फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Lucknow News ›   UP Lok Sabha Election 2024 strength of strong man is not visible in this Lok Sabha election parties sidelined

UP: बाहुबली अब नहीं बली... इस चुनाव में नहीं दिख रहा बाहुबलियों का जोर; सभी प्रमुख दलों ने किया किनारा

Wed, 27 Mar 2024 10:47 AM IST
शाहरुख खान अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली Published by: शाहरुख खान Updated Wed, 27 Mar 2024 10:47 AM IST
सार

इस चुनाव में बाहुबलियों का जोर नहीं दिख रहा है। सभी प्रमुख दलों ने किनारा कर लिया है। परिवार को भी टिकट मिलना मुश्किल हो रहा है। पुलिस और अदालत की सख्ती की वजह से सियासत में बाहुबलियों का दखल खत्म हो गया है।

विज्ञापन
UP Lok Sabha Election 2024 strength of strong man is not visible in this Lok Sabha election parties sidelined
UP Lok Sabha Election 2024 - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

उत्तर प्रदेश की उर्वर सियासी जमीन ने देश को नौ प्रधानमंत्री दिए। यहां की मिट्टी ने एक से बढ़कर एक नेता गढ़े, जिन्होंने प्रदेश ही नहीं, देश की सियासत को भी नई दृष्टि दी। पर, यह भी सच है कि यह सियासी उर्वर जमीन बाहुबलियों को भी खूब रास आई। उनकी हनक, धमक ने सियासतदानों की आंखों में ऐसी चमक पैदा की कि वे नेतागिरी चमकाने का औजार बन गए। 
विज्ञापन


सारे समीकरणों को ध्वस्त करने का हथियार बन गए। पर, वक्त का पहिया कुछ ऐसा घूमा कि बाहुबलियों की न तो वो धमक रही, न ही वो हनक। लोकसभा चुनाव में पहली बार ऐसा देखने को मिल रहा है कि बाहुबली अपनी पतीली चुनावी चूल्हे पर चढ़ाने से भी कतरा रहे हैं। यूपी की सियासत में बाहुबली कैसे नहीं रहे बली, बता रहे हैं अशोक मिश्रा...
विज्ञापन


पं. जवाहरलाल नेहरू हों या फिर लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, चौधरी चरण सिंह, राजीव गांधी, विश्वनाथ प्रताप सिंह, चंद्रशेखर, अटल बिहारी वाजपेयी हों या फिर मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, इन सभी ने दिल्ली की कुर्सी का रास्ता वाया यूपी ही तय किया। यही वजह थी कि सत्ता के गलियारों में कहा जाने लगा कि दिल्ली की कुर्सी का रास्ता लखनऊ से होकर गुजरता है। पर, प्रदेश ने एक दौर ऐसा भी देखा जब बाहुबली सियासत की अलग भाषा और परिभाषा लिखने लगे।
विज्ञापन
विज्ञापन


बीते तीन दशकों की यूपी की सियासत पर नजर डालें तो तमाम बाहुबली अपने दमखम से सत्ता दिलाने और खुद भी माननीय बनने की होड़ में रहे। पश्चिम में डीपी यादव से लेकर पूर्वांचल में मुख्तार अंसारी के कुनबे ने सभी प्रमुख दलों में अपनी पैठ बनाई। पर, 2017 के बाद एक बड़ा टर्निंग पॉइंट आया। सलाखों के पीछे रहकर भी सियासी उलटफेर करने का दम रखने वाले तमाम माफिया इस बार हाशिए पर हैं। 

अदालत और पुलिस की सख्ती ने बाहुबलियों के चुनाव लड़ने के मंसूबे पर पानी फेर दिया है। मुख्तार अंसारी, विजय मिश्रा, धनंजय सिंह, रिजवान जहीर, अमरमणि त्रिपाठी, विनय शंकर तिवारी, हाजी याकूब कुरैशी, संजीव द्विवेदी उर्फ रामू द्विवेदी, राजन तिवारी, बृजेश सिंह जैसे तमाम बाहुबली नेता कानून के शिकंजे में कुछ इस कदर फंस चुके हैं कि उनका चुनाव लड़ पाना या लड़वा पाना आसान नहीं है। इनमें से कुछ सजा होने की वजह से चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य हो चुके हैं, तो कई पर सजा की तलवार लटक रही है।
 

अंसारी परिवार ने दिखाया कुछ दम
मुख्तार अंसारी के भाई अफजाल अंसारी ही सिर्फ अपने कुनबे की सियासी पहचान को बचाए रखने की जद्दोजहद में जुटे हैं। अंसारी परिवार के तीन सदस्य वर्तमान में निर्वाचित जनप्रतिनिधि हैं। इनमें अफजाल अंसारी गाजीपुर से बसपा सांसद हैं, जो इस बार सपा के टिकट पर चुनाव लड़ने जा रहे हैं। जबकि मुख्तार का बेटा अब्बास मऊ सदर से सुभासपा विधायक है। मुख्तार के भाई सिगबतुल्लाह का बेटा शोएब अंसारी मन्नू गाजीपुर की मोहम्मदाबाद सीट से सपा विधायक है।

छोटे दलों से ही आस
  • बदले माहौल में बाहुबली छोटे दलों से आस लगाए हैं। मऊ से सांसद अतुल राय टिकट के लिए किसी भी दल का झंडा उठाने को तैयार हैं, तो सुल्तानपुर के चंद्रभद्र सिंह बसपा पर टकटकी लगाए हुए हैं।
  • पूर्व सांसद धनंजय सिंह को अपहरण के मामले में सात साल की सजा होने के बाद उनकी पत्नी श्रीकला के चुनाव मैदान में उतरने के कयास लग रहे हैं, हालांकि किसी भी प्रमुख दल से उनकी अब तक बात नहीं बन सकी है।
  • पिछले लोकसभा चुनाव में सुल्तानपुर में भाजपा प्रत्याशी मेनका गांधी के खिलाफ बसपा के टिकट पर चुनाव लड़ने वाले चंद्रभद्र सिंह को भी दो साल की सजा होने से उनका आगे का सियासी सफर खतरे में पड़ चुका है।

ये भी हुए सियासी मैदान से दूर
बसपा सरकार में मंत्री रहे बादशाह सिंह को विधायक निधि के दुरुपयोग के मामले में सजा हो चुकी है। पूर्व सांसद रमाकांत यादव भी सजा भुगत रहे हैं। पश्चिमी उप्र के माफिया डीपी यादव को भी सही सियासी ठौर नहीं मिल रहा है। एनआरएचएम घोटाले में फंसने के बाद बाबू सिंह कुशवाहा और मुकेश श्रीवास्तव की भी सियासी पहचान धूमिल होती चली गई। बसपा सरकार में लोकायुक्त जांच में फंसे तत्कालीन मंत्री राजेश त्रिपाठी, अवध पाल सिंह यादव, रंगनाथ मिश्रा, रतन लाल अहिरवार, फतेह बहादुर सिंह, चंद्रदेव राम यादव, सदल प्रसाद, राकेश धर त्रिपाठी को भी बड़ा नुकसान उठाना पड़ा, जिससे सियासत में इन सबकी तरक्की पर गहरा प्रभाव पड़ा।

अतीक के कुनबे का सियासी सफर खत्म
माफिया अतीक अहमद हर चुनाव में अपनी दावेदारी पेश करता था। उसका भाई अशरफ विधायक रहा था। अतीक की पत्नी भी कई बार चुनाव मैदान में उतरने की कवायद कर चुकी है। उमेश पाल हत्याकांड के बाद अतीक और उसके भाई अशरफ की भी हत्या हो गई, जबकि दोनों की पत्नियां पुलिस रिकाॅर्ड में फरार हैं। अतीक के दोनों बेटे भी जेल में हैं। यूं कहें कि अतीक के पूरे कुनबे की अब सियासत में वापसी आसान नहीं है।

पर, इनका जलवा अभी कायम
प्रदेश के कुछ बाहुबली ऐसे भी हैं, जिनकी सियासी गलियारों में पकड़ मजबूत हुई है। सालों तक फरार रहे माफिया बृजेश सिंह ने आत्मसमर्पण करके यूपी में वापसी की, तो उनके परिवार के लिए सियासत के दरवाजे खुलते चले गए। बृजेश और उनकी पत्नी एमएलसी बने। अब वह बेटे को राजनीति में स्थापित करने के लिए प्रयासरत हैं।
  • गोसाईंगंज से विधायक अभय सिंह का तमाम दुश्वारियों के बावजूद सियासी सफर जारी है। राज्यसभा चुनाव में उन्होंने भाजपा समर्थित प्रत्याशी को वोट देकर अपना नया मुकाम तलाश लिया है।
  • कई दलों की सवारी कर चुके सांसद बृजभूषण सिंह को भले ही इस बार टिकट मिलने की उम्मीद कम है, लेकिन उनके सियासी दमखम को कम नहीं आंका जा सकता है।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed