यूपी: राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति पर अमल होता तो प्रदेश में महामारी में भी न बनते ये हालात, देखें- ये रिपोर्ट
अर्थशास्त्री प्रो. रोली मिश्रा कहती हैं कि सरकार विशेषज्ञों व मार्गदर्शी संस्थाओं के सुझाव तथा नीतियों पर चलने की जगह आग लगने के बाद कुंआ खोदने की नीति पर चल रही है। न सिर्फ सरकार ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति की अनुसंशाओं को नजरअंदाज किया बल्कि अपने स्तर से जो बजटीय आवंटन किया, उसका भी लाभ लोगों को मिलता नजर नहीं आ रहा है।
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राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति-2017 के सुझावों पर अगर ध्यान दिया गया होता तो कोरोना महामारी में इतने गंभीर हालात न पैदा होते। विशेषज्ञों का कहना है कि इस महामारी से सबक लेकर सरकार को भावी आवश्यकताओं का आकलन कर नीति में सुझाए गए लक्ष्य के लिए फोकस होकर काम करने की जरूरत है।
स्वास्थ्य नीति में राज्यों को सलाह दी गई थी कि वे वर्ष 2020 तक अपने कुल बजट का 8 फीसदी स्वास्थ्य सेक्टर पर खर्च करें। मगर वर्ष 2017 से 2020 तक किसी भी वित्तीय वर्ष में स्वास्थ्य सेक्टर को तवज्जों नहीं दिया गया। वित्तीय वर्ष 2016-17 से लेकर 2020-21 तक कुल बजट का 5.2 से 5.5 प्रतिशत तक इस पर खर्च का प्रावधान हुआ। कई वित्तीय वर्ष में राज्य वह आवंटन भी खर्च नहीं कर सके, जिसका उसने बजट में प्रावधान किया था।
गौरतलब है कि वित्तीय वर्ष 2020-21 का लगभग पूरा समय कोरोना महामारी में गुजरा। इस वर्ष राज्य के कुल बजट का 5.5 प्रतिशत हिस्सा स्वास्थ्य सेक्टर के लिए रखा गया था लेकिन वित्त वर्ष के उत्तरार्द्ध में जब खर्चों का पुनरीक्षित अनुमान लगाया गया तो यह आवंटन कुल बजट के 5.3 प्रतिशत तक करने की नौबत आ गई।
पहली बार 6 प्रतिशत से अधिक प्रावधान, लेकिन दिशा का अभाव
स्वास्थ्य विभाग ने कोरोना महामारी की पहली लहर का सामना करने के बाद पहली बार 2021-22 में स्वास्थ्य सेक्टर के लिए कुल बजट का 6.3 प्रतिशत प्रावधान करने का साहस दिखाया। मगर यह भी स्वास्थ्य नीति के लक्ष्य से काफी कम है।
यही नहीं, इस बढ़े बजट में भी राज्य की प्राथमिकता में कोरोना की दूसरी लहर की चुनौती उभर कर सामने नहीं आई। महामारी को ध्यान में रखकर बेड बढ़ाने, वेंटिलेटर व ऑक्सीजन आदि खरीदने के लिए व्यवस्था का बजट में अभाव रहा। अगर 50 करोड़ के कोरोना टीकाकरण फंड को छोड़ दें तो रुटीन तरीके से ही फोकस रहा। नतीजा हुआ कि कोरोना की दूसरी लहर से विभाग के हाथ-पांव फूल गए।
प्रदेश के कुल बजट का स्वास्थ्य पर खर्च
वित्तीय वर्ष -- बजट प्रस्ताव -- वास्तविक खर्च
2017-18 -- 5.2% -- 5.5%
2018-19 -- 5.5% -- 5.0%
2019-20 -- 5.4% -- 5.6%
2020-21 -- 5.5% -- 5.3% (संशोधित अनुमान)
2021-22 -- 6.3% -- बजट अनुमान
आग लगने के बाद कुंआ खोदने की नीति पर सरकार
अर्थशास्त्री प्रो. रोली मिश्रा कहती हैं कि सरकार विशेषज्ञों व मार्गदर्शी संस्थाओं के सुझाव तथा नीतियों पर चलने की जगह आग लगने के बाद कुंआ खोदने की नीति पर चल रही है। न सिर्फ सरकार ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति की अनुसंशाओं को नजरअंदाज किया बल्कि अपने स्तर से जो बजटीय आवंटन किया, उसका भी लाभ लोगों को मिलता नजर नहीं आ रहा है।
कोविड-19 की दूसरी लहर की चेतावनी पिछले छह महीने से विशेषज्ञ दे रहे थे। यह भी कहा जा रहा था कि इसका असर ज्यादा घातक होगा। पर, सरकार चुप बैठी रही। अतिरिक्त बेड, वेंटिलेटर, ऑक्सीजन की आवश्यकता पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। जब महामारी आ गई, लोग जान गंवाने लगे, हाहाकार मच गया, तब सरकार सक्रिय हुई।
सरकार ने समय से नीतियों का क्रियान्वयन किया होता व विशेषज्ञों की सुनी होती तो इस हाहाकार की नौबत न आती। सरकार को इस विफलता से सीख कर भविष्य के लिए स्वास्थ्य सेक्टर में काम करने की जरूरत है।