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गुजरात तक जीत का संदेश देने के लिए अयोध्या में परचम लहराना भाजपा की चुनौती
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
Updated Tue, 21 Nov 2017 02:11 PM IST
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नगरीय निकायों में पहले चरण का प्रचार बंद होते ही चुनाव की उल्टी गिनती शुरू हो गई है। इनमें भाजपा की प्रतिष्ठा दांव पर है। प्रथम चरण में जिन पांच नगर निगमों में चुनाव होना है, वहां 22 नवंबर को मतदान होगा।
अयोध्या पहली बार नगर निगम बना है। शेष चार नगर निगमों पर पहले से भाजपा का कब्जा है। उसके सामने किसी को हराने से ज्यादा अपना गढ़ बचाने की चुनौती है। यह चुनौती इसलिए और गंभीर हो गई है कि निकाय चुनाव के बाद गुजरात में विधानसभा चुनाव हैं।
प्रदेश में पहले चरण में 24 जिलों में 230 नगरीय निकायों में मेयर, पार्षद, अध्यक्ष व सभासदों के चुनाव होने हैं। इन निकायों में 5 नगर निगम, 71 नगर पालिकाएं और 154 नगर पंचायतें हैं।
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मेरठ, आगरा, गोरखपुर व कानपुर में 2012 में भाजपा के मेयर चुने गए थे। ये सभी महानगर लंबे समय से भाजपा के गढ़ बने हुए हैं। पिछली बार सत्ता में होने के बावजूद सपा ने अपने सिंबल से चुनाव नहीं लड़ा था।
इस बार सपा, बसपा और कांग्रेस अपने चुनाव चिह्न लेकर मैदान में उतरी है। उनके लिए इन चुनावों में खोने के लिए कुछ खास नहीं है। असली परीक्षा तो भाजपा की है। उस पर जहां अयोध्या में परचम लहराने का दबाव है, वहीं अन्य नगर निगमों में फिर से अपने मेयर बनवाने का दबाव है।
सीएम योगी आदित्यनाथ व भाजपा की प्रदेश इकाई निकाय चुनावों में गुड न्यूज देना चाहती है ताकि इसका संदेश गुजरात तक जाए जहां 9 व 14 दिसंबर को चुनाव होना है।
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अयोध्या पहली बार नगर निगम बना है। शेष चार नगर निगमों पर पहले से भाजपा का कब्जा है। उसके सामने किसी को हराने से ज्यादा अपना गढ़ बचाने की चुनौती है। यह चुनौती इसलिए और गंभीर हो गई है कि निकाय चुनाव के बाद गुजरात में विधानसभा चुनाव हैं।
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प्रदेश में पहले चरण में 24 जिलों में 230 नगरीय निकायों में मेयर, पार्षद, अध्यक्ष व सभासदों के चुनाव होने हैं। इन निकायों में 5 नगर निगम, 71 नगर पालिकाएं और 154 नगर पंचायतें हैं।
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मेरठ, आगरा, गोरखपुर व कानपुर में 2012 में भाजपा के मेयर चुने गए थे। ये सभी महानगर लंबे समय से भाजपा के गढ़ बने हुए हैं। पिछली बार सत्ता में होने के बावजूद सपा ने अपने सिंबल से चुनाव नहीं लड़ा था।
इस बार सपा, बसपा और कांग्रेस अपने चुनाव चिह्न लेकर मैदान में उतरी है। उनके लिए इन चुनावों में खोने के लिए कुछ खास नहीं है। असली परीक्षा तो भाजपा की है। उस पर जहां अयोध्या में परचम लहराने का दबाव है, वहीं अन्य नगर निगमों में फिर से अपने मेयर बनवाने का दबाव है।
सीएम योगी आदित्यनाथ व भाजपा की प्रदेश इकाई निकाय चुनावों में गुड न्यूज देना चाहती है ताकि इसका संदेश गुजरात तक जाए जहां 9 व 14 दिसंबर को चुनाव होना है।
पालिका परिषदों, नगर पंचायतों में असली इम्तिहान
राजनीति के जानकार मानते हैं कि महानगरों में भाजपा को इस बार भी विपक्षी दलों से शायद ही गंभीर चुनौती मिले लेकिन नगर पालिका परिषदों व नगर पंचायतों में उसे सपा, बसपा, कांग्रेस के साथ ही कहीं-कही निर्दलीय प्रत्याशियों से भी टक्कर मिल रही है। विधानसभा चुनावों में शहरी सीटों पर शानदार कामयाबी हासिल करने वाली भाजपा का असली इम्तिहान नगर पालिकाओं व नगर पंचायतों में है।
किले बचाने को किलेबंदी
भाजपा ने अपने शहरी किले बचाने के लिए मजबूत किलेबंदी की है। पहली बार भाजपा ने निकाय चुनावों में इतनी ताकत झोंकी है। निकाय चुनाव में पहले किसी मुख्यमंत्री ने इस तरह प्रचार नहीं किया जैसे योगी आदित्यनाथ कर रहे हैं। उनके अलावा प्रदेश अध्यक्ष डॉ. महेन्द्र नाथ पांडेय, डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य और डॉ. दिनेश शर्मा सघन दौरे कर रहे हैं।
हर जिले में एक वरिष्ठ पदाधिकारी को प्रभारी बनाकर बैठाया गया है। हर जिले में प्रभारी मंत्री को कमल खिलाने की जिम्मेदारी मिली हैं। सभी महानगरों में सरकार के एक-एक वरिष्ठ मंत्री या भाजपा के वरिष्ठ नेता कैंप कर रहे हैं। वे नाराज भाजपाइयों को मना रहे हैं और दूसरे दलों में सेधमारी कर रहे हैं।
विपक्ष के बिखराव से भाजपा को राहत
भाजपा को विपक्षी दलों के बिखराव से राहत मिली है। शहरी क्षेत्रों में हालांकि सपा, बसपा और कांग्रेस का बहुत ज्यादा जनाधार नहीं है लेकिन वे सभी अपने सिंबल पर चुनावी जंग लड़ रहे हैं। भाजपा विरोधी मतों का अधिकतर निकायों में बंटवारा हो रहा है। यह स्थिति भाजपा के लिए सुखद है। माना जा रहा है कि सीधे मुकाबले में भाजपा को चुनौती मिल सकती थी लेकिन बहुकोणीय मुकाबलों ने उसकी राह आसान कर दी है।