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UP: नोटा का सोटा चलाएंगे कैसे, जब जानकारी ही नहीं, पिछले चुनाव में 24.44% वोटर्स को नोटा की जानकारी ही नहीं थी

Fri, 29 Mar 2024 03:12 PM IST
शाहरुख खान अक्षय कुमार, अमर उजाला, लखनऊ
अक्षय कुमार, अमर उजाला, लखनऊ Published by: शाहरुख खान Updated Fri, 29 Mar 2024 03:12 PM IST
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UP Lok Sabha Election 2024 NOTA Vote Percentage in Last Elections Know EC Rules for Voters
UP Lok Sabha Election - फोटो : अमर उजाला
चुनाव में हर एक वोट कीमती होता है। पर, जब कोई भी प्रत्याशी पसंद नहीं हो तो? मतदाताओं के पास रिजेक्शन का अधिकार है। नन ऑफ द एबव (नोटा) का बटन दबाकर अपनी नापसंदगी का इजहार कर सकते हैं। पर, नोटा को लेकर अब भी लोगों में जागरूकता कम है। 
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गिरी इंस्टीट्यूट ऑफ डवलपमेंट स्टडीज की ओर से 2019 के लोकसभा चुनाव के दरम्यान किए गए सर्वे की रिपोर्ट बताती है कि 24.44 फीसदी लोगों को नोटा की जानकारी ही नहीं थी।
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रिपोर्ट बताती है कि जिन मतदाताओं को नोटा की जानकारी नहीं थी, उनमें से 27 फीसदी महिलाएं तो 22 फीसदी पुरुष थे। 

भदोही में सर्वाधिक 35.56 फीसदी मतदाताओं को नोटा के बारे में जानकारी नहीं थी। यहां के 38 फीसदी पुरुष और 33 फीसदी महिला मतदाताओं ने माना कि वे इससे पहले नोटा के बारे में नहीं जानते थे। जागरूकता के मामले में बलिया सबसे आगे रहा। यहां के 90.99 फीसदी पुरुष व 86.52 फीसदी महिला मतदाता नोटा के बारे में जागरूक थे।
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मतदाता बनने के लिए जागरूकता दिखी : सर्वे के अनुसार 98.13 फीसदी लोगों को यह पता था कि मतदान के लिए उनको कब मतदाता बनना है। पुरुषों की अपेक्षा महिलाएं इसको लेकर ज्यादा जागरूक दिखीं। 18 से 21 साल के युवाओं के ज्यादा रजिस्ट्रेशन मिले, जबकि 30 साल से ज्यादा के लोगों के कम। लोग ऑनलाइन सेवाओं की अपेक्षा आज भी बीएलओ पर ज्यादा निर्भर हैं।

जागरूकता अभियानों का कितना असर
लोकसभा, विधानसभा व निकाय चुनावों के दौरान व्यापक स्तर पर जागरूकता अभियान चलाए जाते हैं। सर्वे रिपोर्ट बताती है कि नोटा, वीवीपैट, स्वीप कार्यक्रम को लेकर और जागरूकता लाने की जरूरत है।

 

एक किमी से कम दूरी पर बूथ : सर्वे में यह भी पाया गया कि अगर पोलिंग बूथ घर से एक किमी से कम दूरी पर हो तो महिलाओं का वोट प्रतिशत बढ़ाया जा सकता है। वहीं शहरी क्षेत्र की ज्यादातर वे महिलाएं जिनके पति की चुनाव ड्यूटी लगी होती है, मतदान करने नहीं जातीं। ऐसी महिलाओं ने माना कि अकेले मतदान करने जाने में वह सहज नहीं होतीं। स्वीप जैसे कार्यक्रमों के तहत इसे लेकर जागरूकता बढ़ाई जा सकती है।

 

2013 में नन ऑफ द एबव (नोटा) का विकल्प दिया गया
2013 में दिल्ली, मध्य प्रदेश, राजस्थान व छत्तीसगढ़ में हुए विधानसभा चुनाव में पहली बार नोटा का प्रयोग किया गया।

 

नोटा की भूमिका को निर्णायक बनाया जाए
नोटा की भूमिका को निर्णायक बनाया जाए। कई बार कुल पड़े मतों में दूसरे स्थान पर होने के बाद भी नोटा का कोई प्रभाव नहीं होता है। किसी ने अगर अपना विरोध दर्ज कराया है, तो उसका असर दिखना चाहिए। -प्रो. डीआर साहू, समाजशास्त्री, लखनऊ विश्वविद्यालय
 
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