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MP News: एम्स में एक हफ्ते में दो ट्रांसप्लांट, युवाओं में किडनी का खतरा बढ़ा,अनकंट्रोल ब्लड प्रेशर बन रही वजह
Sun, 02 Nov 2025 06:33 PM IST
संदीप तिवारी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल
Published by: संदीप तिवारी
Updated Sun, 02 Nov 2025 06:33 PM IST
सार
एम्स भोपाल में पिछले एक हफ्ते में 35 साल से कम उम्र के दो युवाओं का किडनी ट्रांसप्लांट किया गया। डॉक्टरों के अनुसार, दोनों ही मामलों में अनकंट्रोल ब्लड प्रेशर (हाइपरटेंशन) किडनी फेल होने का मुख्य कारण रहा।
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एम्स भोपाल
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
तेज रफ्तार जिंदगी, अनियमित खानपान और बढ़ता स्ट्रेस अब सीधे युवाओं की किडनी पर वार कर रहा है। एम्स भोपाल में पिछले एक हफ्ते में 35 साल से कम उम्र के दो युवाओं का किडनी ट्रांसप्लांट किया गया। एक को ब्रेन डेड मरीज से नई किडनी मिली, जबकि दूसरे को उसकी बहन ने अपनी किडनी दान कर जीवनदान दिया। डॉक्टरों के अनुसार, दोनों ही मामलों में अनकंट्रोल ब्लड प्रेशर (हाइपरटेंशन) किडनी फेल होने का मुख्य कारण रहा। डॉक्टरों का कहना है कि आज की तारीख में युवा हार्ट अटैक से नहीं, बल्कि किडनी फेल्योर से ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं।
क्यों फेल हो रही हैं युवाओं की किडनियां
एम्स भोपाल के डॉ. केतन मेहरा ने बताया कि युवाओं में किडनी फेल्योर की सबसे बड़ी वजह अनियंत्रित बीपी, डायबिटीज, स्ट्रेस और अनहेल्दी लाइफस्टाइल है।वे कहते हैं, यदि समय पर बीपी की जांच और नियंत्रण किया जाए तो 80% मामलों में किडनी डैमेज को रोका जा सकता है। लंबे समय तक बढ़ा हुआ ब्लड प्रेशर किडनी की महीन रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचाता है, जिससे वे रक्त को फिल्टर करने की क्षमता खोने लगती हैं। भारत में हर चार में से एक किडनी फेल मरीज का कारण बेकाबू बीपी होता है।
बीपी पर रखें नजर
एम्स भोपाल की नेफ्रोलॉजी और यूरोलॉजी टीम ने कहा कि यह दोनों सर्जरी केवल चिकित्सकीय उपलब्धि नहीं, बल्कि समाज के लिए हेल्थ अलर्ट हैं। पहली सर्जरी रविवार को और दूसरी मंगलवार को हुई। दोनों ही मरीजों की उम्र 30 से 32 वर्ष के बीच थी।
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ब्रेन डेड डोनर ने दी नई जिंदगी
पहला मरीज 30 वर्षीय युवक था जो लंबे समय से हाइपरटेंशन से पीड़ित था। लगातार इलाज के बावजूद उसका ब्लड प्रेशर नियंत्रित नहीं हो पाया और धीरे-धीरे दोनों किडनियों ने काम करना बंद कर दिया। पिछले एक वर्ष से वह डायलिसिस पर था। इसी दौरान एम्स में एक ब्रेन डेड मरीज के अंगदान की प्रक्रिया शुरू हुई और युवक को उस दाता की किडनी मिल गई। सर्जरी सफल रही और अब वह पूरी तरह सामान्य गतिविधियां करने लगा है। डॉक्टरों ने बताया कि पहले जहां ऐसे मरीजों को 30 दिन तक भर्ती रहना पड़ता था, वहीं अब वे सिर्फ सात दिन में डिस्चार्ज हो जा रहे हैं।
बहन ने भाई को दी अपनी किडनी
दूसरा ट्रांसप्लांट मंगलवार को किया गया। 32 वर्षीय युवक की हालत गंभीर थी, ऐसे में उसकी तीन साल बड़ी बहन ने भाई को बचाने के लिए अपनी एक किडनी दान कर दी। सर्जरी पूरी तरह सफल रही और मरीज अब ऑब्ज़र्वेशन में है। डॉक्टरों का कहना है कि कुछ दिनों में उसे भी घर भेज दिया जाएगा।
यह भी पढ़ें-मध्यप्रदेश में तीन दिन तक हल्की बारिश के आसार, नवंबर के दूसरे हफ्ते से ठंड में आएगी तेजी
एम्स में अब तक 17 ट्रांसप्लां
एम्स भोपाल अब मध्य भारत में तेजी से एक प्रमुख किडनी ट्रांसप्लांट सेंटर बन रहा है। अब तक यहां कुल 17 ट्रांसप्लांट किए जा चुके हैं, जिनमें 4 ब्रेन डेड डोनेशन और बाकी लिविंग डोनेशन हैं। हमीदिया अस्पताल (जीएमसी) में अब तक 10 सफल ट्रांसप्लांट हो चुके हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अंगदान के प्रति बढ़ती जागरूकता से और अधिक मरीजों को नई जिंदगी मिल सकती है।
यह भी पढ़ें-लेटेक्स दस्तानों से एलर्जी का खतरा, एम्स भोपाल का शोध अंतरराष्ट्रीय मंच पर चमका; PPE सुरक्षा पर सवाल
एम्स भोपाल की सलाह
- बीपी की नियमित जांच करें।
- नमक और जंक फूड का सेवन सीमित करें।
- रोजाना कम से कम 30 मिनट वॉक करें।
- डॉक्टर द्वारा दी गई दवाओं का सेवन समय पर करें।
- हर 6 महीने में ब्लड शुगर और क्रिएटिनिन जांच कराएं।
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क्यों फेल हो रही हैं युवाओं की किडनियां
एम्स भोपाल के डॉ. केतन मेहरा ने बताया कि युवाओं में किडनी फेल्योर की सबसे बड़ी वजह अनियंत्रित बीपी, डायबिटीज, स्ट्रेस और अनहेल्दी लाइफस्टाइल है।वे कहते हैं, यदि समय पर बीपी की जांच और नियंत्रण किया जाए तो 80% मामलों में किडनी डैमेज को रोका जा सकता है। लंबे समय तक बढ़ा हुआ ब्लड प्रेशर किडनी की महीन रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचाता है, जिससे वे रक्त को फिल्टर करने की क्षमता खोने लगती हैं। भारत में हर चार में से एक किडनी फेल मरीज का कारण बेकाबू बीपी होता है।
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बीपी पर रखें नजर
एम्स भोपाल की नेफ्रोलॉजी और यूरोलॉजी टीम ने कहा कि यह दोनों सर्जरी केवल चिकित्सकीय उपलब्धि नहीं, बल्कि समाज के लिए हेल्थ अलर्ट हैं। पहली सर्जरी रविवार को और दूसरी मंगलवार को हुई। दोनों ही मरीजों की उम्र 30 से 32 वर्ष के बीच थी।
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ब्रेन डेड डोनर ने दी नई जिंदगी
पहला मरीज 30 वर्षीय युवक था जो लंबे समय से हाइपरटेंशन से पीड़ित था। लगातार इलाज के बावजूद उसका ब्लड प्रेशर नियंत्रित नहीं हो पाया और धीरे-धीरे दोनों किडनियों ने काम करना बंद कर दिया। पिछले एक वर्ष से वह डायलिसिस पर था। इसी दौरान एम्स में एक ब्रेन डेड मरीज के अंगदान की प्रक्रिया शुरू हुई और युवक को उस दाता की किडनी मिल गई। सर्जरी सफल रही और अब वह पूरी तरह सामान्य गतिविधियां करने लगा है। डॉक्टरों ने बताया कि पहले जहां ऐसे मरीजों को 30 दिन तक भर्ती रहना पड़ता था, वहीं अब वे सिर्फ सात दिन में डिस्चार्ज हो जा रहे हैं।
बहन ने भाई को दी अपनी किडनी
दूसरा ट्रांसप्लांट मंगलवार को किया गया। 32 वर्षीय युवक की हालत गंभीर थी, ऐसे में उसकी तीन साल बड़ी बहन ने भाई को बचाने के लिए अपनी एक किडनी दान कर दी। सर्जरी पूरी तरह सफल रही और मरीज अब ऑब्ज़र्वेशन में है। डॉक्टरों का कहना है कि कुछ दिनों में उसे भी घर भेज दिया जाएगा।
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एम्स में अब तक 17 ट्रांसप्लां
एम्स भोपाल अब मध्य भारत में तेजी से एक प्रमुख किडनी ट्रांसप्लांट सेंटर बन रहा है। अब तक यहां कुल 17 ट्रांसप्लांट किए जा चुके हैं, जिनमें 4 ब्रेन डेड डोनेशन और बाकी लिविंग डोनेशन हैं। हमीदिया अस्पताल (जीएमसी) में अब तक 10 सफल ट्रांसप्लांट हो चुके हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अंगदान के प्रति बढ़ती जागरूकता से और अधिक मरीजों को नई जिंदगी मिल सकती है।
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एम्स भोपाल की सलाह
- बीपी की नियमित जांच करें।
- नमक और जंक फूड का सेवन सीमित करें।
- रोजाना कम से कम 30 मिनट वॉक करें।
- डॉक्टर द्वारा दी गई दवाओं का सेवन समय पर करें।
- हर 6 महीने में ब्लड शुगर और क्रिएटिनिन जांच कराएं।
