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उपभोक्ता आयोग का फैसला: एलआईसी महिला को दे दो लाख का ब्याज समेत बीमा क्लेम, दस हजार रुपये का हर्जाना भी लगाया

Wed, 14 Oct 2026 09:29 PM IST
दिनेश शर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बालाघाट
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बालाघाट Published by: दिनेश शर्मा Updated Wed, 14 Oct 2026 09:29 PM IST
सार

बालाघाट जिला उपभोक्ता आयोग ने एलआईसी को सुधा चौहान को दो लाख रुपये का बीमा क्लेम देने का आदेश दिया है। राशि पर 9 फरवरी 2026 से भुगतान तक छह प्रतिशत सालाना ब्याज देना होगा। आयोग ने सेवा में लापरवाही के लिए दस हजार रुपये हर्जाना और दो हजार रुपये कानूनी खर्च भी देने के निर्देश दिए।

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balaghat consumer commission orders lic to pay two lakh insurance claim with interest
उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग का अहम फैसला - फोटो : ANI

विस्तार

बालाघाट जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए भारतीय जीवन बीमा निगम(एलआईसी) को मृतक बीमित कर्मचारी की पत्नी के पक्ष में बीमा राशि और ब्याज का भुगतान करने का आदेश दिया है। आयोग ने बीमा निगम द्वारा महिला का बीमा क्लेम निरस्त करने को सेवा में गंभीर कमी और लापरवाही माना है।
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आयोग के अध्यक्ष उपेंद्र कुमार सोनकर तथा सदस्य डॉ. महेश कुमार चांडक और हर्षा बिजेवार डोहरे की पीठ ने बुधवार को यह फैसला सुनाते हुए पीड़ित महिला सुधा चौहान को दो लाख रुपये की पूरी बीमा राशि देने का स्पष्ट निर्देश जारी किया। साथ ही, उपभोक्ता आयोग ने बीमा कंपनी को आदेश दिया कि वह बीमा क्लेम जमा करने की तारीख 9 फरवरी, 2026 से लेकर भुगतान किए जाने के दिन तक छह प्रतिशत सालाना की दर से ब्याज भी प्रदान करे। आयोग ने सेवा में लापरवाही के लिए दस हजार रुपये का हर्जाना और कोर्ट कचहरी के खर्च के रूप में दो हजार रुपये की राशि अलग से देने का फैसला सुनाया है। बीमा कंपनी को यह सारा भुगतान एक महीने की समय सीमा के भीतर पूरा करना होगा।
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वेतन से कटती थी किस्त
मामले के विवरण के अनुसार, समनापुर गांव की निवासी सुधा चौहान के पति खेमचंद चौहान भोपाल स्थित सेंट्रल वेयरहाउसिंग कॉरपोरेशन में नौकरी करते थे। खेमचंद चौहान ने 15 अक्तूबर, 2001 को भारतीय जीवन बीमा निगम से 2 लाख रुपये की एक बीमा पॉलिसी ली थी। इस बीमा पॉलिसी की 287 रुपये की मासिक किस्त सीधे उनके वेतन से कटती थी। बीमा पॉलिसी के चालू रहने के दौरान ही 30 अप्रैल, 2003 को उनका निधन हो गया। पति की मौत के बाद जब उनकी पत्नी सुधा चौहान ने बीमा क्लेम के लिए आवेदन किया, तो बीमा निगम ने आवश्यक कागजात न मिलने का बहाना बनाकर उनके दावे को रद्द कर दिया। बीमा कंपनी के इस रवैये से परेशान होकर महिला ने न्याय पाने के लिए कानूनी रास्ता अपनाने का फैसला किया।

आयोग में पेश किए गए दस्तावेज
बीमा क्लेम खारिज हो जाने के बाद भी सुधा चौहान ने हार नहीं मानी और बालाघाट जिला उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया। आयोग में सुनवाई के दौरान जब आवश्यक कागजात मांगे गए, तो पीड़िता ने 23 फरवरी 2004 को अपने पति की वेतन पर्ची, वर्ष 2001 से अप्रैल 2003 तक लगातार कटी हुई प्रीमियम की रसीदें और अन्य सभी संबंधित दस्तावेज जमा कर दिए। महिला द्वारा जमा किए गए इन तमाम सबूतों को देखने के बाद उपभोक्ता फोरम ने माना कि जब वेतन से प्रीमियम नियमित रूप से कट रहा था, तो बीमा निगम द्वारा क्लेम निरस्त करना सरासर गलत था। आयोग ने इसे सेवा में स्पष्ट लापरवाही का मामला पाया।
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