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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Lucknow News ›   UP: Major revelation in KGMU study; link found between gum disease and lung disease—impacting health.

यूपी: केजीएमयू के अध्ययन में बड़ा खुलासा, मसूढ़ों और फेफड़ों की बीमारी में मिला संबंध, बिगाड़ रहा सेहत

Sat, 29 Aug 2026 11:04 AM IST
Akash Dwivedi अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ
अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ Published by: Akash Dwivedi Updated Sat, 29 Aug 2026 11:04 AM IST
सार

केजीएमयू के 75 लोगों पर हुए अध्ययन में पायरिया और इंटरस्टिशियल लंग डिजीज के बीच संबंध के संकेत मिले हैं। दोनों बीमारियों वाले मरीजों में सूजन से जुड़े बायोमार्कर अधिक पाए गए। शोधकर्ताओं के अनुसार, लंबे समय तक मसूड़ों की सूजन और मुंह के हानिकारक बैक्टीरिया फेफड़ों की सेहत को प्रभावित कर सकते हैं।

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UP: Major revelation in KGMU study; link found between gum disease and lung disease—impacting health.
मुंह की समस्याओं पर दें ध्यान - फोटो : Amarujala.com/AI

विस्तार

मसूड़ों की पुरानी बीमारी सिर्फ दांत और मुंह की समस्या नहीं है। इसका असर फेफड़ों पर भी पड़ सकता है। लखनऊ के किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी में हुए एक अध्ययन में मसूड़ों की बीमारी पायरिया और फेफड़ों की गंभीर बीमारी इंटरस्टिशियल लंग डिजीज (आईएलडी) के बीच संबंध के संकेत मिले हैं। 

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अध्ययन के मुताविक, जिन लोगों को लंबे समय से पायरिया है, उनमें फेफड़ों में सूजन और सांस से जुड़ी गंभीर बीमारी का खतरा हो सकता है। अध्ययन में पायरिया और आईएलडी दोनों से जूझ रहे मरीजों की जांच की गई। इनमें शरीर में सूजन बढ़ाने वाले इंफ्लेमेटरी बायोमार्कर का स्तर अधिक पाया गया।
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इससे संकेत मिलता है कि मसूड़ों में लंबे समय से बनी सूजन का असर शरीर के दूसरे हिस्सों पर भी पड़ सकता है। यह अध्ययन वर्ष 2026 में मोनाल्डी आर्काइव्स फॉर चेस्ट डिजीज में ऑनलाइन प्रकाशित हुआ है। टीम में डॉ. प्रेरणा एस हिरकाने, डॉ.उमेश प्रताप वर्मा, डॉ. अजय कुमार वर्मा, वे डॉ. पवित्र रस्तोगी, डॉ. आशुतोष श्रीवास्तव 5 और डॉ. अंजनी कुमार पाठक शामिल रहे। 

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75 लोगों पर किया गया अध्ययन  

न केजीएमयू के पीरियोडोंटोलॉजी विभाग ने न रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग और सेंटर फॉर . एडवांस्ड रिसर्च के साथ मिलकर यह अध्ययन किया। इसमें 75 लोगों को शामिल किया गया। इनमें 25 स्वस्थ लोग, 25 क्रॉनिक पीरियोडॉटाइटिस और 25 आईएलडी से पीड़ित मरीज शामिल थे।

केजीएमयू रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग के पूर्व प्रोफेसर और लोहिया संस्थान के विभागाध्यक्ष डॉ. अजय वर्मा ने बताया कि सभी लोगों के मसूड़ों की स्थिति की जांच की गई। इसके लिए प्लाक, मसूड़ों की सूजन, मसूड़ों के पंकिट की गहराई और दांतों से मसूड़ों के जुड़ाव जैसे मानकों को देखा गया। स्वस्थ लोगों की तुलना में दोनों बीमारियों वाले मरीजों में ये मानक ज्यादा खराब मिले।

 

जानें, क्या होता है इंटरस्टिशियल लंग डिजीज

इंटरस्टिशियल लंग डिजीज फेफड़ों में होने वाली बीमारी है, जिसमें फेफड़ों के ऊतकों में सूजन आ जाती है और उन पर निशान (स्कारिंग या फाइब्रोसिस) पड़ने लगते हैं। इससे फेफड़े सख्त और भारी हो जाते हैं, जिससे सांस लेने और खून में ऑक्सीजन मिलने में परेशानी होती है। इसकी वजह से मरीज में सांस फूलना, सूखी खांसी आना और बहुत ज्यादा कमजोरी व थकान के लक्षण महसूस होते हैं।

लार और खून में मिले सूजन के संकेत

मरीजों की लार और खून के नमूनों की जांच में एमएमपी-7 और एमएमपी-8 का स्तर अधिक पाया गया। वहीं, टीआईएमपी-1 में कोई खास अंतर नहीं मिला। ये तीनों आपस में जुड़े हुए बायोमार्कर का एक समूह हैं, जो शरीर में एक्स्ट्रासेल्यूलर मैट्रिक्स (कोशिकाओं का बाहरी ढांचा) में गड़बड़ी बताते हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार, मुंह के हानिकारक बैक्टीरिया सांस की नली तक पहुंचने और शरीर में सूजन बढ़ने से फेफड़ों पर असर पड़ सकता है।

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