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... जब शहीद अशफाक के अंतिम दर्शनों को चारबाग स्टेशन पर उमड़ा था हुजूम, पढ़ें यह किस्सा

Fri, 09 Aug 2019 05:31 PM IST
Amulya Rastogi न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ Published by: Amulya Rastogi Updated Fri, 09 Aug 2019 05:31 PM IST
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when people gathered in large number at charbagh railway station to see ashfaq for last time
अशफ़ाक़उल्ला ख़ां
काकोरी में सरकारी खजाना लूटकर अंग्रेजों की सत्ता को लंदन तक हिला देने वाले क्रांतिकारियों की शहादत के बाद अंतिम झलक पाने को शहरियों का हुजूम चारबाग स्टेशन पर उमड़ पड़ा था। नौ अगस्त 1925 के कांड में अंग्रेज हुकूमत ने क्रांतिकारियों पर लंबा मुकदमा चलाया। इसके बाद शहीदों को यूपी की अलग-अलग जेलों में 19 दिसंबर 1927 को फांसी दी गई। शहीद अशफाक उल्ला खां के अंतिम दर्शनों को चारबाग स्टेशन पर भारी तादात में लोग उमड़ पड़े थे।
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काकोरी केस में सजा काट चुके क्रांतिकारी रामकृष्ण खत्री के बेटे उदय खत्री ने बताया कि इसका जिक्र शहीद अशफाक उल्ला खां के वकील रहे कृपाशंकर हजेला एक लेख में करते हैं। उन्होंने बताया कि लखनऊ के जाने माने वकील कृपाशंकर हजेला ने अशफाक उल्ला खां के बचाव का भरपूर प्रयास किया। घरवालों की जिद के बाद अशफाक उन्हें ही वकील बनाने पर अडिग थे। 
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19 दिसंबर 1927 को गोरखपुर में रामप्रसाद बिस्मिल, प्रयागराज में ठाकुर रोशन सिंह और शहीद अशफाक उल्ला खां को फैजाबाद जेल में फांसी दे दी गई। फांसी के बाद जब शहीद अशफाक उल्ला खां की पार्थिव देह शाहजहांपुर ले जाई जा रही थी तो चारबाग स्टेशन पर अंतिम दर्शनों को खूब भीड़ उमड़ी। इसमें कृपाशंकर हजेला, चंद्रभानु गुप्त समेत नगर के तमाम प्रतिष्ठित लोग शुमार थे।
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दो प्रधानमंत्रियों के प्रयास से स्मारक को मिली पहचान

उदय खत्री बताते हैं 1977 में 50वीं बरसी पर काकोरी में स्मारक बनाये जाने की बात उठी। दिसंबर 1983 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने मद्रास से दिल्ली जाते समय तीन घंटे का समय निकालकर इसका शिलान्यास किया। बाकायदा वह एयरफोर्स पर उतरीं और हेलीकाप्टर से बाजनगर स्मारक स्थल पहुंची। उसके बाद रफ्तार सुस्त हो गई। 90 के दशक में अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रयास किया। 

उदय बताते हैं कि एक आयोजन में पिताजी ने अटलजी को आमंत्रित किया। अटलजी ने स्वीकृति भी दी थी। कुछ दिन पूर्व ही आने का समय बदल गया। ऐसे में कहीं पिताजी बुरा न मान जाएं अटलजी खुद कैसरबाग स्थित आवास पर सीढ़ियों से चढ़कर आए और आयोजन में शामिल न हो पाने के लिए माफी मांगी। इस पर पिताजी ने स्मारक बनवाने का वादा लेकर उन्हें माफ किया। 

पिताजी के निधन के बाद 1999 में कल्याण सिंह सरकार में यह स्मारक संवरकर सामने आया। 1999 में तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने शहीदों की प्रतिमाओं का अनावरण किया। अब यहां हर वर्ष नौ अगस्त को बरसी पर आयोजन होता है।
 

रखरखाव के लिए जारी किया जाए कार्पस फंड

शहीद स्मृति समारोह समिति के अध्यक्ष उदय खत्री ने बताया कि काकोरी शहीद स्मारक विकास एवं संरक्षण समिति के अध्यक्ष जिलाधिकारी और संरक्षक मंडलायुक्त हैं। पूर्व राज्यपाल राम नाईक की मौजूदगी में सरकार से मांग की गई थी। 
जिसके बाद पांच करोड़ का बजट जीर्णोद्धार के लिए मिला था। इसके अलावा कार्पस फं ड दे दिया जाए। ताकि हर वर्ष कार्यक्रम और देखरेख के लिए पैसे की कमी न रहे। उन्होंने कहा कि बगैर मुख्यमंत्री के प्रोजेक्ट में रुचि दिखाए स्मारक का संरक्षण संभव नहीं हैं। पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के बाद आज तक कोई मुखिया वहां नहीं पहुंचा है।

बहरहाल बदहाल हो रहा है स्मारक
देखरेख के अभाव में काकोरी शहीद स्मारक बदहाल हो रहा है। यहां शहीद मंदिर की दीवारें दरक रही हैं। मंदिर में लगे पत्थर टूट चुके हैं। आधार पर बना चबूतरा धंस गया है। अंदर दीवारों पर प्लास्टर न उखडे़ उसके लिए बीते दिनों मरम्मत हुई है। लाइटें तक खराब हो चुकी हैं। इससे यहां अंधेरा छाया रहता है। 

स्मारक रोशन करने को लगे 26 खंभों में से खराब हैं। बगीचा सींचने को लगवाया नलकूप भी बंद है। फव्वारा भी बदहाल हो गया है। सुंदरता के लिए लगे पुतले क्षतिग्रस्त हो चुके हैं। पुस्तकालय अक्सर बंद रहता है। मुख्य आयोजनों पर ही खुलता है। लोगों ने बताया कि इस मार्ग की सफाई मुख्य आयोजन के अवसर पर ही होती है।

जनप्रतिनिधि भी यहीं से चमकाते हैं राजनीति

काकोरी शहीद स्मारक को लेकर जनप्रतिनिधियों की वादाखिलाफी भी कम नहीं हैं। उनके बड़बोलेपन के चलते यह राष्ट्रीय स्मारक बन पाना तो दूर अभी तक इसको जोड़ने वाले मार्ग के रखरखाव की स्थाई व्यवस्था तक नहीं है। अगस्त 2016 में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने यहां से तिरंगा यात्रा का आगाज किया था, तब उदय खत्री ने यहां राष्ट्रीय स्मारक बनाए जाने की मांग उठाई थी। आश्वासन भी मिला, पर आगे बात नहीं बढ़ी। तत्कालीन विधायक इंदल रावत ने  मंच से पांच लाख रुपये देने की घोषणा की थी। लेकिन वे घोषणाएं ही रह गईं।

काकोरी कांड पर आयोजन आज
काकोरी कांड और अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन की स्मृति में स्वाधीनता संग्राम क्रांतिकारी वंशज संगठन और शहीद स्मृति समारोह समिति की ओर से शुक्रवार को सुबह 8 बजे काकोरी केस स्मृति स्तंभ जीपीओ पार्क में आयोजन होंगे। स्तंभ पर माल्यार्पण पुष्पांजलि होगी। 

उसके बाद 8:45 बजे दुबग्गा बाईपास स्थित काकोरी शहीद स्मृति उद्यान बसंत कुंज में अमर शहीदों की प्रतिमाओं पर माल्यार्पण पुष्पांजलि होगी। 9:15 बजे काकोरी शहीद स्मारक में दास्तानगो हिमांशु बाजपेई की दास्तानगोई समेत कई आयोजन होंगे।

तय प्लान से एक दिन बाद हो गई थी लूट

अंग्रेजी हुकूमत को हिलाने के लिए 9 अगस्त 1925 को राजधानी से 13 किमी दूर घटी यह घटना काकोरी ट्रेन लूट कांड के नाम से चर्चित हुई। आंदोलन के लिए रकम जुटाने को क्रांतिकारियों ने तय किया था कि सहारनपुर पैसेंजर से आ रहे खजाने को लूटा जाए। तारीख 8 अगस्त तय की गई, देर से पहुंचने के चलते ट्रेन जा चुकी थी। 

अगले ही दिन 9 अगस्त को क्रांतिकारियों ने लूट को अंजाम दिया। बताया जाता है कि इसमें पौने पांच हजार रुपये हाथ लगे थे। ट्रेन को जंजीर खींचकर रोका गया। खजाने के संदूक को नीचे गिराया गया। पटरी के दोनों और क्रांतिकारी पिस्तौल लेकर पहरा देते रहे। घटना के बाद अंग्रेजों ने कई क्रांतिकारियों को पकड़ा, जिन पर मुकदमा चला।

शहीदों से जुड़े वृत्तचित्र दिखने को बना एम्फीथिएटर
काकोरी कांड एवं शहीदों की जीवन संघर्ष से जुड़ी गाथाएं दिखाने को एम्फ ीथिएटर, मुक्तकाशी थिएटर बनवाया गया है। स्मारक के दक्षिणी हिस्से में ट्रेन की पटरी की ओर दस हजार वर्ग फीट का हॉल और एम्फीथिएटर का निर्माण कराया जा चुका है। 

थिएटर में एक हजार वर्ग फीट की स्क्रीन है। जिसके तीनों और सीढ़ी है। इस पर आने जाने वाले लोग बैठकर खुले थिएटर में देशभक्ति व शहीदों से जुड़ी फिल्में या वृत्तचित्र देख सकते हैं। काकोरी कांड वर्षगांठ समेत अन्य अवसरों पर थिएटर चलता है।
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