Exclusive: यूपी ने बीमारी की हालत में देश को नौ प्रधानमंत्री दिए, सोचिए अगर यह राज्य स्वस्थ रहता तो क्या होता?
उत्तर प्रदेश भारतीय राजनीति की धुरी है। इतिहास जब भी निरपेक्ष भाव से राजनीति के भूगोल को पढ़ेगा, तो उसे उत्तर प्रदेश में बुनियादी बदलाव की असंख्य प्रयोगशालाएं मिलेंगी। बीते 75 सालों में उत्तर प्रदेश ने इस देश की राजनीति को सजाया, संवारा, मांजा, बांटा और उसे नई-नई दिशा दी।
विस्तार
पहले यूनाइटेड प्रॉविंस के नाम से राज्य की पहचान थी। 12 जनवरी 1950 को पहली बार उत्तर प्रदेश नाम अस्तित्व में आया। उस समय चंद घरानों के गिने-चुने उद्योग थे या अंग्रेजों की लगाईं कानपुर की कपड़ा मिलें थीं, जो जर्जर हो रहीं थीं। पिछड़ेपन के लिये राज्य ने काऊ बेल्ट कहे जाने का दंश भी सहा है। लेकिन इस दंश को ही राज्य के जुझारू लोगों ने बाद में ताकत में बदल दिया...
राज्य ने देश की राजनीति को विविध आयाम दिए
उत्तर प्रदेश वह विराट चुंबक है, जिसके स्पर्श के बिना भारत की राजनीति फलित नहीं होती। इस राज्य ने देश की राजनीति को विविध आयाम दिए। आजादी के पचहत्तर साल बाद भी उत्तर प्रदेश ही देश की राजनीति की धुरी है। ये बात अलग है कि उत्तर प्रदेश लगातार ‘प्रश्न प्रदेश’ बना रहा। देश का बंटवारा, उसके बाद बंटवारे की राजनीति, विखंडित होता समाज, धर्म, संप्रदाय की भेंट चढ़ती लोकनीति, घटता रोजगार, बिगड़ती खेती, दलित राजनीति का उफान और मंदिर-मस्जिद के सारे प्रश्न इसी प्रदेश में पैदा हुए।
इतिहास जब भी निरपेक्ष भाव से राजनीति के भूगोल को पढ़ेगा, तो उसे उत्तर प्रदेश में बुनियादी बदलाव की असंख्य प्रयोगशालाएं मिलेंगी। बीते 75 सालों में उत्तर प्रदेश ने इस देश की राजनीति को सजाया, संवारा, मांजा, बांटा और उसे नई-नई दिशा दी। देश की आजादी के आंदोलन का नेतृत्व लाहौर कांग्रेस के ‘पूर्ण स्वराज’के नारे के साथ जब उत्तर प्रदेश के हाथ आया तो फिर कभी वापस नहीं गया। सात दशक की भारतीय राजनीति की सभी धाराओं की गंगोत्री यही राज्य है। चाहे वह जाति का गणित हो या बहुसंख्यक ताकत का आतंक, समाजवादी उछाह हो या राजनीति में परिवारों का प्रभुत्व। भारतीय राजनीति की सारी करवट उत्तर प्रदेश की छाया में है।
बरेलवी और देवबंदी फिरके इसी प्रदेश की जमीन पर जन्मे
उत्तर प्रदेश के वर्तमान को समझने के लिए उसके अतीत से वाकिफ होना जरूरी है। देशभर में अच्छा बुरा जो कुछ हुआ, उसकी जड़ें आपको उत्तर प्रदेश में मिलेंगी। इसी राज्य ने मुल्क को आजादी दिलाई, लेकिन मुल्क के बंटवारे की मांग भी यहीं से उठी। मंडल के बाद सामाजिक बिखराव के बीज यहीं फूटे। धर्म और राजनीति की सबसे बड़ी प्रयोगशाला मथुरा, काशी, अयोध्या यहीं बनी। उत्तर प्रदेश से ही इस्लाम की दुनियाभर में मशहूर दो धाराएं जन्मीं। बरेलवी और देवबंदी फिरके इसी प्रदेश की जमीन पर जन्मे और पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में फैल गए। तालिबानियों की तालीमी जड़ें देवबंद में ही हैं।
इन फिरकों का जिक्र इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि ये उत्तर प्रदेश की जमीन की उपजाऊ तासीर के गवाह हैं। ये तासीर जितनी सियासी है, उतनी ही मजहबी भी। बरेलवी और देवबंदी तबकों का जिक्र जितना धर्म के लिए हुआ, उतना ही सियासत के लिए भी। अयोध्या, काशी, मथुरा, बरेलवी, देवबंदी यह वह तत्व है, जिससे देश के सामाजिक और राजनीतिक ध्रुवीकरण का ‘न्यूक्लियस’ यह राज्य बना।
राजनीति के ‘पावर हाउस’ बने रहने के बावजूद उत्तर प्रदेश की बदकिस्मती देखिए कि यह राज्य सात दशक से बीमारू राज्य की सूची से बाहर नहीं आ पाया। खुद को बदलने का साहस नहीं कर पाया है। जन कवि धूमिल को लिखना पड़ा-‘भाषा में भदेस हूं, इतना कायर हूं कि उत्तर प्रदेश हूं।’
...और विकास की राजनीति में पिछड़ता चला गया उत्तर प्रदेश
विसंगति रही कि इस राज्य ने बीमारी की हालत में भी देश को नौ प्रधानमंत्री दे दिए। जरा सोचिए जब यह राज्य बीमार होकर देश को नौ प्रधानमंत्री दे सकता है, तो स्वस्थ रहता तो क्या होता? तमाम राजनीतिक दल इस राज्य की छाती पर चढ़ सत्ता में तो आते रहे। लेकिन इसके मुस्तकबिल को बदलने की कोशिश नहीं की। विकास की दौड़ में उत्तर प्रदेश नीचे खिसकता चला गया। जाति और संप्रदाय की राजनीति के चलते उत्तर प्रदेश की राजनीति का जातीय और वर्गीय चरित्र बदला। सरकारें काम पर नहीं, भावनाओं पर बनी बिगड़ीं। बनती बिगड़तीं सरकारों की उम्र एक दो साल ही रही।
जल्दी-जल्दी बदलती सरकारें एक दूसरे की शत्रु बनीं और विकास इस शत्रुता की भेंट चढ़ गया। एक सरकार आई, तो पूर्ववर्ती सरकार की योजनाएं बंद। पहली लौटी तो दूसरे वाले की बंद। इस घटिया खेल में फंस उत्तर प्रदेश का औद्योगिकीकरण से भी फोकस बिगड़ गया। ढांचागत सुविधाओं पर ध्यान नहीं रहा।
उत्तर प्रदेश का किसान देश में गन्ना सबसे ज्यादा पैदा करता है। पर गन्ना किसानों को सहूलियतें महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा मिलती हैं। यहां के गन्ना किसान का भाग्य मिल मालिकों की मुट्ठी में कैद हो गया। केरल में हर पांच साल में सरकार बदल जाती है। पर वहां सरकार बदलने से विकास का एजेंडा नहीं बदलता, इसलिए केरल विकास की रफ्तार में हमेशा अव्वल रहता है।
उत्तर प्रदेश राजनीतिक तौर पर कभी कमजोर नहीं हुआ
उत्तर प्रदेश हमेशा लड़ा, जूझा, पर उसे हासिल कुछ नहीं हुआ। बावजूद इसके वह राजनीतिक तौर पर वह कमजोर नहीं रहा। 1857 का गदर हो या आजादी का आंदोलन। आजादी की सारी मुख्य लड़ाइयां इसी प्रदेश में लड़ी गईं। मेरठ का विद्रोह, चौरी-चौरा, काकोरी सब यहीं हुए। सबसे ज्यादा लोग आजादी की लड़ाई में इसी प्रदेश से जेल गए। आजादी की रणनीति ही नहीं, देश को बांटने के कुचक्र भी यहीं रचे गए। 1937 में देश के विभाजन की नींव लखनऊ के मुस्लिम लीग के सम्मेलन में पड़ी। यहीं मोहम्मद अली जिन्ना ने ‘दो राष्ट्र के सिद्धांत’ की नींव रखी।
राजनीति की गैर-कांग्रेसी और गैर-भाजपा धारा भी उत्तर प्रदेश की कर्जदार है। 1952 में भारत को जो समाजवाद मिला। उसे लोहिया ने इसी प्रदेश में गढ़ा। उन्होंने दुनिया के साम्यवाद और पूंजीवाद दोनों को नकार भारत को एक नया ‘भारतीय समाजवाद’ दिया। आचार्य नरेंद्र देव और लोहिया ने गैर कांग्रेसवाद का विकल्प तलाशने में 1963 में इसका प्रयोग किया। तब उत्तर प्रदेश में लोकसभा के तीन उप-चुनाव होने थे। डॉ. लोहिया कन्नौज से, आचार्य जेबी कृपलानी अमरोहा से और दीनदयाल उपाध्याय जौनपुर से गैर-कांग्रेसी गठजोड़ के उम्मीदवार बने। इस प्रयोग ने देश में गैर-कांग्रेसवाद की शक्ल ली। इन चुनाव के नतीजों ने साबित किया कि कांग्रेस को सत्ता से बेदखल किया जा सकता है।
यहीं पड़ी संगठन आधारित राजनीति की जमीन
भारतीय जनता पार्टी के जिस विराट स्वरूप को हम आज देख रहे हैं, उसकी जड़ें तलाशने के लिए हमें कानपुर जाना पड़ेगा। यहीं जनसंघ के पहले अधिवेशन में पं. दीनदयाल उपाध्याय ने संगठन आधारित राजनीति की नींव डाली। उस वक्त डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी सक्रिय राजनीति के हिमायती थे और दीनदयाल उपाध्याय संगठन बनाने के। फिर रास्ता निकला संगठन आधारित राजनीति का।
ध्रुवीकरण की राजनीति ने उत्तर प्रदेश के राजनीतिक मिजाज को बदल दिया। जो राजनीतिक दल 30 बरस पहले ‘अयोध्या’ मुद्दे को चिमटे से भी नहीं छूना चाह रहे थे, वे सब आज अयोध्या का चक्कर लगा रहे हैं। मंदिरों के घंटे बजा रहे हैं। अयोध्या सभी दलों के राजनीति के केंद्र में आ गई।
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को बेपटरी करने की वजह यही अयोध्या बनी। इन पचहत्तर सालों में कांग्रेस इस मुद्दे पर गंभीर दुविधा और असमंजस में रही। वह कभी ‘शाहबानो’ तो कभी ‘अयोध्या’ के सवाल पर झूलती रही। शाहबानो मामले से हुए नुकसान की काट के लिए कांग्रेस अयोध्या का मुद्दा ठंडे बस्ते से निकाल लाई। ताला खुलवाया।
जब लगा सांप्रदायिक संतुलन बिगड़ा, तो मंदिर की कारसेवा रुकवाई। फिर फायदे की आस में शिलान्यास करवाया। फौरन बाद रामराज्य के लक्ष्य के लिए राजीव गांधी ने अयोध्या से ही अपने चुनाव अभियान का श्रीगणेश किया। तब भी वे दुविधा पर सवार थे। फिर उन्होंने सेक्यूलरिज्म ओढ़ लिया। इस दुविधा के द्वैत ने कांग्रेस को हाशिये पर डाल दिया।
यूपी ने ही हिंदुत्ववादी सोच को राष्ट्र के सियासत की धुरी बना रखा है
हिंदू संगठनों की राजनीति भी इसी जमीन पर जमकर फली फूली। 6 मार्च 1983 को मुजफ्फरनगर में एक विराट हिंदू सम्मेलन हुआ। इसी सम्मेलन में सबसे पहले रामजन्मभूमि मुक्ति का प्रस्ताव पास हुआ। संगठन बना। विश्व हिंदू परिषद ने आंदोलन हाथ में लिया और भाजपा ने 1989 में अपने एजेंडे में शामिल किया। लोकसभा की दो सीटों से वो नब्बे सीटों पर पहुंची। उत्तर प्रदेश में उसकी सरकार बन गई।
पिछले साढ़े सात दशकों में गंगा यमुना गोमती में बहुत पानी बहा है। सरजू न जाने कितनी बार खतरे के निशान के ऊपर गई है। मगर देश की राजनीतिक धारा तय करने की यूपी की फितरत नहीं बदली है।
यूपी ने ही हिंदुत्ववादी सोच को राष्ट्र के सियासत की धुरी बना रखा है। यूपी गुजरे 75 सालों में राजनीति की दृष्टि से जितना ताकतवर रहा है, उस हिसाब से चौतरफा विकास के मानक पर उसे देश में नम्बर 1 होना चाहिए था। प्रदेश की तकदीर को आज भी इसका इंतजार है।