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तो ये संसद में लगाएंगे सियासी छक्का!

Mon, 14 Apr 2014 04:49 PM IST
अनिल श्रीवास्तव/अमर उजाला, लखनऊ
अनिल श्रीवास्तव/अमर उजाला, लखनऊ Updated Mon, 14 Apr 2014 04:49 PM IST
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these politicians can make second hattrick

चुनावी महासमर में इस बार प्रदेश के कई दिग्गज छठवीं बार देश की सबसे बड़ी पंचायत में पहुंचने के लिए जोर-आजमाइश कर रहे हैं। इनमें से कुछ तो ऐसे हैं जो कि चुनावी मैदान में 'अजेय' ही रहे हैं।

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कुछ तो अपनी परंपरागत सीट से किस्मत आजमा रहे हैं तो कई ने नए ठिकाने तलाश लिए हैं। जहां कुछ नेता लगातार दूसरी हैट्रिक के लिए दम लगाए हुए हैं, वहीं कुछ को एकाध बार ब्रेक जर्नी करनी पड़ी।
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इस बार कानपुर से ताल ठोंक रहे भाजपा नेता डॉ. मुरली मनोहर जोशी लोकसभा में अलग-अलग क्षेत्रों की पांच बार नुमाइंदगी कर चुके हैं।

डॉ. जोशी पहली बार आपातकाल के बाद 1977 में हुए चुनाव में अल्मोड़ा सीट से जीतकर लोकसभा में पहुंचे थे। इसके बाद वह 1996, 1998 व 1999 में इलाहाबाद संसदीय सीट से लोकसभा के सदस्य रहे।

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जीते तो भी नहीं होगी लगातार हैट्रिक

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2004 में उन्हें इलाहाबाद सीट पर सपा के कुंवर रेवती रमण सिंह के मुकाबले हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद डॉ. जोशी 2009 में वाराणसी से चुनाव लड़े और बसपा के मुख्तार अंसारी को हराकर लोकसभा पहुंचे।

इस बार वाराणसी से नरेंद्र मोदी के मैदान में होने से जोशी को कानपुर जाना पड़ा। दिलचस्प संयोग है कि डॉ. जोशी जहां से भी लोकसभा का चुनाव लड़े और जीते, वह सीट उन्होंने दूसरे दलों से छीनी।

1977 में डॉ. जोशी से पहले अल्मोड़ा सीट कांग्रेस के पास थी जबकि इलाहाबाद सीट पर पहले जनता दल का कब्जा था।

2004 में इलाहाबाद से हारने के बाद 2009 में जब वह वाराणसी पहुंचे तो कांग्रेस के राजेश मिश्र को हराया। इस बार कानपुर में भी उनका मुकाबला कांग्रेस के सांसद श्रीप्रकाश जायसवाल से है।

कभी नहीं हारे मुलायम

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केंद्रीय राजनीति में कदम रखने के बाद सपा अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव 1996 से लगातार संसद पहुंच रहे हैं। 1996 में उन्होंने मैनपुरी लोकसभा सीट से जीत दर्ज की। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

1998 कालोकसभा चुनाव मुलायम संभल से लड़े और जीते। 1999 में मुलायम ने संभल और कन्नौज दो सीटों से अपनी दावेदारी पेश की थी और उन्होंने दोनों जगहों पर जीत दर्ज की थी। बाद में उन्होंने कन्नौज सीट छोड़ दी।

2000 के उपचुनाव में उनके पुत्र अखिलेश यादव कन्नौज से चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचे। आठ साल बाद 2004 में मुलायम ने फिर से अपनी पुरानी सीट मैनपुरी को चुनावी समर का केंद्र बनाया और वहां से जीत हासिल की।

2009 में भी वह फिर इस सीट से जीते और इस बार वह मैनपुरी के अलावा आजमगढ़ से भी चुनाव लड़ रहे हैं।

मेनका का पीलीभीत प्रेम फिर उजागर

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पिछले पांच चुनावों में लगातार जीत दर्ज करने वालों में भाजपा नेता मेनका गांधी भी शामिल हैं। मेनका ने पहली बार 1996 में निर्दल प्रत्याशी के रूप में जीत हासिल की।

इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। 1998 में उन्होंने भाजपा का हाथ थामा और 1998, 1999 और 2004 में भी पीलीभीत से जीतकर लोकसभा पहुंची।

2009 में मेनका गांधी ने पीलीभीत की सीट अपने पुत्र वरुण गांधी को सौंप दी और आंवला को अपना चुनावी रणक्षेत्र बनाया।

मेनका ने वहां से भी जीत हासिल की। इस बार वह फिर से अपनी पुरानी सीट पीलीभीत से मैदान में हैं।

पांच बार जीत चुके बेनी बाबू

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छठवीं बार संसद पहुंचने को बेनी लगा रहे जोर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता बेनी प्रसाद वर्मा भी लोकसभा में पांच बार से लगातर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं।

उन्होंने अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत सपा के साथ की। सपा के टिकट पर 1996 में उन्होंने कैसरगंज लोकसभा सीट से पहली जीत दर्ज की। इसके बाद 1998, 1999 व 2004 में इस सीट पर उनका कब्जा बरकरार रहा।

2009 में उन्होंने सपा से किनारा करके कांग्रेस का दामन थामा और कैसरगंज के बजाय गोंडा लोकसभा सीट से अपनी किस्मत आजमाई और इसमें उन्हें सफलता भी मिली।

गोंडा से वह छठवीं बार संसद पहुंचने के लिए पूरा जोर लगाए हुए हैं।

ये तो कभी हारे ही नहीं

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आदित्यनाथ ने गोरखपुर में पांच बार कमल खिलाया। पूर्वांचल के कद्दावर भाजपा नेता योगी आदित्यनाथ भी गोरखपुर से लगातार पांच बार लोकसभा चुनाव जीतते आ रहे हैं।

1996 में गोरखपुर लोकसभा क्षेत्र से उन्होंने कमल खिलाया। इसके बाद लगातार जीतते आ रहे हैं।

इस बार भी वह अपनी पारम्परिक सीट गोरखपुर से मैदान में डटे हैं। भाजपा नेता संतोष कुमार गंगवार 1989 से 2004 तक बरेली लोकसभा क्षेत्र से लगातार छह बार जीत दर्ज कर चुके हैं।

2009 में उन्हें कांग्रेस के प्रवीन सिंह ऐरन से हार का सामना करना पड़ा। गंगवार सातवीं बार लोकसभा पहुंचने के लिए बरेली से किस्मत आजमा रहे हैं।
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