कैबिनेट का बड़ा फैसला, यूपी बनेगा निवेश-फ्रेंडली, 13 वाणिज्यिक कोर्ट को मंजूरी
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मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता वाली यूपी कैबिनेट ने कारोबारी सहूलियतों के लिहाज से महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए मंगलवार को 13 जिलों में वाणिज्यिक अदालतों की स्थापना को मंजूरी दे दी है। इन न्यायालयों में वाणिज्यिक विवादों का ही निपटारा होगा। इनमें लखनऊ, फैजाबाद, कानपुर, वाराणसी और गौतमबुद्ध नगर जैसे जिले शामिल हैं। इन न्यायालयों की स्थापना की व्यवस्था शासकीय गजट में अधिसूचना के प्रकाशन की तिथि से लागू होगी।
केंद्र सरकार ने ‘ईज ऑफ डुइंग बिजनेस’ केअंतर्गत प्रदेश को 372 बिंदुओं पर काम का एजेंडा सौंपा है। इसमें निवेशकों से जुड़े विवाद का समय से निस्तारण भी शामिल है। योगी सरकार ने इस संबंध में हाईकोर्ट से विचार विमर्श के बाद वाणिज्यिक अदालतों की स्थापना का प्रस्ताव तैयार किया।
सूत्रों ने बताया कि हाईकोर्ट ने ‘द कॉमर्शियल कोट्स कामर्शियल डिवीजन एंड कॉमर्शियल अपीलेट डिवीजन ऑफ हाईकोर्ट एक्ट-2015’ (अधिनियम संख्या-4/2016) की धारा-3 के अंतर्गत 13 जिलों में वाणिज्यिक न्यायालयों का प्रस्ताव दिया था।
यह फायदा
उद्यमियों के वाणिज्यिक विवादों का शीघ्र निस्तारण होगा। इससे देश व प्रदेश में व्यापार के लिए अनुकूल माहौल बनेगा।
सोशल मीडिया कम्युनिकेशन हब को मंजूरी
केंद्र की तर्ज पर उत्तर प्रदेश में सोशल मीडिया कम्युनिकेशन हब बनेगा। इसकी मदद से विभिन्न सरकारी विभागों में होने वाले कामों को प्रमोट किया जाएगा। कैबिनेट ने इसकी मंजूरी दे दी। इससे सरकारी नीतियों, योजनाओं और उपलब्धियों को आमजन तक पहुंचाने में मदद मलेगी। सोशल मीडिया हब की स्थापना, प्रबंधन एवं एनालिसिस के लिए केंद्रीय संस्था ब्रॉडकास्ट इंजीनियरिंग कंसल्टेंट्स इंडिया लिमिटेड (बेसिल) को जिम्मेदारी दी गई है।
उसे यह काम एक साल के लिए दिया गया है। बेसिल इसके लिए यूपी में अपने हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर स्थापित करेगी और सरकार से संबंधित सोशल मीडिया के सभी काम देखी। सरकार की ब्रांडिंग के साथ-साथ सोशल मीडिया पर सरकार के विरोध में आने वाली खबरों का खंडन और उसकी सही जानकारी जनता के बीच पहुंचाने की जिम्मेदारी भी इसी संस्था की होगी।
सरकार से संबंधित संवेदनशील दस्तावेज और अन्य डाटा को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी बेसिल कंपनी की होगी। इस पर लगभग 1.58 करोड़ रुपये का खर्च आएगा। वहीं कंसल्टेंसी फीस और अन्य टैक्स सरकार को देने होंगे। जल्द ही संबंधित कंपनी को वर्कऑर्डर उपलब्ध करा दिया जाएगा और इसे लखनऊ में स्थापित कर दिया जाएगा।
इलाहाबाद में आरक्षित क्षेत्र विकसित करने का फैसला
राज्य सरकार ने काला हिरनों के संरक्षण के लिए इलाहाबाद में आरक्षित क्षेत्र विकसित करने का फैसला किया है। इलाहाबाद के मेजा वन प्रभाग में काला हिरन आरक्षित वन क्षेत्र के प्रस्ताव को कैबिनेट की मंगलवार को हुई बैठक में हरी झंडी दे दी गई। इससे जहां ईको पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा, वहीं स्थानीय निवासियों को रोजगार के अवसर भी मिलेंगे।
घास के मैदानों और खुले वनों में पाए जाने वाले कृष्ण मृग को काला हिरन भी कहा जाता है। यह एंटीलोप प्रजाति का जीव है। अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ ने वर्ष 2003 में कृष्ण मृग को लुप्तप्राय श्रेणी में रखा था। काला हिरन के सरंक्षण और प्रबंधन के लिए ही वन्य जीव (संरक्षण) अधिनियम-1972 यथा संशोधित की धारा-36 ए(1) व (2) के तहत काला हिरन संरक्षण आरक्षित क्षेत्र (कन्जर्वेशन रिजर्व) घोषित किए जाने का प्रस्ताव तैयार किया गया था।
मुजफ्फरनगर-सहारनपुर मार्ग को बेहतर बनाने का रास्ता साफ
देवबंद होते हुए मुजफ्फरनगर-सहारनपुर मार्ग के सुदृढ़ीकरण का रास्ता साफ हो गया है। कैबिनेट ने को वायबिलिटी गैप फंडिंग (वीजीएफ) देने के संशोधित प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। अप्रैल 2011 में 52.950 किलोमीटर लंबे मुजफ्फरनगर-सहारनपुर वाया देवबंद मार्ग (राजमार्ग संख्या 59) को पीपीपी मोड में उच्चीकरण और रख-रखाव के लिए सैद्धांतिक अनुमोदन दिया गया था।
30 सेंटीमीटर से कम व्यास की आरा मशीनें लाइसेंस से मुक्त
प्रदेश में 30 सेंटीमीटर से कम व्यास की आरा मशीनों के इस्तेमाल के लिए अब किसी तरह के लाइसेंस लेने की जरूरत नहीं होगी। कृषि वानिकी को बढ़ावा देने के लिए कैबिनेट ने इस प्रस्ताव पर मुहर लगा दी है। इससे किसान अपने खेतों में लगाए गए पेड़ों का वाजिब मूल्य पा सकेंगे।
काष्ठ आधारित उद्योग के विकास एवं प्रोत्साहन के लिए उत्तर प्रदेश काष्ठ आधारित उद्योग (स्थापना एवं विनियमन षष्ठम संशोधन) नियमावली-2017 को कैबिनेट ने मंजूरी दे दी। यह नियमावली लकड़ी आधारित उद्योगों से संबंधित है। इस तहत 30 सेंटीमीटर व्यास से कम नाप की आरा मशीन प्रयोग करने पर लाइसेंस की जरूरत नहीं होगी, बशर्ते छूट में शामिल प्रजातियों की लकड़ी या विदेश से मंगाई गई लकड़ी का उपयोग किया जाए।
प्रदेश में अधिकाधिक आरा मशीनें लग सकेंगी
यहां बता दें कि हाल ही में राज्य सरकार ने किसानों को अधिकांश प्रजातियों को काटने और प्रदेश में कहीं भी लाने-ले जाने की पूरी छूट दे दी है। नई नियमावली लागू होते ही प्रदेश में अधिकाधिक आरा मशीनें लग सकेंगी, जिससे किसानों को अपने खेतों में लगाए गए पेड़ों को बेचने में कोई मुश्किल नहीं आएगी। नई नियमावली के तहत जिस उद्योग को लाइसेंस की आवश्यकता होगी, उसे राज्यस्तरीय समिति के अनुमोदन से प्रभागीय वन अधिकारी अनुमति पत्र जारी करेंगे।
पहले ऐसे उद्योग वन की सीमा के 10 किलोमीटर के दायरे में नहीं लगा सकते थे, पर अब ऐसे उद्योग नगर पालिका या औद्योगिक स्टेट में लगाने पर वन सीमा से 10 किलोमीटर की बाध्यता लागू नहीं होगी। लाइसेंस शुल्क भी राज्य स्तरीय समिति निर्धारित करेगी, जिसमें काष्ठ आधारित उद्योग का एक प्रतिनिधि भी शामिल होगा।
यहां बता दें कि केंद्र सरकार की नई गाइडलाइंस के अनुसार, उत्तर प्रदेश आरा मिल की स्थापना और विनियमन नियमावली-1978 में संशोधन किया गया है। नियमावली-2017 में काष्ठ आधारित उद्योग को लाइसेंस देने, नामांतरण और स्थान परिवर्तन के संबंध में निर्णय लेने की प्रक्रिया में काष्ठ आधारित उद्योग के प्रतिनिधि की भी सहभागिता से उनकी समस्याएं शीघ्रता से हल हो सकेंगी।
संशोधित नियमावली में लाइसेंस या नवीनीकरण के लिए कोई शुल्क निर्धारित न करते हुए स्थिति के अनुसार राज्यस्तरीय समिति द्वारा निर्णय लिए जाने का प्रावधान किया गया है। चूंकि राज्यस्तरीय समिति में काष्ठ आधारित उद्योग के प्रतिनिधि भी रहेंगे, इसलिए लाइसेंस या नवीनीकरण शुल्क निर्धारित करने की प्रक्रिया में उनका भी योगदान होगा।