इतिहास दोहरा पाएंगे 'आप' के विश्वास?
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
आम आदमी पार्टी को तमाम संज्ञाएं दी गईं। दिल्ली चुनाव से पहले पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने केजरीवाल एंड टीम को मानसून पेस्ट कहा, केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद ने नाली का कीड़ा कहा। लेकिन, हश्र क्या हुआ। तख्तापलट। दिल्ली की जमीं पर ही 15 साल से राज कर रही कांग्रेस सरकार बुरी तरह जमींदोज हो गई। हालांकि, कांग्रेस ने खेल रचा और 'आप' को बिना शर्त समर्थन देकर केजरीवाल को मुख्यमंत्री की गद्दी पर बैठा दिया। यहां भी मंसूबे फेल हो गए। केजरीवाल ने चार दिनों के भीतर ही ऐसे कदम उठा लिए, जिनकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। बिजली कंपनियों के ऑडिट से लेकर एंटी करप्शन हेल्पलाइन तक, सब कुछ झट-पट होता चला गया। ये राष्ट्र में बदल रही राजनीति का संकेत था। केजरीवाल ने बार-बार कहा, राजनीति करना तो साहब हम सिखाएंगे। जनता दरबार, सिक्योरिटी से किनारा, सरकारी बंगले को धता बताना...दूसरी पार्टियों ने भी ये सब करना शुरू किया। छत्तीसगढ़ से राजस्थान और उत्तर प्रदेश तक आम आदमी पार्टी का असर दिखा। इसी दौरान, एक बड़ा चुनावी एलान हुआ और पार्टियां हिल गईं।
बढ़ा 'विश्वास' तो बताया गया जोकर
ऐसा कुछ करने की हिम्मत भाजपा, सपा और बसपा जैसी राष्ट्रीय पार्टियां बीते कई बरसों में नहीं जुटा पाईं, लेकिन इस एक साल पुरानी पार्टी ने एक पल में फैसला ले लिया। आम आदमी पार्टी के नेता कुमार विश्वास ने एलान किया कि वे कांग्रेस के युवराज को उनके ही गढ़ में चुनौती देंगे। विश्वास ने दम भरा ही था कि इस राजपरिवार की जड़ें हिलने लगीं। कांग्रेस समर्थनों ने धमकी तक दे डाली। कहा गया, विश्वास अमेठी की धरती पर कदम भी नहीं रख पाएगा। लेकिन, हुआ इसके ठीक उलट। कुमार ने न सिर्फ अमेठी की जमीं पर कदम रखा, वहां जोरदार भाषण देकर यह साबित भी कर दिया कि आम आदमी पार्टी बदलाव का सफर तय कर रही है। न अंडों का असर हुआ, न झंडों का और न ही डंडों का। विश्वास की जनविश्वास रैली में हजारों की उमड़ी भीड़ ने इस बदलाव की कुछ हद तक तस्दीक भी की। विश्वास ने हुंकार भरी और कहा, अब देश पुकार रहा है साथ आ जाओ। कब तक एक परिवार की गुलामी करोगे। इसके बाद, फिर कांग्रेस के लोगों ने जुबानी हमला शुरू किया। कांग्रेस के राज्यसभा सांसद प्रमोद तिवारी ने विश्वास को गधा कहा तो एक नेता ने जोकर कह डाला। विश्वास ने इस पर भी सकारात्मक प्रतिक्रिया दी, 'चलिए, इन लोगों ने कम से कम मेरा प्रमोशन तो किया। पहले नाली का कीड़ा कहा था और अब जोकर।'
तीन दशक से कांग्रेस की आंधी
इतिहास के पन्नों पर जो कहानी दर्ज है, वह आम आदमी पार्टी की हौसलाअफजाई नहीं करती। पुराने चुनावों पर गौर डालें तो पता चलता है कि वंशवाद को सिर्फ एक बार ही चुनौती मिल सकी है। 1998 के अपवाद को छोड़ तकरीबन तीन दशक से कांग्रेस की आंधी देखती आई अमेठी ने पहली बार जनविश्वास रैली के दौरान हवा का बदलता रुख देखा। जिस अमेठी की तरफ बड़े-बड़े दिग्गजों ने देखने तक से गुरेज किया, वहीं साल भर पुरानी ‘आप’ चुनावी नतीजों से बेपरवाह अपनी जड़ें जमाने की जद्दोजहद में लगी दिखी। बड़े नेताओं से लेकर कार्यकर्ता तक इस बात का अहसास कराने में काफी हद तक कामयाब हुए कि नतीजा कुछ भी हो वे रुकने वाले नहीं हैं। यह मुकाबला काफी दिलचस्प होगा क्योंकि सिर्फ गांधी परिवार को हराने में सिर्फ बार ही कामयाबी हासिल हुई है। बाकी तो वहां राज कांग्रेस का ही रहा है। हालांकि, कुमार विश्वास का दावा है कि वह अमेठी में बदलाव की बयार देख रहे हैं। यह बयार विश्वास की बहती है या फिर राहुल की, यह तो वक्त ही बताएगा।
यहां बड़े-बड़े दिग्गजों ने चाटी धूल
1977 में संजय गांधी के चुनाव मैदान में उतरने के बाद अमेठी को राष्ट्रीय फलक पर पहचान मिली थी। शिकस्त के बावजूद संजय ने क्षेत्र नहीं बदला और जनता ने 1980 में उन्हें भारी मतों से जिताया। इसके साथ शुरू हुआ कांग्रेस की जीत का सिलसिला सिर्फ 1998 में टूटा जब डॉ. संजय सिंह यहां भारतीय जनता पार्टी के टिकट से चुने गए। 1980 से 2009 के लोकसभा चुनावों का दौर ऐसा रहा कि बड़े-बड़े सूरमा इस ओर देखने की हिम्मत तक नहीं जुटाते थे। खासतौर पर जब गांधी परिवार का कैंडीडेट रहा हो, विपक्षी पहले से ही अपनी बड़ी शिकस्त तय मानकर चलते थे। मौजूदा समय में जदयू अध्यक्ष शरद यादव, मेनका गांधी, बसपा के संस्थापक कांशीराम, महात्मा गांधी के पौत्र राजमोहन गांधी तक को यहां चुनाव में बड़ी शिकस्त मिली। चुनाव के बाद इनमें से कोई अमेठी नहीं आया। उसी अमेठी में रविवार को साल भर पुरानी आम आदमी पार्टी ने धमाकेदार एंट्री की। डॉ. कुमार विश्वास रहे हों या संजय सिंह अथवा पत्रकारिता छोड़ कर आए आशुतोष, यह मैसेज देने में काफी हद तक सफल दिखे कि वे अमेठी को न तो हल्के में ले रहे हैं ना ही उन्हें नतीजे की परवाह है।
बुनियादी बातों को फिर बना दिया मुद्दा
बड़ी पार्टियां बुनियादी बातें भूल चुकी हैं। आम आदमी पार्टी एक बार फिर बुनियादी बातों की राजनीति कर रही है। यही उसकी सबसे बड़ी ताकत भी है। आम आदमी से उसकी ही आवाज में बात करना आम आदमी ने एक बार फिर सिखा दिया है। दूसरी ओर, लंबे समय से बड़े-बड़े वादों की चुनावी रोटी सेंकने वाली पार्टियां केजरीवाल एंड टीम का सिर्फ मुंह ताक रही हैं। दरअसल, आम आदमी पार्टी ने बड़ी चतुराई से अमेठी की बुनियादी सहूलियतों को मुद्दा बनाते हुए जनता के पाले में गेंद डालने की कोशिश की। मंच से भ्रष्टाचार व वंशवाद पर तीखे प्रहार करने के बाद भी स्वराज के लिए अहिंसा का रास्ता न छोड़ने की पैरोकारी कर जता दिया कि ‘आप’ की राजनीति की धारा अलग है। बदले माहौल में चुनाव के नतीजे भले ही कुछ हों लेकिन ‘आप’ जन विश्वास रैली के जरिए कांग्रेस के दुर्ग में अपने बुलंद हौसले को धार देने में जरूर कामयाब रही।