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सरकारी नीति पर भारी बाबुओं का गठजोड़, बाल एवं पुष्टाहार निदेशालय में वर्षों से चल रहा यह खेल

Tue, 11 Jun 2019 12:33 PM IST
Amulya Rastogi सुधीर कुमार सिंह, अमर उजाला लखनऊ
सुधीर कुमार सिंह, अमर उजाला लखनऊ Published by: Amulya Rastogi Updated Tue, 11 Jun 2019 12:33 PM IST
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workers nexus dominating government policies in icds department
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला
राज्य सरकार हर साल तबादला नीति जारी करती है, लेकिन बाल विकास सेवा एवं पुष्टाहार निदेशालय (आईसीडीएस) में बाबुओं की  ‘नीति’ ही चलती है। पिछले 10 से 15 साल से मुख्यालय में अधिष्ठान व बजट जारी करने समेत अन्य ‘मलाईदार’ पटल पर बाबुओं के काकस (गठजोड़) का कब्जा है। 
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विभाग के उच्चस्तरीय तंत्र पर इनके कब्जे का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि मुख्यालय में स्वीकृत पदों के करीब तीन गुना लिपिकीय संवर्ग के बाबू वर्षों से यहां संबद्ध हैं। जबकि शासन स्तर से किसी भी कर्मचारी को संबद्ध करने पर प्रतिबंध लगा हुआ है। 
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तबादला नीति के मुताबिक अधिकारी से लेकर बाबू तक एक जिले में या एक स्थान पर अधिकतम 3 साल और मंडल में अधिकतम 7 वर्ष ही रह सकते हैं। वहीं, शासन ने जिले में बाल विकास पुष्टाहार की परियोजनाओं में तैनात लिपिकों समेत अन्य कार्मिकों को किसी कार्यालय से संबद्ध करने पर वर्ष 2007 से प्रतिबंध लगा रखा है। 
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इसके बावजूद परियोजनाओं में तैनात 80 से 90 बाबुओं को वर्षों से संबद्ध किया गया है। वहीं, मुख्यालय में कई बाबू पिछले 7 से 10 साल से एक ही पटल पर कब्जा जमाए हैं। 

राज्य सरकार हर साल तबादला नीति जारी करती है, लेकिन बाल विकास सेवा एवं पुष्टाहार निदेशालय (आईसीडीएस) में बाबुओं की  ‘नीति’ ही चलती है। पिछले 10 से 15 साल से मुख्यालय में अधिष्ठान व बजट जारी करने समेत अन्य ‘मलाईदार’ पटल पर बाबुओं के काकस (गठजोड़) का कब्जा है। 

विभाग के उच्चस्तरीय तंत्र पर इनके कब्जे का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि मुख्यालय में स्वीकृत पदों के करीब तीन गुना लिपिकीय संवर्ग के बाबू वर्षों से यहां संबद्ध हैं। जबकि शासन स्तर से किसी भी कर्मचारी को संबद्ध करने पर प्रतिबंध लगा हुआ है। 

तबादला नीति के मुताबिक अधिकारी से लेकर बाबू तक एक जिले में या एक स्थान पर अधिकतम 3 साल और मंडल में अधिकतम 7 वर्ष ही रह सकते हैं। वहीं, शासन ने जिले में बाल विकास पुष्टाहार की परियोजनाओं में तैनात लिपिकों समेत अन्य कार्मिकों को किसी कार्यालय से संबद्ध करने पर वर्ष 2007 से प्रतिबंध लगा रखा है। 

इसके बावजूद परियोजनाओं में तैनात 80 से 90 बाबुओं को वर्षों से संबद्ध किया गया है। वहीं, मुख्यालय में कई बाबू पिछले 7 से 10 साल से एक ही पटल पर कब्जा जमाए हैं। 

बसपा व सपा सरकार में मजबूत हुआ काकस
यूं तो मुख्यालय में बाबुओं का दबदबा काफी पहले से है, लेकिन मायावती व अखिलेश सरकार में यह काकस और भी मजबूत हो गया। इसकी पुष्टि आंतरिक लेखा परीक्षा की रिपोर्ट से होती है। 

इसके मुताबिक बसपा व सपा सरकार में बाल विकास परियोजना अधिकारियों (सीडीपीओ) को अनधिकृत तरीके से अपर परियोजना प्रबंधक बनाकर मुख्यालय में तैनात किया गया, वहीं 80 से अधिक बाबुओं को एक बार में तीन-तीन प्रमोशन देने के साथ एसीपी का लाभ देकर सरकारी खजाने को करोड़ों रुपये की चपत लगाई गई।

बिना पद के वर्षों से मुख्यालय में जमे हैं लिपिक संवर्ग के ये कर्मचारी

प्रधान सहायक : अजय कुमार बाजपेई, हरि किशुन, ओंकारनाथ गौड़, ज्ञानेंद्र शरण, रिजवान अहमद, अजीत प्रताप सिंह यादव, तेजपाल सिंह, कमल कुमार, गिरीशचंद्र डिमरी, राजाराम गौड़, बजरंग बली पांडेय, उषा श्रीवास्तव, अमरेश यादव, सरिता सिंह, राजेंद्र कुमार शुक्ला, अमित चौहान, विशाल श्रीवास्तव, राजेंद्र प्रसाद कन्नौजिया, सुधीर खरवार, सत्य नारायण, असमा बानो, कमलेश कुमार, अमित श्रीवास्तव, अभिषेक बाजपेई, राजदेव, कुलदीप सिंह, अर्चना राय, सतीश कुमार वर्मा, अनिल कुमार श्रीवास्तव, सुषमा बहुगुणा, लाल बिहारी, योगेंद्र कुमार यादव, अरविंद सिंह, अंकिता त्रिपाठी, अरविंद कुमार वर्मा, उपेंद्र कुमार श्रीवास्तव, राजेश काके, नीलम शुक्ला, शारिब खान, कविता वर्मा, श्याम नारायण सिंह, प्रकाश वीर सिंह।
कनिष्ठ सहायक : रेनू देवी, राम सजीवन पाल, प्रभाकर श्रीवास्तव, राजेश कुमार तिवारी, गीतांजलि मिश्रा।
स्टेनोग्राफर : देवदत्त।

तबादला नीति का अक्षरश: पालन किया जाएगा। किसी भी अधिकारी या कर्मचारी की मुख्यालय में या अन्य किसी स्थान पर तैनाती की समय सीमा पूरी हो चुकी होगी तो उसे इस बार जरूर हटाया जाएगा। फिलहाल तमाम कार्मिकों की तैनाती संबंधी जानकारी जुटाई जा रही है।
- शत्रुघ्न सिंह, निदेशक, बाल विकास सेवा एवं पुष्टाहार
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