कि इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ सेवाओं की गुणवत्ता और मॉनिटरिंग पर ध्यान देने की अवश्यकता है।

विज्ञापन
MP Foundation Day: Even after 69 years, MP has the highest infant mortality rate in the country, challenges re
मध्य प्रदेश स्वास्थ्य सेवा - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

मध्य प्रदेश के गठन के 69 वर्ष पूरे होने के बाद भी राज्य स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में देश के पिछड़े राज्यों में गिना जा रहा है। खासकर मातृ और शिशु मृत्यु दर के आंकड़े अब भी चिंता पैदा करने वाले हैं। सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (एसआरएस) की रिपोर्ट के अनुसार, मध्य प्रदेश में शिशु मृत्यु दर देश में सबसे अधिक है, जबकि मातृ मृत्यु दर नीचे से तीसरे स्थान पर है, जो राष्ट्रीय औसत से लगभग दोगुनी है। राज्य सरकार अब हर जिले में सुपर-स्पेशियलिटी अस्पताल और मेडिकल कॉलेज स्थापित करने की दिशा में काम कर रही है। साथ ही डिजिटल हेल्थ सेवाओं, टेलीमेडिसिन और ई-रिकॉर्ड सिस्टम को गांवों तक पहुंचाने की योजना पर भी काम जारी है।
विज्ञापन


गंभीर स्थिति: डॉक्टरों की कमी और कमजोर सेवाएं
एनएचएम के पूर्व निदेशक डॉ. पंकज शुक्ला का कहना है कि स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार किए बिना प्रसूताओं और नवजातों की मौतों को रोका नहीं जा सकता। गर्भवती महिलाओं की प्रसव पूर्व जांच समय पर नहीं हो रही हैं। ग्रामीण इलाकों में डॉक्टरों की भारी कमी है। कई स्वास्थ्य केंद्रों में चिकित्सक पदस्थ नहीं हैं, और जहां हैं भी, वहां मॉनिटरिंग की कमी के कारण सेवाएं प्रभावी नहीं हैं। उन्होंने बताया कि राज्य में स्टाफ की कमी सबसे बड़ी चुनौती है। डॉक्टरों के रहने की व्यवस्था न होने से ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाएं बाधित रहती हैं।
विज्ञापन



स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार की कोशिशें
प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए कई नई पहल की गई हैं। एनएचएम की संचालक डॉ. सलोनी सिडाना ने बताया कि पिछले कुछ वर्षों में मातृ मृत्यु दर में सुधार हुआ है और शिशु मृत्यु दर को कम करने के लिए भी लगातार प्रयास जारी हैं। हमने मातृ मृत्यु दर में तीन स्थान का सुधार दर्ज किया है। आने वाली रिपोर्ट में शिशु मृत्यु दर में भी गिरावट देखने को मिलेगी। इसे लेकर कई योजनाएं संचालित की जा रही हैं। 
विज्ञापन
विज्ञापन


यह भी पढ़ें-बड़े तालाब क्षेत्र में अतिक्रमण पर NGT सख्त,BMC को दो सप्ताह में कार्रवाई रिपोर्ट देने के निर्देश



हाल के वर्षों में शुरू हुई प्रमुख पहलें
-राज्य में एयर एंबुलेंस सेवा की शुरुआत की गई, ताकि  दूरदराज के मरीजों को बड़े अस्पतालों तक तेजी से पहुंचाया जा सकेगा।
-शव वाहन योजना लागू की गई, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में शव परिवहन में राहत मिली।
-जिला अस्पतालों में एमआरआई और सीटी स्कैन जैसी अत्याधुनिक सुविधाएं स्थापित की गईं।
-देहदान करने वालों को स्टेट ऑनर देने की परंपरा शुरू हुई।
-नए मेडिकल कॉलेजों की स्थापना श्योपुर और सिंगरौली में नए कॉलेजों की घोषणा, प्रत्येक में 100 सीटें।

यह भी पढ़ें-नेता प्रतिपक्ष बोले- विभाग में जन्म ले चुका है नया सौरभ शर्मा, मंत्री बोले-बिना सबूत कीचड़ न उछालें

स्वास्थ्य और शिक्षा का एकीकृत मॉडल
राज्य सरकार ने चिकित्सा शिक्षा और स्वास्थ्य विभाग को एक साथ जोड़कर एक एकीकृत विकास मॉडल तैयार किया है। इससे मेडिकल कॉलेजों के जरिए ग्रामीण इलाकों में डॉक्टरों की उपलब्धता बढ़ाने की कोशिश की जा रही है। वर्तमान में राज्य में 17 सरकारी मेडिकल कॉलेज संचालित हैं, जिनमें भोपाल, इंदौर, जबलपुर, ग्वालियर और रीवा के कॉलेज प्रमुख हैं।


स्वास्थ्य बजट में भारी बढ़ोतरी
मध्य प्रदेश के स्वास्थ्य बजट में बीते वर्षों में बड़ा इजाफा हुआ है। 2002-03 में स्वास्थ्य बजट लगभग 578 करोड़ रुपये था। 2023-24 में यह बढ़कर करीब 12,000 करोड़ रुपये हो गया। राज्य में अब तक 10,000 से अधिक उप-स्वास्थ्य केंद्र, 1,400 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, 350 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और 52 जिला अस्पताल संचालित हैं।


प्रमुख चुनौतियां
1. डॉक्टरों और विशेषज्ञों की कमी- कई स्वास्थ्य केंद्रों पर पद रिक्त हैं।
2. ग्रामीण-शहरी असमानता- गांवों में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच सीमित।
3. बुनियादी ढांचे की कमी- प्रसव केंद्र और दवाओं की उपलब्धता में बाधा।
4. गुणवत्ता में लापरवाही- मॉनिटरिंग और जवाबदेही की कमी।
5. मानसिक स्वास्थ्य की उपेक्षा- मानसिक बीमारियों को लेकर जागरूकता का अभाव।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed