मुस्लिम नहीं भूले अतीत, काशी में क्या करेंगे मोदी?
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यह सच है कि देश में मोदी लहर है लेकिन इस बात से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता है कि मुस्लिम वोट पाना मोदी के लिए उतना आसान नहीं होगा। वजह है गोधरा कांड।
आजमगढ़ के मशहूर शिबली कॉलेज में कानून की छात्रा हया फातिमा बताती हैं कि उसके कॉलेज की जो लड़कियां कभी सियासत की बातें नहीं करती थीं।
लेकिन अब कुछ दिनों से उनकी बातों में नरेंद्र मोदी का जिक्र आने लगा है। खौफ और आशंकाओं के साथ।
कमोबेश ऐसी ही चिंता बदायूं के 80 साल के सगीर अहमद की है। कहते हैं, आजाद हिन्दुस्तान में मैंने तमाम सियासी व सामाजिक उतार-चढ़ाव देखे। एक से एक भयानक दंगे भी।
मुसलमानों के निशाने पर सरकारों और नेताओं को आते भी देखा, पर गुजरात दंगों को लेकर मुसलमानों में जितनी तल्खी मोदी को लेकर है, उतनी कभी किसी अन्य के प्रति नहीं देखी।
नायक नहीं, खलनायक हैं मोदी
सगीर अहमद का अनुभव इस हकीकत को साफ बयां करती हैं कि मोदी को लेकर मुस्लिमों में चिंता का दायरा कितना और कहां तक बढ़ गया है।
यह बेचैनी किसी एक शहर, खास उम्र या किसी तबके तक सीमित नहीं है। सभी के दिलो-दिमाग में मोदी एक खलनायक की तरह छाए हुए हैं।
किसी को खौफ सता रहा है कि मोदी पीएम बन गए तो गुजरात में बीते दिनों जो हुआ वह कहीं देश के अन्य हिस्सों में न होने लगे।
किसी को इस आशंका ने बेचैन कर रखा है कि इस्लामी पहचान और शरीयत कानून पर ही संकट न आ जाए।
बहस तो मुसलमानों को सरकारी योजनाओं के जरिए मिलने वाली सहूलियतों पर सवाल लगने को लेकर भी हो रही है।
'कहीं किसी और एजेंडे पर काम न होने लगे'
दरअसल मोदी को लेकर चिंताएं और वाहवाही कुछ दिनों पहले तक गुजरात तक सीमित रहती थीं।
पर चुनावी महासमर शुर होने और प्रधानमंत्री पद पर उनकी दावेदारी के बाद मुसलमानों की चिंताएं भी विस्तार लेने लगीं।
लखनऊ की उर्दू लेखिका डॉ. सबीहा अनवर कहती हैं, ‘मैं तो इस खयाल से ही परेशान हो जाती हूं कि मोदी इस देश के प्रधानमंत्री होंगे।'
सोशल एक्टिविस्ट रेहाना अदीब बताती है कि वह जब मुजफ्फरनगर शिविरों में जाती हैं, तो महिलाएं तरह-तरह के सवाल पूछती हैं।
कभी-कभी तो जवाब देना मुश्किल हो जाता है। मर्दों के बीच देश में मुसलमानों के मुस्तकबिल पर गुणा-भाग होता रहता है।
कुछ यह भी आशंका जताते हैं कि सुशासन और विकास महज पोस्टरों तक सीमित न रह जाए और काम किसी और एजेंडे पर हो।
... काशी की चिंता कुछ और भी
काशी में चिंता और गहरा जाती है क्योंकि नरेंद्र मोदी वहीं से चुनाव लड़ रहे हैं।
मदर हलीमा एजुकेशन सेंटर के निदेशक नोमान हसन कहते हैं, मुसलमान गुजरात दंगों से मोदी को बरी नहीं मान रहा है।
हो सकता है कि मोदी प्रधानमंत्री बनने पर कोई मुस्लिम विरोधी काम न करें पर मुसलमानों को आशंका है कि वह कॉमन सिविल कोड, धारा 370 और शरीयत कानून पर अपना चिर परिचित एजेंडा लागू कर सकते हैं।
काशी में तो मुसलमानों को यह भी आशंका सता रही है कि कहीं ज्ञानवापी मस्जिद का मुद्दा तूल न पकड़ ले।
मोदी नहीं, उनकी बॉडी लैंग्वेज तकलीफदेह थी
पर शायर मुनव्वर राना के संवेदनशील मन की तकलीफ का सबब कुछ और ही है।
बताते हैं, ‘गुजरात दंगों के बाद मुख्यमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी। टीवी पर उसे मैंने भी देखा था। वे मुस्कुराते हुए आए थे।
उनके चेहरे पर जो भाव थे, उससे लगता था कि गुजरात में जो कुछ भी हुआ उसका उन्हें गम नहीं।’ राना कहते हैं कि दंगों से ज्यादा मोदी की वह बॉडी लैंग्वेज तकलीफदेह थी।
मोदी की पैरवी करते हैं तो बगल वाले घूरते हैं
हालांकि तमाम मोदी विरोध के बीच कुछ आवाजें ऐसी भी रही हैं जो कुछ महीने पहले मोदी को माफ कर नए सिरे से बात करने की पैरवी कर रहे थे, पर शायद कौम का मिजाज देखकर वे भी अब अपने कदम वापस खींचने को मजबूर हो रहे हैं।
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के उपाध्यक्ष शिया धर्मगुरु मौलाना कल्बे सादिक कहते हैं,‘हां, मैंने पूर्व में कुरान की रोशनी में कहा था कि बड़ा से बड़ा गुनाह माफ हो सकता है, बशर्ते तौबा भी उसी लिहाज में हो और नुकसान की संतोषजनक भरपाई भी।
पर मेरे उस बयान को गलत समझा गया और किसी तरफ से जवाब भी नहीं आया तो मैंने भी मोदी के मसले पर जुबान बंद कर ली।’
असल मुद्दे न चले जाएं पीछे
जेएनयू की प्रोफेसर डॉ. जोया हसन का कहना है कि चुनाव में मुसलमानों का एजेंडा वही हो सकता है जो हिंदुओं का, क्योंकि दोनों की दुश्वारियां भी कमोबेश एक जैसी हैं।
आधुनिक, भ्रष्टाचारविहीन, सांप्रदायिक तनाव से मुक्त भारत का ख्वाब दोनों देखते हैं।
पर जिस तरह से एक पार्टी ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री की कुर्सी की तरफ आगे बढ़ाया है, उससे मुसलमानों का ज्यादा फिक्रमंद होना स्वाभाविक है।
मोदी का जो अतीत रहा है और उनके शासनकाल में गुजरात में जो हुआ, उससे मुसलमानों को तरह-तरह की आशंकाएं हैं और चिंता भी। थोड़े लोग कुछ भी कहें पर अधिकतर मुस्लिम उन्हें माफ करने के मूड में शायद ही हों।
हां, चुनाव में इसका असर यह होगा कि जो भी मोदी की पार्टी के प्रत्याशी से ज्यादा मजबूती से जूझता दिखेगा, मुसलमान वोटर बिना कुछ कहे-सुने उसकी तरफ मुड़ जाएगा।
हां, सबसे अफसोसनाक बात यह होगी कि मुसलमानों के जो असल बुनियादी मसायल हैं, वो नेपथ्य में चले जाएंगे।
'बड़ी आबादी को दिल से मंजूर नहीं हैं मोदी'
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में एसोसिएट प्रोफेसर अर्शी खान का कहना है कि अगर मोदी पीएम बनते हैं, तो बड़ी आबादी दिल से उन्हें स्वीकार ही नहीं कर पाएगी।
गुजरात दंगों के बाद उनकी छवि ऐसी बनी है कि केरल से लेकर कन्याकुमारी तक का मुसलमान उनके प्रति एक-सा भाव रखता है।
उनके पीएम बनने को लेकर मुसलमानों में तरह-तरह की आशंकाएं हैं। पता नहीं कितनी सच्ची निकलेंगी, कितनी आधारहीन।
इतना जरूर है कि मुसलमान उनको लेकर कोई अच्छी बात नहीं सोच पा रहा है।
बेचैनी इसको लेकर भी है कि उनके पीएम बनने पर मुसलमानों की इस्लामी पहचान पर ही कोई ग्रहण न लग जाए।