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क्राइम का 'कचरा' करने में उस्ताद है यूपी पुलिस!

Mon, 21 Jul 2014 09:19 AM IST
विष्णु मोहन/ अमर उजाला, लखनऊ
विष्णु मोहन/ अमर उजाला, लखनऊ Updated Mon, 21 Jul 2014 09:19 AM IST
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UP Police got failed in many cases

मोहनलालगंज कांड में पुलिस के दावे पर सवाल उठाए जा रहे हैं पर यह तो मानना ही पड़ेगा की यूपी पुलिस सरकारी काम बड़े अच्छे ढंग से कर रही है। सरकारी काम मतलब केस को दबाने और बिखराने का काम जिससे किसी रसूखदार व्यक्ति की बदनामी न होने पाए।

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अगर हालिया घटनाक्रम की चर्चा करें तो मोहनलालगंज कांड की आनन-फानन में लीपापोती करने की बात कोई नई नहीं है, यूपी पुलिस का इतिहास उसके ऐसे कारनामों से भरा हुआ, जहां उसने सनसनीखेज मामलों में गलत बयानी की, फर्जी खुलासा करने की कोशिश की या फिर पीड़ित पर ही तोहमत जड़ दी।
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हर बार यह पाया गया कि पुलिस ने किसी न किसी रसूखदार को बचाने के लिए उसके जघन्य अपराध पर पर्दा डालने की कोशिश की है।

पुलिस की यह कोशिश पहुंच वालों की जी हुजूरी में और अपनी कुर्सी बचाने के प्रयासों में रही। तमाम बार ऐसी करतूतों का खुलासा होने के बाद भी आला पुलिस अफसर सीख लेने को तैयार नहीं हैं।

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यहां तो मामले को ही पलट दिया

UP Police got failed in many cases

मोहनलालगंज मामले में भी पुलिस का वही पुराना चेहरा सामने आया है। यहां भी घटनास्थल पर पाए गए साक्ष्य, युवती के शरीर पर पाई गई चोटों का फोरेंसिक व पोस्टमार्टम रिपोर्ट में हवाला, प्रथम दृष्टया सामने आई जानकारी और उसके आधार पर आला अफसरों द्वारा दिए गए बयान से शुरूआती दौर में यह साबित हो रहा था कि युवती के साथ दो से अधिक लोगों ने दुराचार किया और पुलिस के दावों से यह जाहिर हो रहा मामला खासा हाई-प्रोफाइल है।

लेकिन पुलिस ने जो खुलासा किया उसने तो पूरे मामले की हवा ही निकाल दी। तुर्रा यह कि पुलिस के इस लचर खुलासे पर उठने वाले सवालों का जवाब देने से अफसर या तो कतराते रहे या भन्नाए दिखे।

उनके हाव-भाव बता रहे कि उनकी थ्योरी पर अंगुलि उठाने की जुर्रत उन्हें रास नहीं आ रही है। लखनऊ के एसएसपी कई बार बौखलाए नजर आए तो केस का पर्यवेक्षण कर रहीं एडीजी ईओडब्ल्यू की एडीजी सवालों पर भौंचक दिखीं और जवाब देने से कतराती रहीं।

इन मामलों में हुआ ‌खिलवाड़

UP Police got failed in many cases

केस 1 - आरुषि हत्याकांड में जिस तरह कुछ घरेलू नौकरों पर सारे अपराध का ठीकरा फोड़ा गया, उससे जांच करे अधिकारियों की मंशा सामने आ गई थी।

इस मामले में आरुषि के पिता डॉ. राजेश तलवार के रसूख को देखते हुए उन्हें बचाने के लिए सारी कहानी पलट दी गई थी।

केस 2 - मधुमिता हत्याकांड में पुलिस ने हत्या के आरोपी तत्कालीन मंत्री अमरमणि त्रिपाठी को बचाने की जी-तोड़ कोशिश की। पहले मधुमिता और एक अन्य युवक के रिश्तों की कहानी बनाई गई तो बाद में रंजिश का मामला लाया गया। बमुश्किल पुलिस ने सही थ्योरी मानी।

केस 3 - बदायूं में नरैनी से बसपा विधायक पुरुषोत्तम नरेश द्विवेदी के घर में काम करने वाली एक महिला के साथ सामूहिक दुराचार की जो घटना हुई, उसमें विधायक को बचाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी। पुलिस ने पीड़ित युवती को ही चोर बता कर उसे जेल भेज दिया था।

छह साल की बच्ची के चरित्र पर सवाल उठाया

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केस 4 - कानपुर में कक्षा छह की छात्र के साथ हुए दुष्कर्म के मामले में पुलिस आरोपियों की बचाने की लिए शर्मनाक स्तर तक चली गई। पुलिस ने कक्षा छह की छात्रा के चरित्र पर ही अंगुलि उठा दी थी। इसके लिए एक महिला डॉक्टर से झूठा बयान भी दिलाया गया।

केस 5 - कुंडा में सीओ जियाउल हक की निर्मम हत्या के मामले में भी पुलिस की भूमिका शर्मनाक रही। शुरूआती दौर में सीओ को मौके से छोड़ कर भाग नकले पुलिसकर्मियों को बचाने की कोशिश होती रही। बाद में पुलिस ने माना कि सीओ को उनके साथयों ने अकेला छोड़ दिया था।

केस 6 - बुलंदशहर में एक नाबालिग से दुराचार के मामले में पुलिस ने जो किया वह शर्मनाक था। पुलिस ने पीड़ित किशोरी को ही हवालात में बंद कर दिया और उसके परिवार के लोगों पर मुकदमा दर्ज न कराने का दबाव बनाया गया। मामले के तूल पकड़ने पर मुकदमा दर्ज करना पड़ा।

दु‌ष्कर्म पीड़िता को ही पीट दिया

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केस 7- बिजनौर के अफजलगढ़ थाने में दुष्कर्म पीड़िता की मदद करने के बजाय पुलिस ने उसे ही पीट दिया।

आरोपियों से मिलीभगत कर पुलिस ने उन्हें छोड़ दिया और पीड़ित महिला से मुकदमा वापस लेने को कहा। उसके मना करने पर उसके केस को ही झूठा करार देने की कोशिश शुरू हो गई थी।

केस 8- निघासन थाने में तो पुलिसकर्मियों ने ही मंदबुद्धि एक दलित किशोरी के साथ दुराचार के प्रयास में उसकी गला दबाकर हत्या कर दी और थाना परिसर में गिरे पड़े पेड़ की डाल से लटका दिया गया। थाने में हुई हत्या को पुलस ने आत्महत्या बताने की कोशिश की और इसके अधिकारी पैरवी करते रहे।

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