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यूपी: कांग्रेस को समीक्षा नहीं, सर्जरी की जरूरत, हार से पार्टी में नीचे तक नाराजगी, इस्तीफों का दौर शुरू

Sun, 13 Mar 2022 03:42 PM IST
ishwar ashish अजीत बिसारिया, अमर उजाला, लखनऊ
अजीत बिसारिया, अमर उजाला, लखनऊ Published by: ishwar ashish Updated Sun, 13 Mar 2022 03:42 PM IST
सार

यूपी चुनाव में कांग्रेस की करारी हार के बाद पदाधिकारी इस्तीफे दे रहे हैं और बड़े परिवर्तन की मांग कर रहे हैं। प्रियंका गांधी द्वारा टिकट वितरण के फैसलों पर भी सवाल उठ रहे हैं।

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Veteran leaders speak UP Congress needs big changes.
कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाड्रा। - फोटो : amar ujala

विस्तार

यूपी में खड़ा होने के लिए कांग्रेस को अब बड़ी सर्जरी की जरूरत है। पारंपरिक तौर की जाने वाली समीक्षाओं से काम चलने वाला नहीं है। विधानसभा चुनाव में टिकट देने में जिस तरह के प्रयोग हुए, वे कई सवाल छोड़ गए हैं। करारी हार से पार्टी में नीचे तक नाराजगी दिख रही है। उधर, पदाधिकारियों के इस्तीफा देने का सिलसिला भी शुरू हो गया है।

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कांग्रेस यूपी विधानसभा में अब तक की सबसे खराब स्थिति में है। उसके हिस्से में सिर्फ दो सीटें ही आईं। पार्टी के महज चार प्रत्याशी ही पूरे प्रदेश में दूसरे स्थान पर रहे। ये विधानसभा क्षेत्र हैं- जगदीशपुर, खैरागढ़, किदवई नगर और मथुरा। मथुरा में कांग्रेस दूसरे नंबर पर जरूर रही, पर हार-जीत का अंतर एक लाख से ज्यादा का रहा।
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कांग्रेस के ही एक नेता कहते हैं कि प्रयोग के तौर पर निजामाबाद से पार्टी के भीतर ही चर्चित टीम के खास माने जाने वाले अनिल यादव को टिकट दिया गया। वह कुछ समय पहले ही कांग्रेस से जुड़े थे। उन्हें प्रदेश कांग्रेस में संगठन सचिव सरीखा अहम पद भी दिया गया, लेकिन चुनाव में उन्हें सिर्फ 2,297 वोट मिले।
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इसी तरह उन्नाव में प्रयोग के तहत उतारे गए प्रत्याशी को महज 1,555 वोट मिले। यानी ये प्रत्याशी कांग्रेस के प्रदेश में मामूली मत प्रतिशत के बराबर भी वोट नहीं पा सके। ऐसे में इस तरह के प्रयोगों का फैसला लेने वालों पर सर्जरी जरूरी है। क्योंकि पार्टी के ही कई पुराने नेताओं ने उस वक्त भी इस पर एतराज जताया था।

पार्टी को इवेंट कंपनी के भरोसे छोड़ देने वालों पर विचार जरूरी
रुद्रपुर से कांग्रेस ने अपने पुराने नेता अखिलेश प्रताप सिंह को उतारा। उन्हें 30 हजार से ज्यादा मत मिले। इलाहाबाद उत्तरी से प्रत्याशी बनाए गए कांग्रेस के पुराने नेता अनुग्रह नारायण सिंह को 23 हजार से ज्यादा मत मिले। पुराने कांग्रेसियों का कहना है कि भले ही कांग्रेसी बैक ग्राउंड वाले प्रत्याशी जीत नहीं सके, पर वे नहीं होते तो पार्टी के मत एक फीसदी से नीचे पहुंचने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है। उनका कहना है कि पूरी पार्टी को अपने निष्ठावान कार्यकर्ताओं के बजाय इवेंट कंपनी के भरोसे छोड़ देने वालों के बारे में विचार करना भी जरूरी है।

पदाधिकारियों के इस्तीफे देने का सिलसिला जारी रहने की उम्मीद

पार्टी की दुर्दशा पर लखनऊ, उन्नाव और बिजनौर आदि जिलों में पदाधिकारी इस्तीफा दे चुके हैं। यह सिलसिला आगे भी जारी रहने की उम्मीद जताई जा रही है। 90 के दशक से कांग्रेस से जुड़े एक नेता कहते हैं कि हम नए प्रयोगों के खिलाफ नहीं है। मगर ये फैसले एक टीम के तहत लिए जाने चाहिए। अगर बाहर से आए कुछ लोग मनमाने ढंग से फैसला लेंगे तो फिर इससे बेहतर नतीजों की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए। यह नई ऊर्जा के साथ जुटने और नेतृत्व करने वाली टीम में बदलाव का वक्त है ताकि अगले दो साल कड़ी मेहनत से पार्टी लोकसभा चुनाव तक बेहतर स्थिति में आ सके।

प्रतिक्रिया पर निष्कासन उचित नहीं : ओंकार नाथ सिंह
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ओंकार नाथ सिंह ने इस बारे में सोशल मीडिया के माध्यम से अपने विचार साझा किए हैं। उन्होंने लिखा है कि हार के बाद गुस्सा आना स्वाभाविक है और नेतृत्व को लोगों की बात सुननी चाहिए। क्या कारण थे, जिससे हमारी यह स्थिति हुई। हमें केवल ढाई प्रतिशत ही वोट मिले, जबकि बसपा को एक सीट ही मिली पर वोट उसको 12 प्रतिशत मिले। ओंकार आगे लिखते हैं कि हम अपनी पीड़ा नेतृत्व से नही कहेंगे, तो किससे करेंगे। नेतृत्व का भी इतनी जल्दी किसी भी प्रतिक्रिया पर किसी को भी पार्टी से निष्कासित करना उचित नहीं है। उसे लोगों के असंतोष को भी सुनना चाहिए।

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