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हिंदी में इंजीनियरिंगः पहले साल मशीनी अनुवाद ने उलझाया, अब विशेषज्ञों की मदद से बनाएंगे किताबें

Mon, 24 Apr 2023 08:08 PM IST
Anand Pawar आनंद पवार
Updated Mon, 24 Apr 2023 08:08 PM IST
सार

मध्यप्रदेश में 2021 में जोर-शोर से हिंदी में इंजीनियरिंग शुरू की गई थी। लेकिन किताबों की कठिन हिंदी न केवल छात्रों के लिए पढ़ाई को मुश्किल बना रही है बल्कि शिक्षकों के लिए भी नई चुनौती बन गई है।

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Engineering in Hindi: Machine translation confused the first year, now books will be made with the help of exp
इंजीनियरिंग की हिंदी में पढ़ाई को लेकर किताबें बड़ी चुनौती बनी हुई हैं। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

मध्यप्रदेश में दो साल पहले हिंदी में इंजीनियरिंग की पढ़ाई शुरू करने की घोषणा हुई थी। योजना का खूब प्रचार-प्रसार हुआ। इसके बाद भी 2022-23 बैच में 150 सीटों में से सिर्फ 19 पर ही छात्रों ने एडमिशन लिए। वह भी किताबों की कठिन हिंदी भाषा की वजह से दूर होते चले गए। इनमें से कुछ ने आवेदन देकर माध्यम अंग्रेजी कर लिया और कुछ को शिक्षकों ने अपने स्तर पर मिश्रित भाषा में पढ़ाकर रुचि बनाए रखी। शिक्षकों का कहना है कि किताबों की भाषा बेहद कठिन है और उससे समझना और पढ़ना मुश्किल है। इसी वजह से वह खुद छात्रों को नोट्स दे रहे हैं। मध्यप्रदेश तकनीकी शिक्षा विभाग ने इस समस्या के समाधान के तौर पर सेकंड ईयर की किताबों को ट्रांसलेट करने के बजाय ट्रांसलिटरेशन का प्रस्ताव भेजा है। एआईसीटीई ने भी विशेषज्ञों से हिंदी में किताबें लिखवाने की तैयारी की है। 
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इंजीनियरिंग की हिंदी अनुवाद वाली किताब - फोटो : अमर उजाला

ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्निकल एजुकेशन (एआईसीटीई) ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई हिंदी सहित आठ क्षेत्रीय भाषाओं में कराने की पहल की है। इसके लिए एआईसीटीई ने 2021 में राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (आरजीपीवी) को हिंदी की किताबें तैयार करने के लिए नोडल एजेंसी बनाया। फर्स्ट ईयर की 20 किताबों का अनुवाद किया गया था। अमर उजाला की पड़ताल में सामने आया कि पहले तो अनुवाद के लिए पहले टीचरों को ढूंढने में मुश्किलें हुई। फिर तीन महीने में इंजीनियरिंग की फर्स्ट ईयर की 20 किताबों का ट्रांसलेशन कर दिया गया। इसमें मानक शब्दों और भाषा के उपयोग को लेकर स्पष्टता नहीं होने से कठिन शब्दों का चयन कर लिया गया। उस समय एआईसीटीसी का सॉफ्टवेयर तैयार नहीं होने से कुछ किताबों में गूगल ट्रांसलेट की मदद ली गई, जिससे भाषा बहुत ही कठिन हो गई। इसको सरल बनाने में भी उदासीनता बरती गई। इसकी वजह से पहले तो बच्चे कम आए। जो आए, वह भी किताबी भाषा समझ नहीं आने की वजह से दूर हो गए। शिक्षक भी खुद को पढ़ाने में असमर्थ पा रहे हैं। इसी वजह से तकनीकी शिक्षा विभाग ने राज्य शासन से अनुरोध किया है कि अंग्रेजी की किताबों के हिंदी में अनुवाद के बजाय हिंदी में ट्रांसलिटरेशन करवाया जाए।
 
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किताबों की भाषा कठिन हो गई है। - फोटो : अमर उजाला
छात्र-छात्राओं को क्या आ रही हैं समस्याएं
  • हिंदी किताबों में तकनीकी शब्दों का भी अनुवाद कर दिया गया है। इससे शिक्षकों को भी पढ़ाने में दिक्कत आ रही हैं। इंजीनियरिंग वर्कशॉप प्रैक्टिस को अभियांत्रिकी कर्मशाला अभ्यास लिखा है। प्लान को अनुविक्षेप, शीट को परिवर्धन, ओवरलैपिंग को अतिव्यापी, क्लॉकवाइज को दक्षिणावर्त लिखा गया है।
  • फिलहाल फर्स्ट ईयर की किताबों का ही अनुवाद किया गया है। उसकी भाषा इतनी कठिन है कि समझना मुश्किल हो रहा है। इस वजह से उन्हें रैफर करने के लिए अंग्रेजी किताबों की मदद लेनी पड़ रही है।
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किताबों की भाषा कठिन हो गई है। - फोटो : अमर उजाला
 
अब बदलेगा किताबों का स्वरूप
किताबों की भाषा की समस्या का समाधान निकालने की कोशिशें तेज हो गई हैं। तकनीकी शिक्षा संचालनालय के कार्यालय प्रमुख डॉ. मोहन सेन ने बताया कि इंजीनियरिंग की हिंदी की किताबों के ट्रांसलेशन की जगह ट्रांसलिटरेशन का प्रस्ताव शासन को भेजा है। वहीं, एआईसीटीई के अधिकारी दिनेश सिंह ने कहा कि पिछली बार की दिक्कतों को देखते हुए सेकंड ईयर की किताबों में सुधार किया जा रहा है। 
 
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