इस घपले ने खोली यूपी सरकार की पोल!
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‘यावत् जीवेत सुखम् जीवेत, ऋणम् कृत्वा घृतं पिबेत।’ (जब तक जियो सुख से जिओ, ऋण लेकर घी पिओ।)
प्रसिद्ध दार्शनिक ‘चार्वाक’ की यह उक्ति अपने सूबे के राजकाज पर एकदम खरी उतर रही है।
प्रदेश में पहले विकास के नाम पर कर्ज लिया जाता है फिर जब उसे चुकाने का वक्त आता है तो ऋण की रकम का ही उपयोग किया जाता है।
सीएजी ने विकास योजनाओं की खातिर लिए गए बाजार ऋण का उपयोग कर्ज चुकाने में करने को बहुत गंभीर माना है। सीएजी ने इस आपत्तिजनक कार्यप्रणाली पर वित्त विभाग की दलील भी ठुकरा दी है।
सामने आए चौंकाने वाले तथ्य
वित्त विभाग के अधिकारी बताते हैं कि यूपी राजकोषीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबंधन अधिनियम 2004 (डी) में बाजार ऋण के उपयोग को लेकर स्पष्ट प्रावधान है।
इसके अनुसार बाजार ऋण का उपयोग अनिवार्य रूप से स्वपोषित विकास कार्यकलापों व पूंजीगत परिसंपत्तियों के सृजन व संवर्धन में किया जाना चाहिए।
प्रदेश सरकार ने यह प्रावधान कर रखा है कि वह बाजार ऋण का उपयोग ऊर्जा, कृषि, सिंचाई व उद्योगों से संबंधित योजनाओं को वित्तीय मदद देने में करेगा।
पर, वर्ष 2008 से 2013 के बीच सरकार द्वारा बाजार से लिए गए ऋण और उसके उपयोग की समीक्षा हुई तो चौंकाने वाले तथ्य सामने आए।
लिया गया 63898.84 करोड़ का लोन
पता चला कि इन पांच वर्षों में बाजार से 63898.84 करोड़ का ऋण लिया गया था, जिसमें 13010.49 करोड़ रुपये का उपयोग ऋणों के पुनर्भुगतान के लिए किया गया।
पूंजीगत निर्माण में केवल 80 प्रतिशत बजट खर्च किया गया। सबसे चौंकाने वाली तस्वीर वर्ष 2012-13 की है।
इस वर्ष बाजार ऋण का 34.08 फीसदी हिस्सा पुनर्भुगतान पर खर्च कर दिया गया। सीएजी ने इसे राजकोषीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबंधन के उल्लंघन का मामला माना है।
सीएजी की आपत्ति पर वित्त विभाग ने दलील दी कि शासन अपनी नकद जरूरतों को पूरा करने के लिए पहले से लिए गए बाजार ऋण को समाप्त कराने के लिए बाजार ऋणों का सहारा ले सकता है।