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Lucknow News: समाज को बेहतर तरीके से चला सकती हैं महिलाएं
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मेटाफर लिटफेस्ट में बोलते प्रकाश झा।
लखनऊ। मशहूर फिल्म निर्देशक प्रकाश झा ने कहा कि पूरी दुनिया में लोकतंत्र विकृत हो गया है। यह पूरी तरह से संख्या जुटाने पर केंद्रित होकर रह गया है। इसीलिए यह जाति-धर्म, आरक्षण और क्षेत्र जैसे मुद्दों के सहारे है। औरतें ही हैं जो समाज को बेहतर तरीके से चला सकती हैं।
वे रविवार को गोमतीनगर के सीआईआई भवन में मेटाफर लखनऊ लिटफेस्ट के दूसरे व अंतिम दिन एक सत्र में बोल रहे थे।
‘पॉलीटिकल फिल्म एंड देयर इवॉल्यूशन इन इंडियन सिनेमा’ विषय पर हुए सत्र में विक्रम सिंह चौहान से बातचीत के दौरान प्रकाश झा ने कहा कि राजनीति के बिना कुछ भी नहीं है। कहा कि वे मूलरूप से कहानीकार हैं और कहानी पर ही फिल्में बनाते हैं। आरक्षण, जाति, समुदाय और बाकी सामाजिक मुद्दों को ध्यान में नहीं रखते हैं, यह बात अलग है कि उनकी कहानी में ये मुद्दे आ जाते हैं। उन्होंने खुद को स्थायी रूप से विपक्ष में रहने की बात कही। उनके मुताबिक, सत्ता और ताकत गलत करने के लिए प्रेरित करती है। उन्होंने कहा कि आरक्षण सही लोगों को नहीं मिल पा रहा है।
एक सवाल का जवाब में उन्होंने कहा कि सिनेमा किसी भी काल में सरकार के पक्ष या विपक्ष में नहीं रहता है। समानांतर सिनेमा का दौर समाप्त होने पर उनका कहना था कि आज लोग सोचना, समझना और विचार करना नहीं चाहते हैं। लोग पूर्वाग्रही हो गए हैं। समानांतर सिनेमा निडर था और उसे सच भाता था।
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आश्रम के बाद तंग आ गया हूं ओटीटी से
आश्रम जैसी नामी वेब सिरीज बनाने वाले प्रकाश झा के मुताबिक, उनको फिल्में ही भाती हैं। ओटीटी से वे तंग आ चुके हैं। भले ही दोनों का लेखन एक तरह से शुरू होता हो, लेकिन फिल्म की स्क्रिप्ट 150 पन्नों में आ जाती है, वहीं वेब सिरीज के लिए चार-साढ़े चार सौ पन्ने भी कम पड़ते हैं।
ख्वाहिश है ग्रेजुएशन करूं
निर्माता-निर्देशक ने कहा कि मेरे पिता गांव के पहले ग्रेजुएट थे। पढ़ाई के लिए मैं दिल्ली विश्वविद्यालय गया, लेकिन ग्रेजुएशन नहीं कर पाया। ग्रेजुएशन करने की मेरी ख्वाहिश है।
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जीवन का गलत फलसफा देते हैं पॉप सांग और सिनेमा
एक अन्य सत्र में फिल्म निर्देशक सुधीर मिश्रा ने स्क्रिप्ट राइटर अतुल तिवारी से बात करते हुए कहा कि पॉप सांग और सिनेमा जीवन का गलत फलसफा पेश करते हैं। जीवन इंद्रधनुष की तरह रंगीन नहीं होता है, जैसा कि हमारा सिनेमा आमतौर पर दिखाता है। इस लिहाज से हजारों ख्वाहिशें ऐसी, फिल्म जीवन के करीब थी। उसमें फिल्मी टच नहीं था। उन्होंने कहा कि फिल्म चमेली का निर्माण बेहद बुरे समय में हुआ। इसके लिए 15 दिन तक हम एक कमरे में बंद रहकर स्क्रिप्ट पर काम करते रहे। 28 दिन में शूटिंग, एक महीने में एडिटिंग और चार महीने में यह रिलीज भी हो गई। उन्होंने कहा कि निर्देशक को हमेशा एक अच्छे प्रोड्यूसर की जरूरत होती है जो उसके ख्वाब पर पैसा लगा सकता हो। इस दौरान उन्होंने अपनी फिल्म- ये वो मंजिल नहीं, की रील गायब होने और उसके दोबारा रेस्टोरेशन होने की बात भी बताई।
संध्या मृदुल ने सुनाई अनटेम्ड पोएट्री
फेस्ट के एक सत्र के दौरान अभिनेत्री संध्या मृदुल ने अनटेम्ड पोएट्री के सत्र में अपने लेखन पर बातचीत की। उन्होंने कहा कि बेचैनी और उलझन उनको लिखने की प्रेरणा देती है। इस सत्र में डॉ. सुरभि मोदी ने उनसे बातचीत की।
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वे रविवार को गोमतीनगर के सीआईआई भवन में मेटाफर लखनऊ लिटफेस्ट के दूसरे व अंतिम दिन एक सत्र में बोल रहे थे।
‘पॉलीटिकल फिल्म एंड देयर इवॉल्यूशन इन इंडियन सिनेमा’ विषय पर हुए सत्र में विक्रम सिंह चौहान से बातचीत के दौरान प्रकाश झा ने कहा कि राजनीति के बिना कुछ भी नहीं है। कहा कि वे मूलरूप से कहानीकार हैं और कहानी पर ही फिल्में बनाते हैं। आरक्षण, जाति, समुदाय और बाकी सामाजिक मुद्दों को ध्यान में नहीं रखते हैं, यह बात अलग है कि उनकी कहानी में ये मुद्दे आ जाते हैं। उन्होंने खुद को स्थायी रूप से विपक्ष में रहने की बात कही। उनके मुताबिक, सत्ता और ताकत गलत करने के लिए प्रेरित करती है। उन्होंने कहा कि आरक्षण सही लोगों को नहीं मिल पा रहा है।
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एक सवाल का जवाब में उन्होंने कहा कि सिनेमा किसी भी काल में सरकार के पक्ष या विपक्ष में नहीं रहता है। समानांतर सिनेमा का दौर समाप्त होने पर उनका कहना था कि आज लोग सोचना, समझना और विचार करना नहीं चाहते हैं। लोग पूर्वाग्रही हो गए हैं। समानांतर सिनेमा निडर था और उसे सच भाता था।
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आश्रम के बाद तंग आ गया हूं ओटीटी से
आश्रम जैसी नामी वेब सिरीज बनाने वाले प्रकाश झा के मुताबिक, उनको फिल्में ही भाती हैं। ओटीटी से वे तंग आ चुके हैं। भले ही दोनों का लेखन एक तरह से शुरू होता हो, लेकिन फिल्म की स्क्रिप्ट 150 पन्नों में आ जाती है, वहीं वेब सिरीज के लिए चार-साढ़े चार सौ पन्ने भी कम पड़ते हैं।
ख्वाहिश है ग्रेजुएशन करूं
निर्माता-निर्देशक ने कहा कि मेरे पिता गांव के पहले ग्रेजुएट थे। पढ़ाई के लिए मैं दिल्ली विश्वविद्यालय गया, लेकिन ग्रेजुएशन नहीं कर पाया। ग्रेजुएशन करने की मेरी ख्वाहिश है।
जीवन का गलत फलसफा देते हैं पॉप सांग और सिनेमा
एक अन्य सत्र में फिल्म निर्देशक सुधीर मिश्रा ने स्क्रिप्ट राइटर अतुल तिवारी से बात करते हुए कहा कि पॉप सांग और सिनेमा जीवन का गलत फलसफा पेश करते हैं। जीवन इंद्रधनुष की तरह रंगीन नहीं होता है, जैसा कि हमारा सिनेमा आमतौर पर दिखाता है। इस लिहाज से हजारों ख्वाहिशें ऐसी, फिल्म जीवन के करीब थी। उसमें फिल्मी टच नहीं था। उन्होंने कहा कि फिल्म चमेली का निर्माण बेहद बुरे समय में हुआ। इसके लिए 15 दिन तक हम एक कमरे में बंद रहकर स्क्रिप्ट पर काम करते रहे। 28 दिन में शूटिंग, एक महीने में एडिटिंग और चार महीने में यह रिलीज भी हो गई। उन्होंने कहा कि निर्देशक को हमेशा एक अच्छे प्रोड्यूसर की जरूरत होती है जो उसके ख्वाब पर पैसा लगा सकता हो। इस दौरान उन्होंने अपनी फिल्म- ये वो मंजिल नहीं, की रील गायब होने और उसके दोबारा रेस्टोरेशन होने की बात भी बताई।
संध्या मृदुल ने सुनाई अनटेम्ड पोएट्री
फेस्ट के एक सत्र के दौरान अभिनेत्री संध्या मृदुल ने अनटेम्ड पोएट्री के सत्र में अपने लेखन पर बातचीत की। उन्होंने कहा कि बेचैनी और उलझन उनको लिखने की प्रेरणा देती है। इस सत्र में डॉ. सुरभि मोदी ने उनसे बातचीत की।