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चुनाव लड़ने वाले 80 फीसदी से ज्यादा नेताओं की नहीं बचती जमानत
शोभित श्रीवास्तव/अमरउजाला, लखनऊ
Updated Fri, 10 Mar 2017 05:28 PM IST
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करीब दो महीने तक चले सियासी महासंग्राम के बीच एक रोचक तथ्य यह है कि चुनाव लड़ने वाले नेताओं में 80 फीसदी से अधिक नेता तो अपनी जमानत भी नहीं बचा पाते।
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इन्हें इतना भी वोट नहीं मिलता कि ये चुनाव आयोग से जमानत की रकम वापस ले सकें। औसत 10 से 15 फीसदी नेता ही अपनी जमानत बचा पाते हैं।
विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए हर प्रत्याशी को पांच हजार रुपये की जमानत राशि जमा करनी होती है।
जमानत राशि तभी वापस मिलती है जब प्रत्याशी को अपनी विधानसभा में पड़े कुल वैध मतों का छठा हिस्सा पाना जरूरी होता है। वर्ष 2012 के चुनाव को देखा जाए तो सूबे की 403 विधानसभा सीटों के लिए 6839 प्रत्याशी चुनाव मैदान में थे।
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इनमें से 403 सीटों पर जीतने वाले उम्मीदवारों के अलावा केवल 676 प्रत्याशी ही जमानत बचाने में कामयाब रहे। यानी 84 फीसदी नेताओं की चुनाव में जमानत जब्त हो गई।
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इससे पहले वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव में भी 403 सीटों के लिए 6086 प्रत्याशी चुनाव मैदान में थे। इसमें से 83 फीसदी प्रत्याशी भी अपनी जमानत राशि नहीं बचा पाए।
केवल चुनाव जीतने वाले प्रत्याशियों के अलावा 649 नेता ही अपनी जमातन बचा सके। वर्ष 2002 के चुनाव में भी 80 फीसदी नेता अपनी जमानत धनराशि नहीं बचा पाए। केवल 708 प्रत्याशी ही अपनी जमानत बचा सके।
1993 में 89 फीसदी की जमानत हुई थी जब्त
राजनीति
- फोटो : demo
वर्ष 1993 में सूबे की 422 सीटों के लिए सबसे अधिक 9726 प्रत्याशी चुनाव मैदान में थे। इनमें से 89 फीसदी प्रत्याशी अपनी जमानत नहीं बचा पाए। मात्र 652 प्रत्याशी ही जमानत बचाने में कामयाब रहे। 1993 के चुनाव में 8652 प्रत्याशियों की जमानत जब्त हुई थी।
वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव को देखा जाए तो अन्य चुनाव की तुलना में इस बार कम प्रत्याशियों ने किस्मत आजमाई। इस बार 4863 प्रत्याशी ही चुनाव मैदान में हैं, जबकि हर चुनाव में छह हजार से अधिक प्रत्याशी चुनाव लड़ते आए हैं। इस बार के चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी कम संख्या में चुनाव लड़ रहे हैं।
बहुत से प्रत्याशी भले ही चुनाव में न जीतें, लेकिन वे इसलिए खड़े होते हैं ताकि किसी के वोट काट सकें। ऐसे प्रत्याशियों को पार्टियां खुद अपने फायदे के लिए खड़ा करवाती हैं।
इसके अलावा ज्यादातर बड़ी पार्टियों के प्रत्याशी अपने डमी कैंडिडेट भी खड़े करती हैं ताकि पोलिंग बूथ में उनके अधिक से अधिक समर्थक पोलिंग एजेंट के रूप में तैनात हो सकें।
आंकड़ों की जुबानी
वर्ष कुल प्रत्याशी जमानत जब्त प्रतिशत
2012 6839 5760 84.22
2007 6086 5034 82.71
2002 5533 4422 79.92
1996 4429 3244 73.24
1993 9726 8652 88.95
1991 7851 6811 86.75
1989 6102 5093 83.46
वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव को देखा जाए तो अन्य चुनाव की तुलना में इस बार कम प्रत्याशियों ने किस्मत आजमाई। इस बार 4863 प्रत्याशी ही चुनाव मैदान में हैं, जबकि हर चुनाव में छह हजार से अधिक प्रत्याशी चुनाव लड़ते आए हैं। इस बार के चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी कम संख्या में चुनाव लड़ रहे हैं।
बहुत से प्रत्याशी भले ही चुनाव में न जीतें, लेकिन वे इसलिए खड़े होते हैं ताकि किसी के वोट काट सकें। ऐसे प्रत्याशियों को पार्टियां खुद अपने फायदे के लिए खड़ा करवाती हैं।
इसके अलावा ज्यादातर बड़ी पार्टियों के प्रत्याशी अपने डमी कैंडिडेट भी खड़े करती हैं ताकि पोलिंग बूथ में उनके अधिक से अधिक समर्थक पोलिंग एजेंट के रूप में तैनात हो सकें।
आंकड़ों की जुबानी
वर्ष कुल प्रत्याशी जमानत जब्त प्रतिशत
2012 6839 5760 84.22
2007 6086 5034 82.71
2002 5533 4422 79.92
1996 4429 3244 73.24
1993 9726 8652 88.95
1991 7851 6811 86.75
1989 6102 5093 83.46