यूपी का रण : चुनाव आयोग ने बजाई दुंदुभि, सेनाएं तैयार, अब प्रत्याशियों का इंतजार
इंतजार खत्म। अब परीक्षा की बारी है। आपकी परीक्षा। हमारी परीक्षा...। चुनना हमें है। क्योंकि, ये चुनाव हमारी उम्मीदों का है। हमारे सपनों का है। वक्त की कसौटी पर खुद को परखिए। अपने दिल को टटोलिए। हर पैमाने पर...। कोई अगर-मगर न रहे। क्योंकि, सवाल हमारे भविष्य का है। खुद से पूछिए, हमें क्या चाहिए? बार-बार पूछिए? खुद से सवाल इसलिए जरूरी है, क्योंकि यही सही फैसले की ओर ले जाएंगे।
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विस्तार
2022 की दुंदुभि बज गई है। सेनाएं तैयार हैं। चुनावी महारथी अपना पाला तय करने में जुटे हैं। निष्ठा व नेतृत्व तेजी से बदले जा रहे हैं। कल तक जो इस पाले में थे, उस पाले में पहुंच गए हैं। पाला बदल के साथ सुविधाजनक चुनावी मुद्दे और मुहावरे भी गढ़े जाने लगे हैं। सत्ता के लिए जो उपलब्धि है, विपक्ष को उसी में विफलता नजर आ रही है। जनता के जो मुद्दे हैं, उन पर चर्चा की जगह आरोप-प्रत्यारोप, विषैले वचनों व व्यंग्यबाणों का संधान है। मतदाता बोलने लगे हैं और टिकटों का एलान होते ही चुनावी तस्वीर साफ होने लगेगी।
महंगाई व बेरोजगारी से जनता जार-जार है। पांच साल पहले के मुकाबले नमक, आलू, प्याज, आटा, सरसों तेल और रसोई गैस के बढ़े दाम जनता के बीच मुद्दा हैं। 12 रुपये प्रति लीटर दाम घटाए जाने के बावजूद पेट्रोल व डीजल की तुलना पिछले चुनाव से की जा रही है। जनता की ट्रेन कही जाने वाली कई पैसेंजर ट्रेनें बंद हो गईं और बढ़ा बस का किराया भी याद दिलाया जा रहा है। सत्ता की ओर से तमाम सड़कें, पुल, हाईवे बनाने के दावे हैं तो विपक्ष खराब व जर्जर सड़कें दिखा रहा है। कर्मचारियों की 2005 में पुरानी पेंशन बंद हो गई। नई पेंशन वाली पीढ़ी बुढ़ापे के असुरक्षा बोध से परेशान है। आउटसोर्सिंग की नौकरियों में शोषण का मुद्दा भी है। मगर, चुनाव में इन मुद्दों पर चर्चा नहीं हो पा रही है। हालांकि, लुभावने वादों की बौछार फिर शुरू हो गई है।
घाटे के बावजूद मुफ्त बिजली का वादा
बिजली निगम 90 हजार करोड़ से अधिक के घाटे में हैं, लेकिन 300 यूनिट फ्री बिजली के वादे किए जा रहे हैं। वादे के बावजूद अखिलेश सरकार पहले वर्ष के बाद दोबारा कॉलेज स्टूडेंट्स को लैपटॉप नहीं बांट पाई थी। कन्या विद्याधन बंद कर देना पड़ा। योगी सरकार भी किसानों से कर्जमाफी का वादा कर सिर्फ एक लाख रुपये तक का कर्ज माफ कर पाई। छात्रों को लैपटॉप का वादा कर टैबलेट व मोबाइल फोन देने की शुरुआत पांचवें साल कर पाई। लेकिन, मतदाताओं को लुभाने के लिए मुफ्त लैपटॉप, स्कूटी, विदेश में पढ़ाई व सिंचाई जैसे वादे शुरू हो गए हैं। भाजपा सरकार जो विकास के दावे कर रही है, विपक्ष को वे सब अपनी शुरुआत वाले लग रहे हैं।
आन-बान-शान का चुनाव
यह चुनाव भाजपा व सपा की आन, कांग्रेस की पहचान और बसपा के सम्मानजनक उपस्थिति के लिहाज से अहम है।
- गृहमंत्री अमित शाह कह चुके हैं कि मोदी को 2024 में जिताने के लिए योगी के नेतृत्व में 2022 की सरकार बनाना जरूरी है। वजह स्पष्ट है कि भाजपा यूपी का यह चुनाव हारी तो मोदी का 2024 में सत्ता की हैट्रिक का दावा कमजोर हो जाएगा।
- मोदी सत्ता में न आए तो 2025 में आरएसएस के शताब्दी वर्ष का उल्लास फीका रह जाएगा। सपा यह चुनाव हारी तो बसपा की लाइन में बढ़ जाएगी और आगे के चुनावों में उसकी जगह कांग्रेस या आप के लेने की संभावना बढ़ जाएगी। बसपा इस बार भी कुछ बेहतर न कर पाई तो अस्तित्व की चुनौती आ जाएगी। कांग्रेस के लिए खोए बेस को फिर से तैयार करने का यह चुनाव है।
तेजी से बदल रही सियासी तस्वीर
विधानसभा उपाध्यक्ष चुनाव के पहले तक शर्तें मानने पर भाजपा के पाले में जाने को तैयार सुभासपा के नेता ओमप्रकाश राजभर अब सपा के साथ हैं। बाहुबली विधायक मुख्तार अंसारी के भाई सिगबतुल्ला अंसारी भी सपा में चले गए हैं। राजभर ने सपा मुखिया के साथ जुगलबंदी के बाद सबसे पहले जेल जाकर मुख्तार से मुलाकात कर उन्हें टिकट देने का एलान कर दिया है। यानी मुख्तार की वाया सुभासपा सपा के समर्थन से फिर चुनावी जंग की तैयारी है। सपा मुखिया अपने चाचा शिवपाल सिंह यादव के साथ गठबंधन का एलान कर चुके हैं और रालोद मुखिया जयंत चौधरी भी उनके साथ हैं। भाजपा अपना दल (एस) व निषाद पार्टी के साथ है।
आमने-सामने की चुनावी तस्वीर
विश्लेषकों का मानना है कि इस चुनाव में भाजपा और सपा के बीच सीधी लड़ाई की तस्वीर बन रही है। कद्दावर नेताओं के दूसरे दलों में जाने से बसपा की पहले जैसी स्थिति जमीन पर नहीं रह गई है। प्रारंभिक रुझान ये है कि मुस्लिम व यादव मतदाता अब तक की सर्वाधिक एकजुटता के साथ बिना हो-हल्ला सपा को वोट करने का मन बनाता नजर आ रहा है। यदि इसमें सपा प्रत्याशियों के सजातीय तथा महंगाई व बेरोजगारी को मुद्दा बनाने वाले नाराज वोटर भी जुड़ जाएं तो लड़ाई तगड़ी होगी। दूसरी तस्वीर यह है कि कमजोर स्थिति वाले क्षेत्रों से बसपा से छिटक रहा बड़ा हिस्सा भाजपा की ओर तेजी से लामबंद हो रहा है। इसके अलावा लाभार्थीपरक योजनाओं से बड़ा वर्ग भाजपा की ताकत बढ़ा रहा है।
काम का आकलन करें मतदाता
मतदाताओं को सरकार के वादे, पांच वर्ष के कार्यकाल में उसकी नीतियों, अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति के लिए उसकी प्राथमिकताओं व उसके लिए किए गए काम का आकलन कर वोट करना चाहिए। प्रदेश आज भी जाति व धर्म में उलझा हुआ है। लेकिन, सोशल मीडिया के जमाने में मतदाता बहुत जागरूक व समझदार है। युवाओं की जिम्मेदारी ज्यादा है। उन्हें तय करना है कि बंटा समाज चाहिए या भ्रष्टाचार मुक्त, अपराध मुक्त, शिक्षा व रोजगार के प्रति समर्पित सरकार चाहिए।
- डॉ. बीना राय, प्राचार्या, अवध गर्ल्स डिग्री कॉलेज, लखनऊ
सपा भी ध्रुवीकरण की ओर
सपा पिछले कुछ समय से मुस्लिम ध्रुवीकरण से बचने व नरम हिंदुत्व का चोला पहनने की कोशिश करती नजर आ रही थी। अखिलेश यादव सपा की इमेज बदलने का संकेत देने की कोशिश करते रहे हैं। सपा का मुस्लिम चेहरा रहे आजम खां के लिए उनका वह समर्थन व संघर्ष भी नहीं दिखा जिसकी उनके समर्थकों को उम्मीद थी। आजम पिछले पांच वर्ष से अकेले नजर आए हैं। सपा के इस बदलाव पर कट्टर आलोचक तबके की भी सकारात्मक प्रतिक्रिया देखने को मिल रही थी। मगर, चुनाव नजदीक आने पर सिगबतुल्ला अंसारी, मुख्तार अंसारी, कादिर राणा जैसे नेताओं के प्रति प्रेम भी नहीं दबा पाए। मोहम्मद अली जिन्ना को सरदार पटेल के बराबर रखने की कोशिश करने लगे। सपा की यह रणनीति चुनाव को ध्रुवीकरण की ओर ले जा रही है जो भाजपा को सूट करेगा।
- डॉ. अमित उपाध्याय, राजनीति विज्ञान विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर, गोरखपुर विश्वविद्यालय
सक्षम और स्थिर सरकार का चुनाव अब आपके हाथ में
पांच साल का यह चुनावी उत्सव महज एक औपचारिकता भर नहीं है। इस महापर्व पर देश की महान लोकतांत्रिक व्यवस्था हमें सरकार चुनने का बहुमूल्य अधिकार प्रदान करती है। ऐसा सुअवसर हमारे समक्ष होता है कि हम अपने कीमती वोट का पूरे विवेक के साथ इस्तेमाल कर एक ऐसी समर्थ सरकार चुनें जो राज्य के हित में काम करे, भ्रष्टाचार, निजी स्वार्थों से ऊपर उठकर स्थायित्व प्रदान करे, ताकि राज्य विकास के रास्ते पर तेजी से कदम बढ़ा सके। यह हम सबके हित के साथ ही हमारी युवा और भावी पीढ़ी के सुनहरे भविष्य के लिए भी अति आवश्यक है।
वैसे तो यूपी के कई राजनेताओं ने पूरे देश पर राज किया है, पर यह भी उतना ही सच है कि यूपी हमेशा झंझावातों से जूझता रहा है। इतिहास पर नजर डालें तो राज्य के साथ यह दुर्भाग्य भी रहा है कि राजनीतिक उलटफेरों के चलते कुछ चुनी हुई सरकारें और कई मुख्यमंत्री अपना तय कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए। इससे आम जनता के लिए जो प्राथमिकताएं थीं, वे गौण हो गईं।
भ्रष्टाचार भी खूब पनपा, कानून व्यवस्था के हालात भी अच्छे नहीं रहे। कमजोर सरकारों की वजह से यूपी की छवि लंबे समय तक एक अस्थिर राज्य जैसी रही। इसका प्रतिकूल असर यह हुआ कि पहले से ही अति पिछड़े राज्यों में शुमार उत्तर प्रदेश और पिछड़ता चला गया। लेकिन बाद के वर्षों में स्थायित्व वाली सरकारों का गठन हुआ और उनके कामकाज का राज्य के विकास पर सीधा असर दिखा। सरकारों को भी समझ में आ गया कि बिना विकास के उनका सत्ता में टिके रहना आसान नहीं होगा। सीमित प्राकृतिक संसाधनों के बावजूद स्थिर सरकारों और अपने जुझारूपन की वजह से राज्य ने अब विकास की ठीक-ठाक रफ्तार पकड़ ली है। यह एक तरह से सीख है कि मताधिकार का विवेकपूर्ण इस्तेमाल उज्ज्वल भविष्य के लिए भी जरूरी है।
विकास की इस रफ्तार को बनाए रखने के लिए एक स्थिर और मजबूती से जमीनी काम करने वाली सक्षम सरकार राज्य के लिए बेहद जरूरी है। ऐसी सरकार का चयन किसी और को नहीं, बल्कि जागरूक मतदाताओं को ही करना है। सही प्रतिनिधित्व चुनने के इस पवित्र यज्ञ में नागरिक ही सर्वोपरि है। चुनाव घोषणा के बाद हमारे पास पर्याप्त समय है, जिसमें हम राजनीतिक दलों के घोषणापत्रों, उनके दावों, चाल-चरित्र, जमीनी हकीकत और नैतिकता को परख सकेंगे। इस दौरान राजनीतिक दल अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए सारे हथकंडे आजमाएंगे। अपनी जीत पक्की करने के लिए कई अजब-गजब खेल खेलेंगे। लोक लुभावन नारे होंगे। पर, हमें खुद परखना होगा, सवाल करना होगा कि हमारे राज्य को कौन तरक्की दिला सकता है। सुरक्षा दिला सकता है।
स्वास्थ्य-शिक्षा के बेहतर संसाधन उपलब्ध करा सकता है। सबसे बड़ा मुद्दा तो यही होगा कि हमारी युवा पीढ़ी के सुनहरे भविष्य के लिए रोजगार उपलब्ध कराने में कौन ज्यादा सक्षम होगा। इसके लिए जरूरी होगा कि हम भावनाओं में न बहें और अपने हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता पर रख कर वोट देने का फैसला करें। चुनाव के दौरान हमें राजनीतिक दलों से इन सवालों के जवाब मांगने होंगे। राजनीतिक दलों को भी समझना होगा कि अब यूं ही महज कोरे वादों-नारों से उनकी नैया पार होने वाली नहीं है। न ही अपने वोट के ताकतवर अधिकार से लैस आम लोग उनके ऐसे मंसूबों को यूं ही पूरा हो जाने देंगे। आखिर बाजी पलटने की असली ताकत तो अब सर्वशक्तिमान मतदाता के हाथ में ही होगी। इसके लिए यह भी जरूरी होगा कि मतदान के दिन हम वोट देने के पुनीत कार्य को पूरे हौसले के साथ एक उत्सव, एक संस्कार और एक नैतिक दायित्व मानते हुए पूरा करें।
00- राजीव सिंह