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यूपी चुनाव: ...जब कांग्रेसियों ने अपने ही नेता को अफवाह उड़ाकर हरवा दिया, एक बात ने बदल दिया था माहौल

Wed, 05 Jan 2022 01:10 PM IST
ishwar ashish अखिलेश वाजपेयी, अमर उजाला, लखनऊ
अखिलेश वाजपेयी, अमर उजाला, लखनऊ Published by: ishwar ashish Updated Wed, 05 Jan 2022 01:10 PM IST
सार

राजनीति में गुटबाजी कोई नई बात नहीं है। पढ़ें 1957 के चुनाव का एक मामला जब कांग्रेसियों ने अपने ही नेता को अफवाह उड़ाकर हरवा दिया।

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when congress leaders worked against its leader chandrabhanu gupta.
चंद्रभानु गुप्ता। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

राजनीति में गुटबाजी कोई नई बात नहीं है। अतीत की घटनाओं पर नजर दौड़ाएं तो गुटबाजी और राजनीति शायद शुरू से ही एक-दूसरे की हमसफर रही हैं। अलबत्ता कांग्रेस का इतिहास इस मामले में ज्यादा पुराना नजर आता है। इसकी वजह शायद इसका सबसे पुरानी पार्टी होना भी हो सकता है।

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बात 1957 की है। तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. संपूर्णानंद के मंत्रिमंडल में चंद्रभानु गुप्ता उद्योग मंत्री थे। उन्होंने कई योजनाएं शुरू कराईं, लेकिन 1957 का चुनाव हार गए। इस हार के लिए उन्होंने कांग्रेस की गुटबाजी को दोषी ठहराया। वैसे गुटबाजी ने चंद्रभानु गुप्ता का पीछा नहीं छोड़ा। उनकी जीवनी ‘सफर कहीं रुका नहीं, झुका नहीं’ में चंद्रभानु गुप्त के हवाले से बताया गया है, ‘पं. कमलापति त्रिपाठी ने मेरे खिलाफ डॉ. संपूर्णानंद के खूब कान भरे, ताकि मुझे फिर मंत्री न बनाया जाए। लिहाजा कांग्रेस ने फैसला किया कि जो लोग चुनाव हार गए हैं, उन्हें न तो मंत्रिमंडल में लिया जाएगा और न एक साल तक वह उप चुनाव लड़ सकते हैं।
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एक साल बीता तो कांग्रेस हाईकमान ने मुझे चुनाव लड़ने की इजाजत दे दी। पं. गोविंद वल्लभ पंत चाहते थे कि मैं रानीखेत से चुनाव लड़ूं, लेकिन मैं वहां से चुनाव लड़ने का इच्छुक नहीं था। तभी हमीरपुर के मौदहा से एमएलए रामगोपाल ने अपनी सीट से चुनाव लड़ने का प्रस्ताव दिया। मैं वहां से चुनाव लड़ने को तैयार हो गया।’

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चंद्रभानु को नहीं थी इस तरह की आशंका

आम चुनाव में इस सीट पर प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के नेता एवं बुंदेलखंड में काफी प्रभावशाली दीवान शत्रुघ्न सिंह 1957 का आम चुनाव हार गए थे। पहले उनकी पार्टी के ही विरोधियों ने शत्रुघ्न सिंह को चुनाव लड़ने के लिए तैयार करने की कोशिश की। जब वे तैयार नहीं हुए तो उनकी पत्नी को निर्दल उम्मीदवार बनाने की सलाह दी। सभी विरोधी दलों के साथ वे सभी (पार्टी के ही मेरे विरोधी) उनका समर्थन करेंगे।

जीवनी के अनुसार, आखिरकार शत्रुघ्न अपनी पत्नी रानी राजेंद्र कुमार को गुप्ताजी के खिलाफ उम्मीदवार बनाने पर राजी हो गए। विरोधियों की योजना सफल हो गई। रानी का बुंदेलखंड में काफी सम्मान था। ...मेरे साथ जो हुआ उसका मुझे सपने में भी विश्वास नहीं था। मुझे यह तो आशंका थी कि पार्टी के कई बड़े नेता मुझे हराने के लिए मेरे विरुद्ध कार्य करेंगे। पर, यह आशंका नहीं थी कि सरकारी अधिकारियों को भी मेरे विरुद्ध कार्य करने के लिए उकसाया जा सकता है।

अनुसूचित जाति के लोगों को डरा-धमकाकर वोट डालने से रोका जाएगा। साथ ही मेरे खिलाफ चुनाव लड़ रहीं रानी साहिबा को लेकर मेरे खिलाफ काफी घटिया एवं जहरीला प्रचार करेंगे। कांग्रेस के तत्कालीन नेता केशवदेव मालवीय, सरदार योगेन्द्र सिंह, मोहनलाल गौतम जैसे लोगों ने वह काम किया, जिसकी सपने में भी उम्मीद नहीं थी।

जबरन शादी की अफवाह ने बिगाड़ा उनका माहौल

मौदहा के निवासी लोकतंत्र सेनानी और वरिष्ठ पत्रकार देवीप्रसाद गुप्त बताते हैं कि लोगों को उम्मीद थी कि चंद्रभानु जीते तो क्षेत्र का काफी विकास होगा। गुप्त जी ने भी काफी मेहनत की। सैकड़ों की तादाद में साइकिलें बांटीं। साथ ही लाउडस्पीकर एवं माइक दिए गए। लोगों ने गुप्त जी के समर्थन में वोट मांगे। पर, मतदान से एक दिन पहले कुछ लोगों ने मौदहा में यह अफवाह उड़ा दी कि गुप्त जी जीते तो रानी का डोला (किसी को उठाकर उससे जबरन शादी करना) उठा ले जाएंगे। इससे लोग भड़क गए।

लोगों ने इसे बुंदेलखंड का अपमान माना। गुप्त जी एवं उनके समर्थकों ने सफाई देने की भरसक कोशिश की, लेकिन कुछ नहीं हो सका। जनता शांत नहीं हुई। उसने रानी के पक्ष में एकतरफा वोटिंग कर दी। गुप्त जी बुरी तरह चुनाव हार गए। बकौल देवीप्रसाद रानी साहिबा ने आजादी के आंदोलन में अंग्रेजों के खिलाफ काफी संघर्ष किया था। वह गरीबों की मददगार भी थीं। इस कारण उनका लोगों में बड़ा सम्मान था।

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