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अमेठी में संजय गांधी को हराने में अरुण जेटली ने निभाई थी भूमिका, टूटी जीप से किया था प्रचार

Sat, 24 Aug 2019 10:25 PM IST
ishwar ashish न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ Published by: ishwar ashish Updated Sat, 24 Aug 2019 10:25 PM IST
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This is how Arun Jaitley was related to Uttar Pradesh.
अरुण जेटली - फोटो : अमर उजाला

भले ही नई पीढ़ी को लगता हो कि पूर्व वित्त मंत्री अरुण जेटली का उत्तर प्रदेश से बहुत गहरा नाता नहीं रहा लेकिन ऐसा नहीं है। जेटली 1971 से ही संघ परिवार, खासतौर से विद्यार्थी परिषद की जड़ें जमाने के लिए यहां आते-जाते रहे। पहले अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ता के रूप में और फिर देश के प्रमुख छात्र नेता के रूप में।

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अंत में भाजपा के वरिष्ठ नेता और केंद्रीय मंत्री के रूप में उत्तर प्रदेश में उनकी काफी सक्रियता रही। संयोग ही है कि उन्होंने जिस यूपी के साथ विद्यार्थी जीवन से नाता जोड़ा था, वह उनके संसदीय जीवन के अंतिम क्षणों तक बना रहा। वह अप्रैल 2018 में उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुए थे।
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जेटली के साथ विद्यार्थी परिषद और फिर भाजपा में काम कर चुके विंध्यवासिनी कुमार बताते हैं, ‘विद्यार्थी परिषद में एक साथ काम करने के नाते मेरा-उनका साथ 1970 से रहा। वह 1971-72 से छात्र आंदोलन, छात्रसंघ चुनाव और विद्यार्थी परिषद की जड़ें जमाने लखनऊ और उत्तर प्रदेश आते-जाते रहे। तब उनका विवाह भी नहीं हुआ था। बिल्कुल मस्त, रात-दिन सिर्फ संगठन के काम की चिंता।
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जेटली 1972 में छात्रसंघ चुनाव में विद्यार्थी परिषद के उम्मीदवारों के प्रचार के लिए लखनऊ विश्वविद्यालय आए थे। यहीं उन्हें पता चला कि अगर वह वाराणसी चले जाएं तो वहां भी विद्यार्थी परिषद के उम्मीदवारों की स्थिति ठीक हो सकती है। सुबह से शाम तक लगातार यहां प्रचार करने के बाद जेटली ने एक कार्यकर्ता के यहां स्नान किया और वाराणसी के लिए निकल लिए।’

'पूरे दिन प्रचार करने के बाद फिर अगले दिन की तैयारियों में जुट जाते थे'

विंध्यवासिनी कुमार बताते हैं, ‘सबसे मजेदार वाकया तो 1977 का है। आपातकाल के बाद ज्यादातर विपक्षी दल जनता पार्टी के नाम से कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लड़ रहे थे। कांग्रेस ने अमेठी से संजय गांधी को मैदान में उतारा। आपातकाल के ठीक बाद का मामला। संजय गांधी की हनक और धमक पूरे सियासी संसार में गूंज रही थी।

जनता पार्टी ने जनसंघ घटक के रवींद्र प्रताप सिंह को उम्मीदवार बनाया। सबसे बड़ा सवाल यह था कि अमेठी में संजय के खिलाफ मोर्चा लेने किसे भेजा जाए। जेटली उन दिनों दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष थे। आपातकाल में जेल में वह भी बंद हुए थे। संगठन ने जेटली को भेजा।

उन दिनों आर्थिक रूप से न संगठन बहुत मजबूत था और न हम लोगों के पास ही संसाधन थे। जैसे-तैसे एक खटारा जीप का इंतजाम हुआ, जिसका कवर भी फटा था। हॉर्न से ज्यादा जीप की बॉडी आवाज करती थी। जेटलीजी और मैंने अंगोछा बांधा तथा जीप लेकर निकल पड़े। एक सभा के बाद ही सभाओं में भीड़ जुटने लगी। लोग देखने आते थे कि वह कौन नौजवान है जो संजय गांधी के खिलाफ भाषण देने आया है।

सुबह निकलते तो शाम तक सिर से लेकर पैरों तक धूल ही धूल। पर, कार्यालय पहुंचते ही जेटलीजी फिर अगले दिन की तैयारियों में सक्रिय हो जाते। खुद कपड़ा धुलना और किसी कार्यकर्ता के घर भोजन। फिर तख्त पर सो जाना। नतीजा यह हुआ कि संजय गांधी हारे और रवींद्र प्रताप सांसद निर्वाचित हुए।’

बाद में जब जेटली को जनता पार्टी की कार्यसमिति का सदस्य बनाया गया तो कुछ लोगों ने सवाल उठाया कि राजनीतिक दल में सक्रियता के कारण जेटली को छात्र राजनीति से अलग हो जाना चाहिए। जेटली ने जनता पार्टी की कार्यसमिति से त्यागपत्र दे दिया और कहा, ‘विद्यार्थी परिषद ने मुझे गढ़ा है। संस्कार दिए हैं। अगर वही छोड़ दूंगा तो मेरे पास बचेगा ही क्या?’

'कार्यकर्ताओं को संघर्ष के लिए अकेले सड़क पर नहीं छोड़ सकता’

मध्यप्रदेश के राज्यपाल लालजी टंडन के पुत्र और प्रदेश सरकार में नगर विकास मंत्री आशुतोष टंडन ‘गोपाल’ बताते हैं कि अरुण जेटली कई भूमिकाओं में लखनऊ से जुड़े रहे। अटल बिहारी वाजपेयी के चुनाव में तो उनका काफी वक्त लखनऊ में गुजरता था। इसके अलावा भी कई कार्यक्रमों में आते रहते थे। अटलजी का स्वास्थ्य खराब हुआ तो पिताजी ने जेटलीजी से कहा, ‘अटलजी के जन्मदिन पर कार्यक्रम खिचड़ी भोज करना है।’ जेटलीजी ने काफी उत्साह से कहा, ‘मैं रहूंगा।’

उसके बाद वह उस कार्यक्रम में अक्सर आते-जाते रहे। खाने के शौकीन थे। जब आते तो मुझसे कहते, ‘कुछ चाट-वाट भी खिलाओगे या नहीं?’ जब नितिन गडकरी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे तब अटल बिहारी वाजपेयी की अलग-अलग भूमिकाओं को समेटकर ‘अटल समग्र’ तैयार करने की योजना बनी।

उस दौरान जेटलीजी बिना किसी शोर-शराबे के न सिर्फ लखनऊ, बल्कि अन्य स्थानों पर भी इस सामग्री को तैयार कराने के लिए सक्रिय रहे। सदन में मुखर जेटली सड़कों पर लड़ाई पर भी पीछे नहीं रहे। सरकार की नीतियों के खिलाफ लखनऊ में प्रदर्शन था। जेटलीजी को प्रदर्शन का नेतृत्व करना था। वे आए। कुछ लोगों ने उनसे भाषण देकर गाड़ी में बैठ जाने को कहा।

जेटलीजी ने हंसते हुए कहा, ‘छात्र राजनीति करता रहा हूं। कार्यकर्ताओं को संघर्ष के लिए अकेले सड़क पर नहीं छोड़ सकता।’ इस प्रदर्शन में वह आगे की पंक्ति में शामिल रहे। शायद उनकी मौजूदगी ही मुख्य वजह रही कि कार्यकर्ताओं के हौसले के आगे सरकार की बंदिशें टूट गईं।’

इस तरह रहा प्रदेश से जुड़ाव

जेटली प्रदेश भाजपा के प्रभारी भी रहे। वह किसी भूमिका में रहे हों, लेकिन भाजपा के उत्तर प्रदेश से जुड़े प्रत्येक निर्णय में उनकी राय काफी अहम रहती थी। भाजपा के वरिष्ठ नेता राजेंद्र तिवारी बताते हैं कि एक बार वह अटल बिहारी वाजपेयी के नामांकन में हिस्सा लेने लखनऊ आए थे।

उन्होंने अटलजी का नामांकन पत्र खुद भरा। न सिर्फ अटलजी बल्कि लालजी टंडन और राजनाथ सिंह के 2014 में चुनाव लड़ने के दौरान जेटली लखनऊ आते-जाते रहे। उन्होंने प्रदेश के अन्य जिलों में भी चुनावी सभाएं कीं।

रायबरेली में 200 सोलर लाइटें लगवाने की थी इच्छा

प्रदेश से राज्यसभा सदस्य के रूप में जेटली ने रायबरेली को अपना नोडल जिला बनाया था। इसके पीछे पार्टी की इच्छा थी। बताया जाता है कि जेटली जैसे धुरंधर राजनेता के जरिये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कांग्रेस के इस गढ़ के लोगों को संदेश देना चाहते थे कि केंद्र सरकार के लिए रायबरेली वाले भी अपने ही हैं।

सांसद प्रतिनिधि भाजपा नेता हीरो वाजपेयी बताते हैं, जेटली रायबरेली के विकास को लेकर चिंतित थे। कहते थे कि विकास के जरिये ही लोगों के दिलों को जीता जा सकता है। अभी 25 दिन पहले ही उन्होंने सांसद निधि से रायबरेली में 200 सोलर लाइटें लगवाने को कहा था। इसका पत्र भी उन्होंने मुझे भिजवा दिया था।

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