यूपी सरकार के चार साल: इन मुद्दों पर कभी फेल तो कभी पास रहे अखिलेश
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सूबे की कमान संभालने के बाद से ही अखिलेश यादव में अपनी एक अलग छवि बनाने की छटपटाहट दिखी। साल-दर-साल विकास का एजेंडा तय करने और उसपर आगे बढऩे और खुद को विकास करने वाले सीएम के रूप में प्रतिष्ठापित करने की ललक दिखी।
लखनऊ मेट्रो और आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस-वे समेत कई बड़े प्रोजेक्ट विकास की ललक को साबित भी करते हैं। पर, कानून व्यवस्था से लेकर कई मोर्चों पर अनिर्णय की स्थिति, विकास की छवि को नुकसान भी पहुंचाती रही।
बड़े प्रोजेक्टों की बुनियाद
अखिलेश यादव की अगुवाई में सरकार ने चार साल में कई बड़ी परियोजनाएं शुरू कीं। सरकार रिकॉर्ड समय में मेट्रो का काम पूरा करने का दावा कर रही है। इसी तरह लखनऊ-आगरा एक्सप्रेस-वे पर भूमि अधिग्रहण में कोई बड़ा बवाल न होना और इस परियोजना पर तेजी से काम होने की उपलब्धि निश्चित ही सरकार के खाते में रहेगी।
45 लाख लोगों की समाजवादी पेंशन की योजना भी आगे बढ़ी है। राजधानी में अंतरराष्ट्रीय स्टेडियम, कैंसर इंस्टीट्यूट, आईटी सिटी जैसी परियोजनाएं सपा सरकार के खाते में उपलब्धियां बढ़ाती हैं।
कानून व्यवस्था बनी रही चुनौती
चार साल के कार्यकाल में सीएम अखिलेश यादव कानून व्यवस्था की चुनौती से उबर नहीं पाए। अपराधियों के साथ ही सत्तापक्ष से जुड़े लोगों की उद्दंडता सपा को भारी पड़ती रही।
सरकार कानून-व्यवस्था केमुद्दे पर कड़े फैसले लेकर जनता को गंभीरता का संदेश नहीं दे पाई। सांप्रदायिक तनाव की घटनाएं भी लगातार सामने आती रहीं। पुलिस रिस्पॉन्स टाइम घटाने की योजना पर साल भर से काम चल रहा है, लेकिन अभी यह परवान नहीं चढ़ सकी।
अनिल यादव प्रकरण ने कराई किरकिरी
उत्तर प्रदेश लोकसेवा आयोग के अध्यक्ष डॉ. अनिल यादव की नियुक्ति से लेकर कामकाज तक पर सरकार की किरकिरी हुई। हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणियों और छात्रों के लंबे आंदोलन के बावजूद सरकार ने उन्हें नहीं हटाया। वह तभी हटे जब उनकी नियुक्त को अवैध ठहरा दिया गया।
उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग के अध्यक्ष और माध्यमिक शिक्षा चयन बोर्ड के सदस्यों की नियम विरुद्ध नियुक्तियों के मामले में भी सरकार की फजीहत हुई। हाईकोर्ट ने इन नियुक्तियों को अवैध ठहराया।
यादव सिंह पर सरकार की 'कृपा'
काले धन के कुबेर नोएडा अथॉरिटी के निलंबित चीफ इंजीनियर यादव सिंह पर सरकार की 'कृपा' चर्चा में रही। निलंबन खत्म करने और नोएडा के साथ ग्रेटर नोएडा व यमुना एक्सप्रेस-वे प्राधिकरण का अतिरिक्त चार्ज देने पर सवाल उठे।
ईडी के छापों के बाद भी सस्पेंड करने में देरी, सीबीआई जांच से बचाने के लिए एक सदस्यीय आयोग का गठन करने जैसे फैसले सवालों के घेरे में रहे। पर, इन सवालों को दरकिनार कर सरकार यादव सिंह की सीबीआई जांच रुकवाने के लिए सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गई।
ब्यूरोक्रेसी पर भड़ास
मुख्यमंत्री को भले ही मुख्य सचिव आलोक रंजन जैसा भरोसेमंद अफसर मिला, लेकिन ब्यूरोक्रेसी पर उनकी भड़ास अक्सर सामने आती रही।
कई मौकों पर उन्होंने सार्वजनिक तौर पर कहा कि अफसर किसी के सगे नहीं होते। एक बार तो यहां तक कहा-यदि मेरी नौकरी (कुर्सी) गई तो आपकी भी सुरक्षित नहीं रहेगी।
भ्रष्टाचार के इन मामलों पर हुई शर्मिंदगी
सजायाफ्ता अधिकारी राजीव कुमार को सरकार ने लगातार प्रमुख सचिव नियुक्ति एवं कार्मिक जैसे महत्वपूर्ण पद पर बनाए रखा।
तीन साल की सजा के खिलाफ राजीव कुमार ने हाईकोर्ट से स्थगन आदेश ले रखा था। उन्हें तभी हटाया गया, जब अदालत ने उनका स्टे खारिज कर दिया।
एनआरएचएम घोटाले के आरोपी प्रदीप शुक्ला को सरकार ने जेल से बाहर आते ही बहाल कर दिया। पहले उन्हें राजस्व परिषद भेजा गया और बाद में ग्रामीण अभियंत्रण विभाग में प्रमुख सचिव के पद पर तैनाती दी गई। अंगुली उठने पर उन्हें सामान्य प्रशासन विभाग में भेजा गया।
चाचाओं की चुनौती ने भी किया परेशान
कभी रामगोपाल यादव, कभी शिवपाल को कभी आजम खां जैसे चाचा सरकार के सामने असहज स्थिति खड़ी करते रहे। कभी पार्टी में फैसलों को लेकर अंतर्विरोध दिखाई पड़े तो कभी उन्होंने राजभवन पर हल्ला बोला।
दादरी मुद्दे पर यूएनओ महासचिव को चिट्ठी लिखकर भी अपनी ही सरकार को कठघरे में खड़ा किया गया। बूथ कैप्चरिंग के आरोपी तोताराम यादव पर चाचा का 'यू-टर्नÓ भी सामने आया और उन्हें कार्यक्रम से गिरफ्तार करा दिया गया।
कप्तान का ऑलराउंड प्रदर्शन, टीम एकजुट नहीं
चार साल में मुख्यमंत्री ने कप्तान के रूप में ऑलराउंड प्रदर्शन किया। फैसले लेने में लगातार परिपक्वता दिखाई, लेकिन सरकार एकजुट टीम के रूप मे परफॉर्मेंस देती नजर नहीं आई। विकास के एजेंडे को लेकर मंत्रियों की चिंता नहीं दिखी। ज्यादातर मंत्रियों ने लीक से हटकर ऐसा कोई काम नहीं किया, जिससे सरकार की बेहतर छवि या पहचान बनती।
पंचायत व परिषद चुनाव में गाड़ा झंडा
समाजवादी पार्टी ने जिला पंचायत अध्यक्ष की 60 और स्थानीय प्राधिकारी क्षेत्र से विधान परिषद की 30 सीटों पर जीत हासिल की। इसके लिए सरकार और सपा अपनी पीठ थपथपा सकती है लेकिन इन नतीजों को जमीनी स्तर पर सरकार की लोकप्रियता का आधार नहीं माना जा सकता। सत्ता व धनबल से प्रभावित इन चुनावों में उसी दल को कामयाबी मिलती रही है जिसकी प्रदेश में सरकार रहती है।
कैबिनेट में फेरबदल से दिए नए संकेत
सीएम ने कैबिनेट के पिछले फेरबदल कर कई संकेत दिए। इस बदलाव में कई दिग्गज जहां बाहर हुए, कई के कद घटे-बढ़े, वहीं तेजनारायण पांडेय उर्फ पवन पांडेय की राज्यमंत्री के रूप में वापसी हो गई।