पहले कानून तोड़ना, फिर 'मैनेज करना', यही है यूपी पुलिस का 'स्टाईल'
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‘आपकी सेवा में सदैव तत्पर’ के आदर्श वाक्य पर काम करने वाली पुलिस अक्सर संगठित गिरोह की तरह काम करती नजर आती है। पहले तो गलती करती है फिर गलती को छिपाने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाती है। आला अफसर नजरें फेरे रहते हैं।
मामला जब तूल पकड़ता है तो अदने से कर्मचारी पर कार्रवाई कर रफा-दफा करने में जुट जाती है। प्रदर्शन के दौरान शिक्षक की मौत हो या हरदोई के एसपी की गाड़ी चोरी होने का मामला। दोनों में पुलिसिया लीपापोती साफ नजर आती है।
केस-एक
लाठीचार्ज में शिक्षक की मौत का मामला
अटेवा पेंशन बचाओ मंच के बैनर तले पुरानी पेंशन बहाल किए जाने की मांग को लेकर शिक्षकों ने 7 दिसंबर को विधान भवन के घेराव का एलान किया था। खुफिया तंत्र ने पुलिस व प्रशासन के अधिकारियों को अलर्ट किया।
लाठी भांजनी शुरू कर दी, ...और चली गई शिक्षक की जान
तय कार्यक्रम के मुताबिक दोपहर बाद 3-4 बजे के बीच प्रदर्शनकारियों का जत्था हजरतगंज चौराहा से जीपीओ की तरफ बढ़ा। खीझी पुलिस ने लाठी भांजनी शुरू कर दी। भगदड़ मची और इलाके की कानून-व्यवस्था ध्वस्त हो गई। लाठीचार्ज का शिकार बने शिक्षकों में डॉ. रामाशीष सिंह की जान चली गई। आक्रोशित प्रदर्शनकारियों ने आला अफसरों से शिकायत की।
मामला तूल पकड़ते देख अफसरों ने परिवारीजन को बुलाकर केस दर्ज कराने को कहा। रामाशीष के साढ़ू ने इंस्पेक्टर राजकुमार सिंह, एसआई दिनेश चंद्र पांडेय, कांस्टेबल अभिषेक सिंह व अन्य पुलिसकर्मियों के खिलाफ तहरीर दी।
इस पर 8 दिसंबर की रात 12:40 बजे गैर इरादतन हत्या का केस दर्ज किया गया। इससे पहले पुलिस झूठ की बुनियाद पर शिक्षकों पर मुकदमा लिख चुकी थी।
पांच बजे शिक्षक जुटे, 45 मिनट पहले ही दर्ज करा दिया केस
इंस्पेक्टर राजकुमार सिंह की तहरीर पर हजरतगंज कोतवाली में 7 दिसंबर की शाम 4:15 बजे अटेवा के प्रदेश अध्यक्ष विजय कुमार बंधु, महामंत्री डॉ. नीरज पति, क्रांति सिंह, अखिलेश सिंह, रामेंद्र सिंह व लाठीचार्ज में जान गंवाने वाले रामाशीष सिंह के खिलाफ केस दर्ज किया गया।
इसमें आईपीसी की दस धाराओं के साथ सार्वजनिक संपत्ति नुकसान निवारण अधिनियम की धारा 2 व 3 के साथ 7 क्रिमिनल लॉ अमेंडमेंट एक्ट का आरोपी बनाया गया। खास बात यह है कि इंस्पेक्टर ने प्रदर्शनकारियों पर शाम पांच बजे हजरतगंज चौराहे से जीपीओ पहुंचने और यातायात ठप करने का आरोप लगाया।
तहरीर में कहा कि जीपीओ पर धरना-प्रदर्शन को लेकर हाईकोर्ट द्वारा पाबंदी लगाए जाने के बावजूद प्रदर्शनकारियों की भीड़ उमड़ने पर उच्चाधिकारियों को जानकारी दी गई। जाम में एंबुलेंस तक फंसी थी। प्रदर्शनकारियों ने बैरियर तोड़ते हुए मारपीट व अभद्रता की। अफरातफरी मच गई। पुलिस ने डंडा फटकार कर खदेड़ना चाहा तो प्रदर्शनकारी पथराव करने लगे।
प्रधान मुख्य आयकर आयुक्त की कार व दो सरकारी गाड़ियां तोड़ डाली। पुलिस ने डंडे फटकारे तो एक-दूसरे पर चढ़कर भागने लगे। सवाल है कि इंस्पेक्टर ने शाम पांच बजे शिक्षकों के जत्थे के जीपीओ की तरफ बढ़ने का हवाला दिया, जबकि केस शाम 4:15 बजे दर्ज किया गया था।
...तो क्या अकेले सिपाही ने ही लाठीचार्ज किया था
लाठीचार्ज में शिक्षक डॉ. रामाशीष सिंह की मौत का मामला तूल पकड़ने पर एसएसपी मंजिल सैनी ने इंस्पेक्टर राजकुमार सिंह को हजरतगंज से हटाकर पुलिस लाइन भेजा और कांस्टेबल अभिषेक सिंह को निलंबित किया। इसके साथ जांच एएसपी सिटी पूर्वी को सौंपी। सवाल उठा कि एएसपी, सीओ व इंस्पेक्टर की मौजूदगी में क्या अकेले सिपाही ने लाठीचार्ज किया था? दरअसल, फजीहत से बचने के लिए एक सिपाही पर कार्रवाई करके मामला ठंडे बस्ते में डालने की कवायद की गई।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट को ढाल बनाने की कोशिश
डॉ. रामाशीष सिंह की मौत पर पुलिस ने गैरइरादतन हत्या का केस तो दर्ज कर लिया लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट को ढाल बनाकर आरोपियों को क्लीनचिट देने की तैयारी है। एएसपी सिटी पूर्वी का कहना है कि पोस्टमार्टम में डॉ. रामाशीष सिंह के शरीर पर कोई चोट नहीं पाई गई। डॉक्टरों ने मौत की वजह तिल्ली फटना मानते हुए विसरा सुरक्षित रखा है। तिल्ली दौड़कर गिरने, गुम्मे या अन्य तरह से चोट आने पर फट सकती है। विशेषज्ञों की राय ली जा रही है।
इस पर एसएसपी मंजिल सैनी का कहना है कि डॉ. रामआशीष सिंह की मौत के बाद उनके रिश्तेदार की तहरीर पर इंस्पेक्टर राजकुमार सिंह व अन्य पुलिसकर्मियों के खिलाफ धारा 304 के तहत केस दर्ज करके तफ्तीश की जा रही है। पुलिसकर्मियों पर विभागीय कार्रवाई के लिए एएसपी सिटी पूर्वी को जांच सौंपी गई है। पूरे मामले की मजिस्ट्रेटी जांच की जा रही है। मजिस्ट्रेट की जांच के आधार पर अगली कार्रवाई की जाएगी।
केस-दो, लापरवाहों को बचाने में जुटे आला अफसर
एसपी हरदोई की सरकारी गाड़ी चोरी प्रकरण
हजरतगंज इलाके से एसपी हरदोई राजीव मल्होत्रा की वायरलेस, नीलीबत्ती व हूटर लगी गाड़ी चोरी होने के मामले में न सिर्फ झूठ की बुनियाद पर केस दर्ज किया गया, बल्कि आला अफसरों द्वारा लापरवाहों को बचाने की कोशिश जारी है।
हरदोई के एसआई एमटी जयकृष्ण शर्मा ने 6 नवंबर की सुबह हजरतगंज कोतवाली में एसपी हरदोई की सरकारी टाटा सूमो गोल्ड चोरी होने का केस दर्ज कराया।
उन्होंने कहा कि चालक मुनेश्वर गुप्ता व गनर मलखान सिंह 3 नवंबर की शाम एसपी के काम से गाड़ी लेकर हजरतगंज के शालीमार इंपीरियल स्थित उनके निजी आवास पर गए थे। वहां गाड़ी में तकनीकी खराबी पर मैकेनिक तलाशा। मैकेनिक न मिलने पर चाबी एसपी के घर पर छोड़ी और दोनों पुलिसकर्मी दूसरी गाड़ी से हरदोई लौटे।
गाड़ी खराब होने की जानकारी पर 5 नवंबर को सुबह 11 बजे जयकृष्ण शालीमार इंपीरियल पहुंचा। वायरलेस सेट, हूटर व नीलीबत्ती लगी गाड़ी गायब होने पर तलाश शुरू की। कुछ पता न चलने पर अगली सुबह केस दर्ज कराने पहुंचा।
इस तरह सामने आया झूठ
क्राइम ब्रांच की टीम ने सीसीटीवी फुटेज के जरिए गाड़ी को चिह्नित किया। नेपाल पुलिस के हाथ-पांव जोड़कर चेसिस, इंजन व पुर्जे कब्जे में लेने के साथ रामकिशोर नामक बदमाश को गिरफ्तार किया।
पड़ताल में खुलासा हुआ कि रामकिशोर ने 4 नवंबर की रात डुप्लीकेट चाबी से गाड़ी स्टार्ट की और फर्राटे भरते हुए फैजाबाद, गोरखपुर के रास्ते नेपाल ले गया था। गाड़ी के टैंक में पर्याप्त ईंधन था और कोई खराबी नहीं थी।
लापरवाही को छिपाने में गलती
वायरलेस, हूटर व नीली बत्ती लगी सरकारी गाड़ी चोरी होने में एसपी से लेकर चालक तक की लापरवाही पर पर्दा डालने लिए झूठ का सहारा लिया गया जो गले की फांस बना है। सवाल उठा कि गाड़ी में तकनीकी खराबी पर चालक व गनर ने मोबाइल फोन से एसआई एमटी को जानकारी क्यों नहीं दी?
एसआई एमटी जयकृष्ण शर्मा ने जिक्र नहीं किया कि चालक ने उन्हें कब जानकारी दी और उन्होंने लखनऊ पहुंचने में दो दिन क्यों लगाए? सरकारी गाड़ी गायब होने की जानकारी के 23 घंटे बाद चोरी का केस दर्ज कराने का उनके पास जवाब नहीं है। लापरवाहों को बचाने का खेल मुकदमे की सुनवाई में आरोपियों के लिए मददगार होगा।
सुस्त रफ्तार से जांच, रिपोर्ट ठंडे बस्ते में
एसपी हरदोई की सरकारी गाड़ी चोरी होने का मामला तूल पकड़ने पर डीजीपी के आदेश पर आईजी जोन ने 6 नवंबर को डीआईजी रेंज प्रवीण कुमार को जांच सौंपी और 13 नवंबर तक जांच पूरी करके रिपोर्ट सौंपने को कहा। मामला आईपीएस अफसर से जुड़ा होने की वजह से जांच की रफ्तार सुस्त रही।
इसे लेकर फजीहत होने पर डीआईजी ने एक दिसंबर को जांच रिपोर्ट सौंपी और आईजी जोन ने अगले दिन एडीजी कानून-व्यवस्था को अपनी आख्या के साथ रिपोर्ट सौंप दी। दस दिन से जांच रिपोर्ट ठंडे बस्ते में है। लापरवाह अफसर से लेकर कर्मचारी तक किसी पर कार्रवाई नहीं हुई है।
भीड़ नियंत्रण छोड़िए, वर्दी पहनना तक सीख नहीं पा रहे सिपाही
ट्रेनिंग पुलिसिंग की रीढ़ है, लेकिन आजकल सिपाहियों की ट्रेनिंग के नाम पर महज खानापूरी हो रही है। भीड़ नियंत्रण या कानून की जानकारी तो दूर की बात है, उन्हें सलीके से वर्दी पहनना तक नहीं आता।
पुलिस अफसरों के मुताबिक, पहले सिपाहियों को आरटीसी व पीटीएस में एक साल का प्रशिक्षण दिया जाता था। इसका मकसद उन्हें सभी मौसम में काम करने लायक बनाना था।
इसके अलावा नियमित क्लास में उन्हें आईपीसी व सीआरपीसी की जानकारी दी जाती थी। इंडोर व आउटडोर ट्रेनिंग के दौरान थाना या पुलिस अफसरों के दफ्तर में काम करने, बदमाशों की सुरागरसी व उन्हें पकड़ने, भीड़ नियंत्रण आदि का प्रशिक्षण दिया जाता था।
पिछले दिनों 36 हजार सिपाहियों की भर्ती करके उन्हें नौकरी देने की जल्दबाजी में नियमावली में संशोधन किया गया। इसके तहत चयनित सिपाही को तीन महीने आरटीसी या पीटीएस में ट्रेनिंग के बाद तीन महीने के लिए जिले में भेजा गया।
जिला पुलिस के तौर-तरीके सीखने के बाद फिर से तीन महीने पीटीएस या आरटीसी में ट्रेनिंग का नियम बनाया गया। इस तरह पीटीसी या आरटीसी में ट्रेनिंग साल भर से घटकर दो शिफ्टों में सिर्फ छह महीने की रह गई। इस वजह से सिपाही पूरी तरह दक्ष नहीं हो पा रहे हैं।
इंतजाम में कमी से बेकाबू होती है भीड़
रिटायर्ड डीजीपी एके जैन कहते है कि ट्रेनिंग में कोई कमी नहीं है। जब अधिकारियों के इंतजाम में कमी होती है, तभी भीड़ बेकाबू होती है। इसके लिए भीड़ का आकलन कर फोर्स और बैकअप का पर्याप्त इंतजाम करें। भीड़ का नेतृत्व कर रहे लोगों से संवाद बनाए रखें। खुफिया तंत्र की सूचनाओं पर ध्यान दें।
भीड़ के सामने जिम्मेदार, अनुभवी और ठंडे दिमाग के अफसरों की ड्यूटी लगाएं। भीड़ नियंत्रण में आठ से 12 घंटे तक खड़े होकर ड्यूटी देने वाले पुलिसकर्मियों के खाने-पीने का इंतजाम रखें। पीएसी और आरएएफ को पीछे रखें। कभी समस्या नहीं आएगी।
भीड़ के उग्र होने पर जागते हैं अफसर
रिटायडी डीजीपी विक्रम सिंह कहते हैं कि समस्या ट्रेनिंग की नहीं, अफसरों की गंभीरता की है। जब भीड़ उग्र हो हाती है, तब अफसर जागते हैं। अफसरों को चाहिए कि ऐसी सूझबूझ से डायवर्जन करें कि भीड़ बिना बलप्रयोग के तितर-बितर हो जाए। जगह-जगह की वीडियोग्राफी कराकर भीड़ में शामिल अराजक तत्वों पर फोकस करें।
अगर भीड़ उग्र हो जाए तो लाठीचार्ज या फायरिंग को टालने की कोशिश करें। बलप्रयोग करना ही पड़े तो वाटर कैनन या ऐसे अन्य साधनों का इस्तेमाल करें। बार-बार लाठीचार्ज से पुलिस की विश्वसनीयता और संबंधित अधिकारियों की नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठते हैं।
छोटे-छोटे मामलों को मुद्दा बनाने लगे हैं लोग
रिटायर्ड डीजीपी एमसी द्विवेदी का कहना है कि अधिकारी कानून-व्यवस्था और शांति बनाए रखने के लिए पूरी तैयारी करते हैं, लेकिन आजकल हर प्रदर्शन में उग्रता हावी होने लगी है। लोग छोटे-छोटे मामलों को मुद्दा बनाने लगे हैं। वह पुलिस से जान-बूझकर भिड़ने लगते हैं।
ऐसे में पुलिस के सामने भी चुनौतियां बढ़ गई हैं। हालात बिगाड़ने के लिए भीड़ ही ज्यादा जिम्मेदार होती है। कई बार भीड़ पुलिस को भड़काती है। जब भीड़ उग्र होगी तो पुलिस की प्रतिक्रिया तो सामने आएगी ही।