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यूपी: प्रदेश में जातीय रैलियों के रोक के मामले में राज्य सरकार ने दिया हाईकोर्ट को जवाब, जाति लिखने पर भी रोक

Thu, 30 Oct 2025 08:44 PM IST
रोहित मिश्र अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ
अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ Published by: रोहित मिश्र Updated Thu, 30 Oct 2025 08:44 PM IST
सार

Caste rallies in UP: प्रदेश में जातीय रैली रोकने के मामले में हाईकोर्ट के आदेश के बाद राज्य सरकार ने गुरुवार को इस संबंध में अपना पक्ष स्पष्ट किया है। 

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UP: The state government has responded to the High Court regarding the ban on caste rallies in the state
सरकार ने इसको लेकर पहले ही आदेश जारी कर दिया था। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ में जातीय रैलियों पर रोक के मामले में केंद्र और राज्य सरकार ने जवाब दाखिल कर दिया है। इसमें राज्य सरकार ने कहा कि जातीय रैलियों को रोकने समेत आपराधिक मामलों में लोगों की जाति न लिखे जाने का आदेश जारी किया गया है।

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याची अधिवक्ता ने बताया कि राज्य सरकार ने जवाब के क्रम में पुलिस महानिदेशक ने भी सर्कुलर जारी कर दिया है। कोर्ट ने केंद्र के जवाब पर याची को प्रतिउत्तर दाखिल करने का समय देकर मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर को नियत की है।
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न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति राजीव भारती की खंडपीठ ने यह आदेश स्थानीय अधिवक्ता मोतीलाल यादव की जनहित याचिका पर दिया। पहले, इस मामले में कोर्ट ने पक्षकारों केंद्र व राज्य सरकार समेत केंद्रीय निर्वाचन आयोग एवं चार राजनीतिक दलों कांग्रेस, भाजपा, सपा और बसपा से जवाब मांगा था।
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कोर्ट ने केंद्र व राज्य सरकार से पूछा था कि दोनों सरकारें जातीय रैलियां रोकने को क्या उपाय कर रही हैं? साथ ही कोर्ट ने याची को भी पिछले 10 साल में राजनीतिक दलों द्वारा आयोजित की गई जातीय रैलियों का ब्योरा नए हलफनामे पर दाखिल करने को कहा था। मामले की पिछली सुनवाई के समय कोर्ट को बताया गया था कि जातीय रैलियां रोकने को बीते 21 सितंबर को राज्य सरकार ने आदेश जारी किया है। इसपर कोर्ट ने कहा था कि यह समझ से परे है कि अगर यह आदेश जारी हुआ तो संबंधित अफसर ने अदालत के पहले के आदेश के तहत इसका हलफनामा पेश क्यों नहीं किया।

कोर्ट ने राज्य को इसका हलफनामा दाखिल करने को सिर्फ 3 दिन का समय देकर चेताया कि इसमें नाकाम रहने पर प्रमुख सचिव स्तर के अफसर को सपष्टीकरण देने को पेश होना होगा। उधर, केंद्र के वकील ने भी जवाबी हलफनामा दाखिल करने को समय मांगा था।

2013 में दाखिल की गई थी याचिका

याचिकाकर्ता ने यह याचिका वर्ष 2013 में दायर की थी। उसका कहना था कि उत्तर प्रदेश में जातियों पर आधारित राजनीतिक रैलियों की बाढ़ आ गयी है। सियासी दल ब्राहमण रैली, क्षत्रिय रैली, वैश्य सम्मेलन आदि नाम देकर अंधाधुंध जातीय रैलियां कर रहे हैं। जिनपर रोक लगाई जानी चाहिए।

दरअसल, 11 जुलाई 2013 को कोर्ट ने को एक अहम आदेश में पूरे उत्तर प्रदेश में जातियों के आधार पर की जा रही राजनीतिक दलों की रैलियों पर तत्काल रोक लगा दी थी। साथ ही इन पक्षकारों को नोटिस जारी की थी।याची का तर्क था कि इससे सामाजिक एकता और समरसता को जहां नुकसान हो रहा है वहीं, ऐसी जातीय रैलियां तथा सम्मेलन समाज में लोगों के बीच जहर घोलने का काम कर रहे हैं, जो संविधान की मंशा के खिलाफ है।

गौरतलब है कि 2013 में होने वाले आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनजर बसपा ने प्रदेश के करीब 40 जिलों में ब्राहमण भाईचारा सम्मेलन आयोजित किये थे। उसके अलावा सपा ने भी पहले लखनऊ में ऐसा ही सम्मेलन किया था। साथ ही उसने मुस्लिम सम्मेलन भी आयोजित किये थे। इसी परिप्रेक्ष्य में याची ने जातीय रैलियों पर तत्काल रोक लगाने की यह याचिका वर्ष 2013 में दाखिल की थी।

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