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Lucknow News: होगी इस ढेर इमारत की कहानी कुछ तो...
Thu, 23 Nov 2023 02:05 AM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, लखनऊ
संवाद न्यूज एजेंसी, लखनऊ
Updated Thu, 23 Nov 2023 02:05 AM IST
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सब फूल दरवाजों में थे, सब रंग आवाजों में थे।
इक शहर देखा था कभी, उस शहर की क्या बात थी।
शायर अहमद मुश्ताक का यह शेर गुजरे जमाने के शहर-ए-लखनऊ की बात कहता हुआ नजर आता है। लेकिन अब वो दर-ओ-दीवारें अब वैसी नहीं रहीं। राजधानी में हमारी ऐतिहासिक धरोहरें हमें विरासत में मिली हैं। पूरे विश्व में इनका अपना अलग स्थान है। इन्हें संजोकर रखने की हम सबकी जिम्मेदारी है। बावजूद शासन-प्रशासन स्तर पर उपेक्षा का दीमक इन्हें दिन-ब-दिन खोखला करता जा रहा है।
गौरी त्रिवेदी
लखनऊ। इस समय विश्व धरोहर सप्ताह मनाया जा रहा है। हर साल इस अवसर पर सरकारी आयोजन होते हैं, बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं लेकिन धरातल पर नतीजा सिफर ही रहता है। शहर में राज्य पुरातत्व विभाग के तहत आने वाली छह ऐतिहासिक इमारतें और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के तहत आने वाली 60 संरक्षित धरोहरों की स्थित लगभग एक जैसी है। इनका मूल स्वरूप बना रहे, इसके लिए विभाग की ओर से कोई ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे है। शायर शहरयार रसूल का एक शेर इन इमारतों पर बिल्कुल सटीक बैठता है :
होगी इस ढेर इमारत की कहानी कुछ तो।
ढूंढ अल्फाज के मलबे में मआनी कुछ तो।
1857 की क्रांति का गवाह मूसाबाग बदहाल
1857 की क्रांति का गवाह दुबग्गा स्थित एएसआई संरक्षित इमारत मूसाबाग के किले में जगह-जगह गंदगी है। इसकी जर्जर हालत मानो कह रही हो कि मुझे बचा लो, मैं गिर रही हूं। अराजकतत्वों का यहां अड्डा बन चुका है। यहां पर बैठकर सिगरेट, हुक्का, गाजा और शराब तक लोग पीते हैं। मूसाबाग किले का निर्माण अवध के पांचवें नवाब सआदत अली खान ने 19वीं सदी की शुरुआत में बनवाया था। लामार्ट कॉलेज की बिल्डिंग काॅस्टेंशिया और छतर मंजिल की वास्तुकला से प्रभावित होकर इसका निर्माण करवाया था। नदी किनारे हुए इस निर्माण में फ्रांस की वास्तुकला की झलक मिलती है। संरक्षण न होने से यह बदहाल हो गई है।
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मूसाबाग कोठी का ढांचा इस समय खंडहर में है। गुंबददार छत के साथ दो बड़े खंड और एक छत रहित संरचना जो जमीन के नीचे धंसी है। खंडहरों की आकर्षक स्थापत्य विशेषताएं जीर्ण-शीर्ण हैं। स्मारक के स्थापत्य अवशेष एक हिस्से में चार मंजिलों और दूसरे हिस्से में दो अलग-अलग मंजिल पूरी तरीके से जर्जर और बदहाल है। इसे ‘सफरी बाग’ भी कहते हैं। इसके बीच बनी बारादरी और तहखाने के भग्नावशेष आज भी मौजूद हैं। तहखाने तक पहुंचने के लिए दो रास्ते हैं। यह तहखाना गर्मी के दिनों में बड़ा आरामदेह था।
तो इसलिए नाम पड़ा मूसाबाग
कहते हैं कि एक दिन नवाब आसिफुद्दौला अपने प्रिय घोड़े सिकंदर पर बैठकर सैर करने निकले। उसी समय एक चूहा घोड़े की टाप के नीचे आकर दब गया। नवाब साहब को चूहे की मौत पर बड़ा अफसोस हुआ। तभी वजीर ने कह दिया–हुजूर अगर इसे दफन करवाकर–मजार बनवा दें तो इसकी रूह को बड़ा सुकून मिलेगा। नवाब साहब को वजीर की बात पसन्द आई। चूहे को दफन करने के बाद मजार बनवाकर एक खूबसूरत बाग लगवा दिया गया जो कि मूसाबाग के नाम से मशहूर हुआ।
नाम मात्र को लगा दिया बोर्ड
मूसाबाग में बोर्ड तो बहुत बड़ा लगा दिया, लेकिन संरक्षण में एक सुरक्षा गार्ड तक नहीं है। एएसआई, अधीक्षण पुरातत्वविद डॉ. आफताब हुसैन के पास भी इसका कोई जवाब नहीं है। कई बार प्रयास करने के बावजूद उन्होंने इस मामले में बात नहीं की।
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आलमबाग भवन की स्थिति भी बदहाल
आलमबाग स्थित आलमबाग भवन की स्थित जर्जर है। इस बदहाल इमारत की विभाग सुधि ही नहीं ले रहा है।
एएसआई संरक्षित पश्चिमी कैसरबाग गेट की स्थिति खराब
पश्चिमी कैसरबाग गेट की स्थित बेहद खराब है। यहां का प्लास्टर तक गिर रहा है साथ ही इसमें लगी विशेष लकड़ी को जरुरतमंद चोरी कर बेंच ले जा रहे हैं। हालांकि पिछले दिनों हाईकोर्ट ने सरकार से पूछा भी था कि सरकार ने संरक्षित इमारतों के लिए क्या किया।
राज्य पुरातत्व विभाग के पास हैं ये स्मारक
विभाग के अनुसार, राज्य पुरातत्व विभाग के पास आलमबाग मेट, आलमबाग भवन, लाल बारादरी, फरहदबख्श कोठी है। दो पुरास्थल नटवाडीह का टोला, हुलासखेड़ा का टीला भी हैं। दावा है कि इनकी स्थिति में काफी सुधार हो चुका है। स्मारकों में सिर्फ आलमबाग गेट के जीर्णोद्धार का काम बचा है। यूपी राज्य पुरातत्व विभाग की निदेशक रेनू द्विवेदी ने बताया कि संरक्षित स्मारकों में समय-समय पर मरम्मत करवाई जाती है।
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इक शहर देखा था कभी, उस शहर की क्या बात थी।
शायर अहमद मुश्ताक का यह शेर गुजरे जमाने के शहर-ए-लखनऊ की बात कहता हुआ नजर आता है। लेकिन अब वो दर-ओ-दीवारें अब वैसी नहीं रहीं। राजधानी में हमारी ऐतिहासिक धरोहरें हमें विरासत में मिली हैं। पूरे विश्व में इनका अपना अलग स्थान है। इन्हें संजोकर रखने की हम सबकी जिम्मेदारी है। बावजूद शासन-प्रशासन स्तर पर उपेक्षा का दीमक इन्हें दिन-ब-दिन खोखला करता जा रहा है।
गौरी त्रिवेदी
लखनऊ। इस समय विश्व धरोहर सप्ताह मनाया जा रहा है। हर साल इस अवसर पर सरकारी आयोजन होते हैं, बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं लेकिन धरातल पर नतीजा सिफर ही रहता है। शहर में राज्य पुरातत्व विभाग के तहत आने वाली छह ऐतिहासिक इमारतें और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के तहत आने वाली 60 संरक्षित धरोहरों की स्थित लगभग एक जैसी है। इनका मूल स्वरूप बना रहे, इसके लिए विभाग की ओर से कोई ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे है। शायर शहरयार रसूल का एक शेर इन इमारतों पर बिल्कुल सटीक बैठता है :
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होगी इस ढेर इमारत की कहानी कुछ तो।
ढूंढ अल्फाज के मलबे में मआनी कुछ तो।
1857 की क्रांति का गवाह मूसाबाग बदहाल
1857 की क्रांति का गवाह दुबग्गा स्थित एएसआई संरक्षित इमारत मूसाबाग के किले में जगह-जगह गंदगी है। इसकी जर्जर हालत मानो कह रही हो कि मुझे बचा लो, मैं गिर रही हूं। अराजकतत्वों का यहां अड्डा बन चुका है। यहां पर बैठकर सिगरेट, हुक्का, गाजा और शराब तक लोग पीते हैं। मूसाबाग किले का निर्माण अवध के पांचवें नवाब सआदत अली खान ने 19वीं सदी की शुरुआत में बनवाया था। लामार्ट कॉलेज की बिल्डिंग काॅस्टेंशिया और छतर मंजिल की वास्तुकला से प्रभावित होकर इसका निर्माण करवाया था। नदी किनारे हुए इस निर्माण में फ्रांस की वास्तुकला की झलक मिलती है। संरक्षण न होने से यह बदहाल हो गई है।
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मूसाबाग कोठी का ढांचा इस समय खंडहर में है। गुंबददार छत के साथ दो बड़े खंड और एक छत रहित संरचना जो जमीन के नीचे धंसी है। खंडहरों की आकर्षक स्थापत्य विशेषताएं जीर्ण-शीर्ण हैं। स्मारक के स्थापत्य अवशेष एक हिस्से में चार मंजिलों और दूसरे हिस्से में दो अलग-अलग मंजिल पूरी तरीके से जर्जर और बदहाल है। इसे ‘सफरी बाग’ भी कहते हैं। इसके बीच बनी बारादरी और तहखाने के भग्नावशेष आज भी मौजूद हैं। तहखाने तक पहुंचने के लिए दो रास्ते हैं। यह तहखाना गर्मी के दिनों में बड़ा आरामदेह था।
तो इसलिए नाम पड़ा मूसाबाग
कहते हैं कि एक दिन नवाब आसिफुद्दौला अपने प्रिय घोड़े सिकंदर पर बैठकर सैर करने निकले। उसी समय एक चूहा घोड़े की टाप के नीचे आकर दब गया। नवाब साहब को चूहे की मौत पर बड़ा अफसोस हुआ। तभी वजीर ने कह दिया–हुजूर अगर इसे दफन करवाकर–मजार बनवा दें तो इसकी रूह को बड़ा सुकून मिलेगा। नवाब साहब को वजीर की बात पसन्द आई। चूहे को दफन करने के बाद मजार बनवाकर एक खूबसूरत बाग लगवा दिया गया जो कि मूसाबाग के नाम से मशहूर हुआ।
नाम मात्र को लगा दिया बोर्ड
मूसाबाग में बोर्ड तो बहुत बड़ा लगा दिया, लेकिन संरक्षण में एक सुरक्षा गार्ड तक नहीं है। एएसआई, अधीक्षण पुरातत्वविद डॉ. आफताब हुसैन के पास भी इसका कोई जवाब नहीं है। कई बार प्रयास करने के बावजूद उन्होंने इस मामले में बात नहीं की।
आलमबाग भवन की स्थिति भी बदहाल
आलमबाग स्थित आलमबाग भवन की स्थित जर्जर है। इस बदहाल इमारत की विभाग सुधि ही नहीं ले रहा है।
एएसआई संरक्षित पश्चिमी कैसरबाग गेट की स्थिति खराब
पश्चिमी कैसरबाग गेट की स्थित बेहद खराब है। यहां का प्लास्टर तक गिर रहा है साथ ही इसमें लगी विशेष लकड़ी को जरुरतमंद चोरी कर बेंच ले जा रहे हैं। हालांकि पिछले दिनों हाईकोर्ट ने सरकार से पूछा भी था कि सरकार ने संरक्षित इमारतों के लिए क्या किया।
राज्य पुरातत्व विभाग के पास हैं ये स्मारक
विभाग के अनुसार, राज्य पुरातत्व विभाग के पास आलमबाग मेट, आलमबाग भवन, लाल बारादरी, फरहदबख्श कोठी है। दो पुरास्थल नटवाडीह का टोला, हुलासखेड़ा का टीला भी हैं। दावा है कि इनकी स्थिति में काफी सुधार हो चुका है। स्मारकों में सिर्फ आलमबाग गेट के जीर्णोद्धार का काम बचा है। यूपी राज्य पुरातत्व विभाग की निदेशक रेनू द्विवेदी ने बताया कि संरक्षित स्मारकों में समय-समय पर मरम्मत करवाई जाती है।