UP BJP: घर वालों को किया ढेर, बाहरी बने सवा सेर
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जिस जनसंघ के जनता पार्टी में विलय और फिर अलग होने के बाद भाजपा बनी, उस जनसंघ की स्थापना में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के कंधे से कंधा मिलाकर खड़े थे उत्तर प्रदेश के पंडित दीनदयाल उपाध्याय। भाजपा बनी तो लंबे समय तक यह नारा देश भर में बुलंद होता रहा-‘भाजपा की तीन धरोहर, अटल-आडवाणी-मुरली मनोहर।
मतलब भाजपा के तीन बड़े नेताओं में दो यूपी के, पर पता नहीं ऐसा क्या हुआ कि आज यूपी में भाजपा के उद्धार के लिए दूसरे राज्यों के नेताओं का सहारा लेना पड़ रहा है।
अटल बिहारी वाजपेयी का स्वास्थ्य शिथिल होने के बाद शुरू हुए इस प्रयोग ने वर्ष 2012 में जोर पकड़ा और लोकसभा चुनाव से यह लगातार परवान चढ़ता दिख रहा है।
इन प्रयोगों से संदेश यही जा रहा है कि यूपी भाजपा व उसके नेताओं में न कोई काबिलियत है और न कार्यकर्ताओं के बीच प्रभाव। हालांकि, इसकी एक वजह यहां के नेताओं की रीति-नीति, गुटबाजी और एक-दूसरे को निपटाने की आदत भी है।
बावजूद इसके गहराई से देखें तो पता चलेगा कि भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने यूपी के नेताओं की खामियों की आड़ में यूपी को अपनी सियासत का जरिया भी बना लिया है।
ये यूपी के जरिए गए सर्वोच्च पंचायत में
लोकसभा चुनाव के बाद प्रदेश भाजपा में पहली बार किसी दूसरे राज्य से सुनील बंसल के रूप में महामंत्री (संगठन) लाया गया है। इससे पहले यह पद दूसरे राज्य के खाते में नहीं गया।
इसकी वजह यह थी कि महामंत्री (संगठन) की जिसे जिम्मेदारी सौंपी जाए, वह सूबे के कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद व संपर्क रख सके। अब मनोहर परिकर को यूपी से राज्यसभा भेजने का फैसला किया गया।
तर्क दिया जा सकता है कि पहले भी अरुण शौरी, बलवीर पुंज तथा सुब्रह्मण्यम स्वामी यूपी से राज्यसभा जा चुके हैं, लेकिन पुराने लोगों की मानें तो ये उदाहरण परिकर पर फिट नहीं बैठते। शौरी व पुंज को पत्रकार के रूप में यूपी के कोटे से लिया गया था। वहीं स्वामी को संगठन की योजना के तहत यहां लगाया गया था।
कहीं यह वजह तो नहीं : भले कहा जा रहा हो कि मनोहर परिकर के रूप में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सरकार के स्तर पर भी यूपी में अपना एक आदमी लगा दिया हो, पर प्रदेश भाजपा के कुछ वरिष्ठ नेताओं की बातों पर गौर करें तो मामला कुछ और नजर आता है।
यूपी भाजपा के बिखराव का लाभ उठा रहा शीर्ष नेतृत्व
इनका कहना है कि भले ही कुछ नेताओं की गुटबाजी ने यूपी में पार्टी की साख को धूल में मिला दिया हो, पर इसका मतलब यह तो नहीं है कि अब उत्तर प्रदेश में कोई एक व्यक्ति भी ऐसा नहीं है जिसे आगे करके भाजपा की पकड़ व पहुंच को मजबूत बनाने की कोशिश की जाए। चुनाव लड़ाने के लिए प्रत्याशी भी दूसरे राज्यों से लाने पड़ें। इनका कहना है कि यूपी के कुछ नेताओं की गलती का राष्ट्रीय स्तर पर बैठे दूसरे राज्यों के सक्षम लोग लाभ उठा रहे हैं।
धीरे-धीरे यहां प्रदेश से लेकर जिलों तक जमे-जमाए लोगों को नेपथ्य में भेजकर वफादारों की टीम खड़ी की जा रही है। ये उदाहरण देते हैं कि गोवा में हुई भाजपा की राष्ट्रीय परिषद की बैठक की, जिसमें लालकृष्ण आडवाणी नहीं गए थे। उसी बैठक में परिकर ने मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने की मांग उठाई थी।
खूब लाए गए बाहरी : कहीं न कहीं यूपी वालों की यह आशंका उचित भी लगती है। इस लोकसभा चुनाव में ऐसे कई प्रत्याशियों के नाम सामने आए, जिनका यूपी से वास्ता ही नहीं था। गाजियाबाद से सांसद पूर्व सेना प्रमुख वीपी सिंह, मथुरा से हेमा मालिनी, अमरोहा से सांसद कंवर सिंह तंवर इसी श्रेणी में आते हैं।
स्मृति ईरानी को अमेठी से लड़ाया गया। हालांकि वे जीत नहीं पाईं। झांसी से सांसद उमा भारती भले ही अब यूपी की मतदाता सूची में शामिल हो गई हों लेकिन वे भी मध्य प्रदेश की हैं। भले ही मोदी यूपी में भाजपा का माहौल बनाने के लिए काशी से चुनाव लड़े थे, पर वे भी गैर यूपी वाले ही हैं।
वरुण और मेनका का कोई प्रभाव नहीं
मेनका गांधी व वरुण गांधी को भले ही यूपी वाला कहा जाता हो लेकिन यूपी के सरोकारों से इनका बहुत ज्यादा वास्ता नहीं रहता। ये यहां से सिर्फ चुनाव लड़ते हैं। ज्यादा से ज्यादा अपने क्षेत्र के कुछ प्रमुख लोगों से संवाद रखते हैं। संगठन की बैठकों व आंदोलनों में भी मां-बेटे की भागीदारी कहीं नहीं दिखती।
जवाब कौन देगा : समय-समय पर यूपी भाजपा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा चुके कुछ नेता जो तर्क देते हैं, उनसे भी इस प्रयोग के पीछे कहीं न कहीं संदेह जैसी स्थिति नजर आती है। वे उदाहरण देते हैं कि 2002 के बाद प्रदेश भाजपा अध्यक्षों का फैसला दिल्ली से हुआ।
प्रभारी दिल्ली से तय हुए। 2012 के विधानसभा चुनाव से तो यूपी के प्रत्याशियों का फैसला भी दिल्ली से होने लगा। इस लोकसभा चुनाव में यूपी में चुनाव समिति की बैठक की औपचारिकता तक नहीं निभाई गई।
दोनों हाथ में लड्डू : प्रयोगों के नतीजे अच्छे आ जाएं तो वाहवाही केंद्रीय नेतृत्व की और अपेक्षित सफलता न मिले तो ठीकरा यूपी वालों के सिर। उदाहरण के लिए 2012 के विधानसभा चुनाव में उमा भारती को मध्यप्रदेश से यूपी लाकर भाजपा की नैया पार लगाने की जिम्मेदारी दी गई।
वे खुद तो चुनाव जीत गईं लेकिन भाजपा की सीटें बढ़ने के बजाय घट गईं। इसके बाद प्रदेश अध्यक्ष सूर्यप्रताप शाही तो हटा दिए गए, पर उमा भारती बनी रहीं, जिनकी देखरेख में चुनाव की पूरी रणनीति बनी थी।