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UP: पान मसाला में प्लास्टिक पैकिंग पर रोक से इंडस्ट्री को आपत्ति, सिर्फ इस उद्योग पर ही सख्ती क्यों? जानें वजह

Sat, 09 May 2026 10:22 AM IST
Akash Dwivedi अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ
अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ Published by: Akash Dwivedi Updated Sat, 09 May 2026 10:22 AM IST
सार

पान मसाला उद्योग ने प्लास्टिक और मेटलाइज्ड पैकिंग पर प्रस्तावित रोक का विरोध करते हुए सरकार से सभी एफएमसीजी उत्पादों पर समान नियम लागू करने की मांग की है। कारोबारियों का कहना है कि पर्यावरण प्रदूषण के लिए केवल पान मसाला उद्योग जिम्मेदार नहीं है, जबकि अन्य खाद्य उत्पाद भी इसी तरह की पैकेजिंग का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल कर रहे हैं।

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UP: Industry Objects to Ban on Plastic Packaging for Pan Masala—Why the Strictness Solely Against the Pan Masa
पान मसाला ( साकेतिक तस्वीर) - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

पान मसाला उद्योग के लिए प्लास्टिक सैशे और मेटलाइज्ड पैकेजिंग पर प्रस्तावित रोक को लेकर उद्योग संगठनों ने सरकार से समान नीति लागू करने की मांग की है। कारोबारियों का कहना है कि देश में खाद्य और एफएमसीजी सेक्टर में हर साल करीब 7 से 10 लाख मीट्रिक टन मल्टीलेयर प्लास्टिक और मेटलाइज्ड पैकेजिंग सामग्री इस्तेमाल होती है, जबकि पान मसाला उद्योग की हिस्सेदारी इसमें केवल 35 से 40 हजार टन यानी लगभग 3 से 5 प्रतिशत ही है। ऐसे में सिर्फ पान मसाला उद्योग पर प्रतिबंध लगाना उचित नहीं माना जा सकता।

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गौरतलब है कि भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) ने खाद्य सुरक्षा एवं मानक (पैकेजिंग) विनियम 2018 में संशोधन का प्रस्ताव जारी किया है। इसके तहत पान मसाला, गुटखा और तंबाकू उत्पादों की बिक्री केवल पेपर, पेपर बोर्ड, सेलूलोज या अन्य प्राकृतिक सामग्री आधारित पैकेजिंग में करने का सुझाव दिया गया है। साथ ही पॉलीथीन, पीवीसी, लैमिनेटेड और मेटलाइज्ड सैशे पर रोक लगाने की तैयारी है।

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पान मसाला उद्योग के लिए रोक प्रस्तावित

कन्नौज के कारोबारी रमेश महेश्वरी का कहना है कि यदि सरकार का उद्देश्य सिंगल यूज प्लास्टिक और गैर रीसाइक्लेबल पैकेजिंग कम करना है तो नियम पूरे एफएमसीजी सेक्टर पर लागू होने चाहिए। उन्होंने कहा कि नमकीन, बिस्किट, चिप्स, मसाले, इंस्टेंट नूडल्स, कॉफी, कैंडी, डेयरी पाउच और कम कीमत वाले शैंपू सैशे भी उसी प्रकार की पैकेजिंग में बेचे जा रहे हैं, जिस पर पान मसाला उद्योग के लिए रोक प्रस्तावित है।

नोएडा के लैमिनेटर कारोबारी आरके जैन ने कहा कि भारत में फूड ग्रेड फ्लेक्सिबल पैकेजिंग फिल्मों और बैग्स की कुल उत्पादन क्षमता करीब 18 से 22 लाख मीट्रिक टन सालाना है। इसमें खाद्य उत्पादों में इस्तेमाल होने वाली मल्टीलेयर और मेटलाइज्ड पैकेजिंग की वास्तविक खपत 7 से 10 लाख मीट्रिक टन के बीच आंकी जाती है। इसके मुकाबले पान मसाला सेक्टर में उपयोग होने वाली मल्टीलेयर प्लास्टिक और मेटलाइज्ड फिल्म की मात्रा करीब 35 से 40 हजार टन हो सकती है।

 

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868 करोड़ पैकेट बिकते हैं नूडल्स व नमकीन के

कारोबारियों का दावा है कि पान मसाला उद्योग को पर्यावरणीय नुकसान का मुख्य कारण बताना वास्तविक स्थिति से मेल नहीं खाता। उनका कहना है कि देश में हर साल 8.68 अरब इंस्टेंट नूडल पैकेट और करोड़ों नमकीन पैकेट बिकते हैं। 

केवल दूध क्षेत्र में ही प्रतिदिन करीब 12 करोड़ प्लास्टिक पाउच इस्तेमाल होते हैं। स्नैक्स और मसाला उद्योग बड़े पैमाने पर मेटलाइज्ड लैमिनेट पैकिंग पर निर्भर है, क्योंकि यह नमी रोककर उत्पादों की लाइफ 6 से 9 महीने तक बढ़ाते हैं।

सब पर समान नियम लगाएं

उत्तर प्रदेश, जो देश का सबसे बड़ा पान मसाला उत्पादन और उपभोग केंद्र माना जाता है, वहां कानपुर, उन्नाव, नोएडा, गाजियाबाद और लखनऊ बेल्ट में बड़ी संख्या में पैकेजिंग इकाइयां संचालित हैं। उद्योग प्रतिनिधियों ने मांग की है कि यदि पर्यावरण संरक्षण के लिए कड़े कदम उठाने हैं तो नीति सभी लो कॉस्ट सैशे उत्पादों पर समान रूप से लागू की जाए।

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