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यूपी: अजय राय की कुर्सी जाने के पीछे की वजह आई सामने, यह रिपोर्ट बनी आधार; सपा को भी संदेश देने की कोशिश

Sun, 04 Oct 2026 09:16 AM IST
रोहित मिश्र अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ/नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ/नई दिल्ली Published by: रोहित मिश्र Updated Sun, 04 Oct 2026 09:16 AM IST
सार

UP Congress President: पार्टी सूत्रों के मुताबिक राय और गौतम के बीच इस कदर ठन गई थी कि गौतम ने आलाकमान को साफ शब्दों में प्रदेश नेतृत्व बदलने की रिपोर्ट सौंप दी थी। 

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UP: Reasons behind Ajay Rai's loss of office revealed, this report serves as the basis
यूपी कांग्रेस में बदलाव के पीछे की वजह। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

 प्रदेश प्रभारी से महीनों चली खींचतान की कीमत उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष को अपनी कुर्सी गंवाकर चुकानी पड़ी, और इसी बहाने पार्टी ने अपने पुराने सामाजिक समीकरण की ओर लौटने का बड़ा दांव भी चल दिया। विधानसभा चुनाव से करीब पांच महीने पहले कांग्रेस आलाकमान ने अजय राय को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाकर रामपुर खास से विधायक आराधना मिश्रा मोना को कमान सौंप दी है।

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प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम से टकराव में हुई राय की इस विदाई के साथ ही सहारनपुर से सांसद इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष और देवेंद्र निषाद व आलोक प्रसाद को उपाध्यक्ष बनाया गया है। पूरब से ब्राह्मण और महिला चेहरा मोना, पश्चिम से मुस्लिम चेहरा मसूद, दलित प्रभारी गौतम और उपाध्यक्षों के जरिए पिछड़ों को जगह देकर कांग्रेस ने साफ कर दिया है कि सपा से सीट बंटवारे की बातचीत और 2027 की लड़ाई वह अस्सी और नब्बे के दशक वाले ब्राह्मण-दलित-मुस्लिम-पिछड़ा समीकरण के सहारे लड़ना चाहती है। नई टीम तत्काल प्रभाव से लागू हो गई है।

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प्रभारी की रिपोर्ट बनी आधार 

पार्टी सूत्रों के मुताबिक राय और गौतम के बीच इस कदर ठन गई थी कि गौतम ने आलाकमान को साफ शब्दों में प्रदेश नेतृत्व बदलने की रिपोर्ट सौंप दी थी। गौतम किसी भी कीमत पर राय के साथ चलने को तैयार नहीं थे। आंबेडकरवादी राजनीति से आने वाले गौतम ने राय के मंदिर जाने पर सवाल उठाए थे और उनका तर्क था कि राय की शैली से दलित मतदाता कांग्रेस से नहीं जुड़ेंगे। गौतम खेमे की शिकायत यह भी थी कि राय संगठन में किसी को तवज्जो नहीं देते।

टकराव सतह पर भी दिखने लगा था। 23 सितंबर को नाराज कार्यकर्ताओं की बैठक में गौतम अकेले नजर आए, राय वहां नहीं पहुंचे। मायावती से मुलाकात की कोशिश, जिलाध्यक्षों में दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व और सपा से सीट बंटवारे जैसे मुद्दों पर भी दोनों की राह अलग थी।

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वेणुगोपाल पर भारी पड़ा राहुल का भरोसा 

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राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खरगे, केसी वेणुगोपाल - फोटो : ANI

यह लड़ाई दिल्ली दरबार तक फैली थी। राय को संगठन महासचिव के.सी. वेणुगोपाल का करीबी माना जाता है, जबकि गौतम राहुल गांधी के भरोसेमंद हैं। अटकलों के बीच राय ने पिछले दिनों खरगे से लेकर राहुल गांधी तक से मुलाकात की और यह दावा भी किया कि कोई बदलाव नहीं हो रहा। लेकिन आखिरी फैसला राहुल गांधी के हाथ में था और पलड़ा गौतम का भारी रहा।

 हटाने में हिचक भी थी
अगस्त 2023 से प्रदेश अध्यक्ष रहे राय को हटाना पार्टी के लिए आसान नहीं था। पूर्वांचल में उनकी अपनी पकड़ है और वह वाराणसी से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ लगातार चुनाव लड़ते रहे हैं। भूमिहार समाज से आने वाले राय को चुनाव से ठीक पहले हटाने पर इस वर्ग की नाराजगी का डर था, इसीलिए राय को बनाए रखकर दो-तीन कार्यकारी अध्यक्ष बनाने का फार्मूला भी लंबे समय तक चर्चा में रहा। अब इसी नाराजगी को थामने के लिए पार्टी ने राय के योगदान की सराहना करते हुए नई टीम का ऐलान किया है। सूत्रों के मुताबिक राय को कांग्रेस के केंद्रीय संगठन में अहम जिम्मेदारी दी जाएगी।

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 मोना को कमान, पुराना समीकरण जिंदा करने की कोशिश

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अजय राय और आराधना मिश्रा मोना। - फोटो : अमर उजाला

राय की जगह आईं आराधना मिश्रा मोना वरिष्ठ नेता प्रमोद तिवारी की बेटी हैं और उनकी रामपुर खास सीट 1980 से लगातार कांग्रेस के पास है। कुर्सी की दौड़ में मोना पिछले कुछ हफ्तों से सबसे सक्रिय थीं।

पूरब से ब्राह्मण और महिला चेहरा मोना, पश्चिम से मुस्लिम चेहरा मसूद, दलित प्रभारी गौतम और उपाध्यक्षों के जरिए पिछड़ों को जगह देकर कांग्रेस ने अपने अस्सी और नब्बे के दशक के समीकरण को दोहराने की कोशिश की है। मोना के प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने चौधरी वीरेंद्र सिंह को विधानसभा में कांग्रेस विधायक दल का नेता बनाने के प्रस्ताव को भी मंजूरी दे दी है।

सपा को भी संदेश 
इमरान मसूद की नियुक्ति के अपने मायने हैं। वह सहयोगी सपा के खिलाफ लगातार मुखर रहे हैं। सीट बंटवारे से ठीक पहले उन्हें संगठन में दूसरे नंबर की जगह देना संकेत है कि कांग्रेस बराबरी के तेवर के साथ बातचीत की मेज पर बैठना चाहती है। नई टीम के सामने अब पांच महीने में अटकी जिलाध्यक्षों की सूची जारी करने, नाराज कार्यकर्ताओं को साधने और सपा से सम्मानजनक सीटें हासिल करने की चुनौती है।

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