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यूपी: मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने कहा, मस्जिदों और दरगाहों पर मंदिरों के दावे कानून और संविधान का मजाक
Thu, 28 Nov 2024 10:19 PM IST
रोहित मिश्र
अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ
अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ
Published by: रोहित मिश्र
Updated Thu, 28 Nov 2024 10:19 PM IST
सार
Muslim Personal Law Board : मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने की मांग की है कि निचली अदालतों को ऐसी याचिकाएं स्वीकार करने से सुप्रीम कोर्ट रोक लगाए।
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मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड
- फोटो : अमर उजाला।
विस्तार
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने देश की विभिन्न अदालतों में मस्जिदों और दरगाहों पर मंदिरों के दावों की बाढ़ पर गहरी चिंता जताई है। बोर्ड ने प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट 1991 का सख्ती से पालन न कराए जाने पर सवाल उठाते हुए कहा कि ऐसा न करने पर देश में विस्फोटक स्थिति पैदा हो रही है। बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट से मांग करते हुए कहा कि वो निचली अदालतों को ऐसी याचिकाएं स्वीकार करने से रोके ताकि कोई नया विवाद उत्पन्न हों।
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ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के प्रवक्ता डा. कासिम रसूल इलियास ने बयान जारी कर कहा कि संभल की जामा मस्जिद के अनसुलझे मुद्दे के बाद एक नया दावा सामने आया है, जिसमें कहा गया है कि अजमेर दरगाह संकट मोचन महादेव मंदिर है। उन्होंने कहा कि दुर्भाग्य है कि अजमेर सिविल कोर्ट ने इस याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार कर इसमें शामिल पक्षों को नोटिस जारी किए हैं। उन्होंने कहा कि प्लेसेसे ऑफ वर्शिप एक्ट 1991 (पूजा स्थल अधिनियम) के मददेनजर इस तरह के दावे कानून और संविधान का सरासर मजाक हैं।
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बोर्ड के प्रवक्ता ने कहा कि संसद द्वारा पारित कानून स्पष्ट रूप से निर्देशित करता है कि 15 अगस्त, 1947 तक किसी भी पूजा स्थल की स्थिति अपरिवर्तित रहेगी और उसे चुनौती नहीं दी जा सकती। इस कानून में बाबरी मस्जिद मामले के बाद मस्जिदों या अन्य धार्मिक स्थलों को निशाना बनाने से रोकने का इरादा स्पष्ट था। उन्होंने यह दुर्भाग्य है कि वाराणसी में ज्ञानवापी मस्जिद, मथुरा में शाही ईदगाह, मध्य प्रदेश में भोजशाला मस्जिद, लखनऊ में टीले वाली मस्जिद और संभल की जामा मस्जिद पर दावों के बाद अब ऐतिहासिक अजमेर दरगाह पर दावा किया गया है।
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कानून मौजूद होने के बावजूद अदालत ने याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया है और पक्षों को नोटिस जारी किए हैं। उन्होंने बताया कि बाबरी मस्जिद फैसले के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने न केवल इस कानून का हवाला दिया, बल्कि यह भी कहा कि इस कानून के लागू होने के बाद कोई नया दावा नहीं किया जा सकता। इसके आवजूद जब निचली अदालत ने ज्ञानवापी मस्जिद पर दावा स्वीकार किया तो मुस्लिम पक्ष ने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटा और तर्क दिया कि पूजा स्थल अधिनियम को देखते हुए इस तरह के दावे पर विचार नहीं किया जाना चाहिए।
हालांकि, अदालत ने अपना रुख नरम करते हुए सर्वेक्षण की अनुमति देते हुए कहा कि यह 1991 के कानून का उल्लंघन नहीं करता है। इसके बाद से मस्जिदों और दरगाहों पर दावों का दौर शुरू हो गया। उन्होंने मुख्य न्यायाधीश से इस मामले में स्वंय संज्ञान लेकर निचली अदालतों को इस तरह के विवाद के दरवाजे खोलने से रोकने का निर्देश देने की अपील की। उन्होंने कहा कि संसद द्वारा पारित इस कानून को सख्ती से लागू करना केंद्र और राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है। ऐसा न करने पर पूरे देश में विस्फोटक स्थिति पैदा हो सकती है और जिसकी जिम्मेदार सुप्रीम कोर्ट और केंद्र सरकार जिम्मेदार होगी।