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Bhopal: महिला सशक्तिकरण से लेकर सामाजिक सौहाद्र की मिसाल के इतिहास वाला भोपाल, जानिए महिला शासकों का इतिहास

Thu, 05 Dec 2024 07:09 PM IST
दिनेश शर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल Published by: दिनेश शर्मा Updated Thu, 05 Dec 2024 07:09 PM IST
सार

भोपाल रियासत की चार महिला शासकों—क़ुदसिया, सिकंदर जहां, शाहजहां, और सुल्तान जहां बेगम—ने 107 वर्षों तक शिक्षा, विकास, और धार्मिक सौहार्द्र को बढ़ावा दिया। उन्होंने इमारतें बनवाईं, मस्जिदें मुक्त कराईं, और महिलाओं की शिक्षा पर जोर दिया।
 

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Bhopal: Bhopal has a history of examples ranging from women empowerment to social harmony
भोपाल में महिला शासकों का इतिहास रोचक रहा है। - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

महिला सशक्तिकरण की बातों के दौर में भोपाल रियासत की उन महिला शासकों का जिक्र भी जरूरी है, जिन्होंने एक, दो, पांच नहीं बल्कि सतत 107 साल तक कामयाब सत्ता संभाली है। अमेरिका जैसे सुपर पॉवर देश में जहां महिला अधिकारों और उनकी सुरक्षा की महज बात की जाती है, वह अब तक एक महिला राष्ट्रपति नहीं दे पाया। वहीं अपने देश में 205 साल पहले भोपाल रियासत बेगमात ने शिक्षा, सौहाद्र और विकास की धारणाओं को कायम करके दिखाया है।
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भारत के संदर्भ में भोपाल रियासत वह पहला उदाहरण है, जहां भोपाल में पहली महिला शासक क़ुदसिया बेगम ने 1819 में अपने पति के देहांत के बाद 18 साल की उम्र में रियासत की कमान संभाल ली थी, उन्हें गौहर महल के नाम से भी जाना जाता है। बड़े तालाब के किनारे पर बना गौहर महल का निर्माण 1820 में क़ुदसिया बेगम ने करवाया था।
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क़ुदसिया बेगम की शादी नज़र मुहम्मद खान से हुई थी। नज़र मुहम्मद एक अफगान मूल के सैनिक थे, लेकिन तरक्की करते हुए बहुत छोटी उम्र में भोपाल रियासत में जागीरदार बन गए। 11 नवंबर 1819 का वह दुर्भाग्यपूर्ण दिन था, जब यह शाही परिवार के लोग शिकार करने के लिए इस्लाम नगर (अब जगदीशपुर कहलाता है) गए हुए थे। तब, क़ुदसिया बेगम के छोटे भाई, आठ साल के फौजदार मुहम्मद ने नज़र मुहम्मद की बेल्ट से एक पिस्तौल खींची और उसके साथ खेलना शुरू कर दिया। एक भयंकर दुर्घटना में आठ साल के फौजदार मोहम्मद खान ने भोपाल के नवाब की हत्या कर दी। भोपाल पर तीन साल और पांच महीने तक शासन करने के बाद 28 साल की आयु में उनका निधन हो गया।
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सिकंदर जहां, जिन्होंने अंग्रेजों से आजाद कराई जामा मस्जिद 
भोपाल रियासत की दूसरी बेगम सिकंदर जहां बेगम थीं। इतिहासकार बताते हैं कि सिकंदर जहां बेगम घोड़े पर सवार होकर पूरी रियासत का दौरा करती थीं। 1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेजों ने जामा मस्जिद पर कब्ज़ा कर उन्हें बंद कर दिया था। उन्हें डर रहता था कि मुसलमान यहां इकट्ठा होकर उनके खिलाफ विद्रोह की साजिश करते हैं। सिकंदर जहां बेगम ने बहुत संघर्ष के बाद जामा मस्जिद को अंग्रेजों के कब्ज़े से आज़ाद कराया। सिकंदर जहां बेगम ने अपनी रियासत में आने वाले हर एक गांव का दौरा किया था और हर चीज़ की मैंपिग करवाई थी। इस मैप को हाथ से बनाया गया था और उसमें हर चीज़ की जानकारी मौजूद थी। उसमें लिखा गया था कि कहां पर रियासत में पहाड़ है और कहां पानी के स्रोत हैं।

शाहजहां ने बनवाया ताज
भोपाल रियासत की तीसरी नवाब शाहजहां बेगम थीं। इन्होंने भी पहले की दोनों बेगमात के कामों को आगे बढ़ाया। उन्हें इमारतें बनवाने का ज़्यादा शौक था। भोपाल के शानदार ताजमहल का निर्माण भी शाहजहां बेगम ने करवाया था। एशिया की सबसे बड़ी मस्जिदों में शुमार ताज उल मसाजिद का निर्माण भी शाहजहां बेगम ने करवाया था, जो इनके कार्यकाल में पूरा ना हो सका था। इंग्लैंड की पहली मस्जिद Surry mosque का निर्माण भी शाहजहां बेगम ने करवाया था। उन्होंने हिंदूओं की संपत्तियों के संरक्षण और सुरक्षा के लिए एक हिंदू संपत्ति ट्रस्ट की स्थापना भी की थी। 


सुल्तान जहां का फोकस शिक्षा पर रहा
भोपाल की आखिरी महिला नवाब सुल्तान जहां बेगम थीं। 1901 में उन्होंने रियासत की कमान संभाली। उन्होंने शिक्षा के प्रचार प्रसार को बहुत ज़्यादा महत्व दिया। सुल्तान जहां बेगम ने कुरान हदीस के हवाले से महिलाओं की शिक्षा पर जोर दिया। इन्होंने अहमदाबाद पैलेस का निर्माण कराया। मिंटो हॉल, जिसे बाद में एमपी की विधानसभा के रूप में इस्तेमाल किया गया और अब कुशाभाऊ ठाकरे कन्वेशन हॉल के नाम से पहचाना जाता है, उसका निर्माण भी सुल्तान जहां बेगम ने ही करवाया था। इसके अलावा उन्होंने उस वक्त सुल्तानिया गर्ल्स स्कूल का निर्माण भी कराया था। वे अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) की पहली चांसलर थीं। साथ ही ऑल इंडिया कॉन्फ्रेंस ऑन एजुकेशन की पहली अध्यक्ष भी रही हैं। 
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