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नर्मदा में 11 हजार लीटर दूध डाला: पर्यावरणविद बोले-घुले ऑक्सीजन में गिरावट, जलीय जीवों पर संकट,दूषित होगा पानी
Tue, 14 Apr 2026 06:19 PM IST
Sandeep Kumar Tiwari
न्यूज डेस्क,अमर उजाला, भोपाल
न्यूज डेस्क,अमर उजाला, भोपाल
Published by: Sandeep Kumar Tiwari
Updated Tue, 14 Apr 2026 06:19 PM IST
सार
सीहोर के सातदेव में नर्मदा नदी में 11 हजार लीटर दूध बहाने से गंभीर प्रदूषण का खतरा पैदा हो गया है। पर्यावरण विशेषज्ञ सुभाष सी पांडे के अनुसार, इससे पानी में घुली ऑक्सीजन घट रही है, जलीय जीवों पर संकट बढ़ रहा है और सड़न के कारण महीनों तक पानी दूषित रह सकता है।
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पर्यावरणविद सुभाष सी पांडे
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
सीहोर जिले के सातदेव गांव में नर्मदा नदी में 11 हजार लीटर दूध प्रवाहित करने का मामला अब गंभीर पर्यावरणीय संकट के रूप में सामने आया है। पर्यावरण मामलों के जानकार सुभाष सी पांडे का कहना है कि इसका असर केवल तुरंत नहीं, बल्कि दूसरे चरण में और ज्यादा खतरनाक रूप में सामने आएगा। पांडे के अनुसार, इतनी बड़ी मात्रा में दूध मिलने से पानी में घुली हुई ऑक्सीजन का स्तर तेजी से गिरता है। सामान्य स्तर जहां छह से आठ के बीच रहता है, वह घटकर एक से तीन तक पहुंच सकता है। इससे मछलियों और अन्य जलीय जीवों का जीवन खतरे में पड़ जाता है।
जैव रासायनिक ऑक्सीजन मांग कई गुना बढ़ी
पर्यावरणविद पांडे बताते हैं कि इतनी मात्रा में दूध नदी में जाना डेयरी अपशिष्ट की तरह काम करता है, जो सामान्य गंदे पानी से भी ज्यादा नुकसानदायक होता है। इससे नदी का प्राकृतिक संतुलन तेजी से बिगड़ता है। उन्होंने बताया कि दूध के कारण पानी में जैव रासायनिक ऑक्सीजन मांग बहुत अधिक बढ़ जाती है। इसका सामान्य स्तर बहुत कम होना चाहिए, लेकिन इस स्थिति में यह सैकड़ों गुना तक बढ़ सकती है। इससे पानी में ऑक्सीजन की खपत तेजी से बढ़ती है और प्रदूषण फैलता है।
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सड़न से और बढ़ेगा खतरा
पांडे के मुताबिक असली खतरा दूसरे चरण में शुरू होता है। पहले चरण में ऑक्सीजन की कमी से जलीय जीव मरते हैं, फिर उनके सड़ने से बैक्टीरिया और फंगस तेजी से पनपते हैं। इससे पानी की गुणवत्ता लगातार गिरती जाती है और यह प्रक्रिया महीनों तक चलती रहती है। जहां दूध बहाया गया, वहां से नीचे की ओर कई किलोमीटर तक पानी पीने योग्य नहीं रह सकता। इससे आसपास के लोगों के स्वास्थ्य पर भी खतरा बढ़ जाता है। नर्मदा का पानी सामान्यतः क्षारीय होता है, लेकिन दूध के कारण इसका संतुलन भी बिगड़ सकता है।
यह भी पढ़ें-सीएम यादव बोले- राष्ट्रहित सर्वोपरि, सामाजिक समरसता के लिए एकजुट होकर करेंगे काम
नर्मदा पर पहले से खतरा
पांडे ने बताया कि अंतरराष्ट्रीय संस्था World Resources Institute पहले ही नदियों पर बढ़ते खतरे को लेकर चेतावनी दे चुकी है, जिसमें नर्मदा भी शामिल है। पांडे के अनुसार, धार्मिक और सामाजिक गतिविधियों के नाम पर नदी में सामग्री प्रवाहित करना प्रदूषण की बड़ी वजह बनता जा रहा है। फल-फूल, माला और अन्य चीजें भी नदी को नुकसान पहुंचा रही हैं। ऐसे मामलों पर रोक के लिए जल प्रदूषण नियंत्रण से जुड़े कानून मौजूद हैं, लेकिन सख्ती से पालन नहीं होने के कारण इस तरह की घटनाएं रुक नहीं पा रही हैं।
यह भी पढ़ें-बोर्ड 12वीं का रिजल्ट 15 अप्रैल को, जानें कैसा रहा पिछले साल का परिणाम व विषयवार आंकड़ें
क्या हुआ था सातदेव में?
भेरुंदा क्षेत्र के ग्राम सातदेव में महायज्ञ के समापन पर श्रद्धालुओं ने टैंकरों के जरिए 11 हजार लीटर दूध नर्मदा में अर्पित किया। इसका उद्देश्य धार्मिक आस्था और क्षेत्र की सुख-समृद्धि की कामना बताया गया। पर्यावरणविद का कहना है कि नर्मदा को बचाने के लिए केवल कानून काफी नहीं हैं। लोगों को जागरूक होना होगा और आस्था के साथ पर्यावरण का संतुलन बनाना जरूरी है, तभी इस तरह की घटनाओं को रोका जा सकता है।
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जैव रासायनिक ऑक्सीजन मांग कई गुना बढ़ी
पर्यावरणविद पांडे बताते हैं कि इतनी मात्रा में दूध नदी में जाना डेयरी अपशिष्ट की तरह काम करता है, जो सामान्य गंदे पानी से भी ज्यादा नुकसानदायक होता है। इससे नदी का प्राकृतिक संतुलन तेजी से बिगड़ता है। उन्होंने बताया कि दूध के कारण पानी में जैव रासायनिक ऑक्सीजन मांग बहुत अधिक बढ़ जाती है। इसका सामान्य स्तर बहुत कम होना चाहिए, लेकिन इस स्थिति में यह सैकड़ों गुना तक बढ़ सकती है। इससे पानी में ऑक्सीजन की खपत तेजी से बढ़ती है और प्रदूषण फैलता है।
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सड़न से और बढ़ेगा खतरा
पांडे के मुताबिक असली खतरा दूसरे चरण में शुरू होता है। पहले चरण में ऑक्सीजन की कमी से जलीय जीव मरते हैं, फिर उनके सड़ने से बैक्टीरिया और फंगस तेजी से पनपते हैं। इससे पानी की गुणवत्ता लगातार गिरती जाती है और यह प्रक्रिया महीनों तक चलती रहती है। जहां दूध बहाया गया, वहां से नीचे की ओर कई किलोमीटर तक पानी पीने योग्य नहीं रह सकता। इससे आसपास के लोगों के स्वास्थ्य पर भी खतरा बढ़ जाता है। नर्मदा का पानी सामान्यतः क्षारीय होता है, लेकिन दूध के कारण इसका संतुलन भी बिगड़ सकता है।
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नर्मदा पर पहले से खतरा
पांडे ने बताया कि अंतरराष्ट्रीय संस्था World Resources Institute पहले ही नदियों पर बढ़ते खतरे को लेकर चेतावनी दे चुकी है, जिसमें नर्मदा भी शामिल है। पांडे के अनुसार, धार्मिक और सामाजिक गतिविधियों के नाम पर नदी में सामग्री प्रवाहित करना प्रदूषण की बड़ी वजह बनता जा रहा है। फल-फूल, माला और अन्य चीजें भी नदी को नुकसान पहुंचा रही हैं। ऐसे मामलों पर रोक के लिए जल प्रदूषण नियंत्रण से जुड़े कानून मौजूद हैं, लेकिन सख्ती से पालन नहीं होने के कारण इस तरह की घटनाएं रुक नहीं पा रही हैं।
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क्या हुआ था सातदेव में?
भेरुंदा क्षेत्र के ग्राम सातदेव में महायज्ञ के समापन पर श्रद्धालुओं ने टैंकरों के जरिए 11 हजार लीटर दूध नर्मदा में अर्पित किया। इसका उद्देश्य धार्मिक आस्था और क्षेत्र की सुख-समृद्धि की कामना बताया गया। पर्यावरणविद का कहना है कि नर्मदा को बचाने के लिए केवल कानून काफी नहीं हैं। लोगों को जागरूक होना होगा और आस्था के साथ पर्यावरण का संतुलन बनाना जरूरी है, तभी इस तरह की घटनाओं को रोका जा सकता है।
