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राम मंदिर चोरी: अपनों की घुसपैठ के लिए शुरू से ही बुना गया तानाबाना, आउटसोर्सिंग से लगी पूरी व्यवस्था में सेंध

Thu, 02 Jul 2026 03:35 AM IST
दुष्यंत शर्मा अभिषेक गुप्ता, लखनऊ
अभिषेक गुप्ता, लखनऊ Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Thu, 02 Jul 2026 03:35 AM IST
सार

चढ़ावे की गणना प्रक्रिया में बाहरी लोगों की घुसपैठ कराने करने के लिए आउटसोर्सिंग एजेंसी को बीच में लाया गया। इसी व्यवस्था के जरिये बाद में कथित तौर पर चढ़ावा चोरी में शामिल लोग नियमित रूप से गिनती कक्ष तक पहुंचते रहे।

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Theft at Ram Mandir: A scheme hatched from the very beginning to facilitate the infilt
राम मंदिर चढ़ावा चोरी - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

राममंदिर में चढ़ावे में कथित सेंध का रास्ता अचानक नहीं बना, बल्कि धनराशि की गणना प्रक्रिया की व्यवस्था बनने के समय ही इसके लिए जमीन तैयार कर ली गई थी। सूत्रों के अनुसार चढ़ावे की गणना प्रक्रिया में बाहरी लोगों की घुसपैठ कराने करने के लिए आउटसोर्सिंग एजेंसी को बीच में लाया गया। इसी व्यवस्था के जरिये बाद में कथित तौर पर चढ़ावा चोरी में शामिल लोग नियमित रूप से गिनती कक्ष तक पहुंचते रहे।

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ट्रस्ट और भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) के बीच चढ़ावे को लेकर समझौता हुआ था। इसमें दानपात्र की नकदी, सोना और चांदी की गणना के लिए विस्तृत स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (एसओपी) तय किया गया था। एसओपी का उद्देश्य पूरी प्रक्रिया को सुरक्षित, पारदर्शी और जवाबदेह बनाना था।
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इसी व्यवस्था में बड़ी सेंध आउटसोर्सिंग के जरिए लगी। समझौते की मूल भावना यह थी कि गिनती कक्ष में केवल ट्रस्ट और बैंक के अधिकृत अधिकारी एवं कर्मचारी मौजूद रहेंगे। लेकिन करोड़ों की गणना के लिए अतिरिक्त कर्मचारियों की जरूरत का हवाला देकर बैंक ने वाराणसी की निजी आउटसोर्सिंग एजेंसी की सेवाएं ले लीं। 
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हेराफेरी के आरोपियों को मिला फायदा
एजेंसी के माध्यम से नियुक्त कर्मचारियों को गिनती कक्ष तक नियमित पहुंच मिली। सूत्रों का कहना है कि बाद में जिन पर चढ़ावे में हेराफेरी के आरोप लगे, उन्हें भी इसी व्यवस्था का लाभ मिला। अब सवाल उठ रहे हैं कि क्या इतनी संवेदनशील प्रक्रिया में निजी कर्मचारियों को शामिल करने से पहले उनका सत्यापन किया गया था? यदि किया गया था तो जिम्मेदारी किसकी थी?

बैंकिंग क्षेत्र से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि आउटसोर्सिंग एजेंसियों का उपयोग सामान्य कार्यों में करते हैं, लेकिन बड़ी मात्रा में नकदी की गणना और सुरक्षा जैसी संवेदनशील जिम्मेदारियों में निगरानी और जवाबदेही प्राथमिकता होती है। ऐसे मामलों में अधिकृत बैंक अधिकारियों की प्रत्यक्ष मौजूदगी और नियंत्रण को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है।

अहम सवाल

  • जांच के घेरे में ये बड़े सवाल एसओपी में अधिकृत कर्मियों की व्यवस्था होने के बावजूद निजी एजेंसी की जरूरत क्यों पड़ी?
  • आउटसोर्सिंग एजेंसी के कर्मचारियों का पुलिस व बैकग्राउंड वेरिफिकेशन किसने कराया?
  • गिनती कक्ष में प्रवेश की अंतिम अनुमति किस स्तर से जारी होती थी?
  • बैंक के पर्यवेक्षण की व्यवस्था होने के बावजूद कथित अनियमितताएं लंबे समय तक कैसे नहीं पकड़ी गईं?
  • क्या पूरी व्यवस्था का लाभ उठाने के लिए शुरुआत से ही सुनियोजित तरीके से ‘अपने’ लोगों को शामिल कराया गया?

बैंक की निगरानी पर भी सवाल
सूत्रों का कहना है कि समझौते में यह भी प्रावधान था कि बैंक के अधिकारी पूरी गणना प्रक्रिया की नियमित निगरानी करेंगे, ताकि किसी भी तरह की गड़बड़ी की संभावना न रहे। इसके बावजूद यदि निजी एजेंसी के कर्मचारियों को इतनी महत्वपूर्ण भूमिका दी गई और कथित तौर पर लंबे समय तक अनियमितताएं होती रहीं, तो बैंक की निगरानी व्यवस्था भी सवालों के घेरे में आ गई है।

जांच एजेंसियां अब इस पहलू की भी पड़ताल कर रही हैं कि आउटसोर्सिंग एजेंसी के कर्मचारियों के चयन, उनकी तैनाती, सत्यापन और गिनती कक्ष में प्रवेश की अनुमति किस स्तर पर दी गई। साथ ही यह भी देखा जा रहा है कि बैंक और एजेंसी के बीच जिम्मेदारियों का निर्धारण किस प्रकार किया गया था और कहीं इसी व्यवस्था का दुरुपयोग तो नहीं हुआ।

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