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मंच पर उतरी बेगम हजरत महल की कहानी
Wed, 06 Mar 2019 02:00 AM IST
sahaj sahaj
न्यूज डेस्क, अमर उजाला लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला लखनऊ
Published by: sahaj sahaj
Updated Wed, 06 Mar 2019 02:00 AM IST
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बेगम हजरत महल
- फोटो : amar ujala
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दर-ओ-दीवार पर हसरत से नजर करते हैं, खुश रहो अहल-ए-वतन हम तो सफर करते हैं। अवध पर कब्जा करने की नीयत से अंग्रेज यहां के नवाब वाजिद अली शाह को गिरफ्तार कर लेते हैं, और उन्हें महल से कैद कर कलकत्ता की जेल में डाल दिया जाता है। लेकिन उनकी बेगम ‘बेगम हजरत महल’ हार नहीं मानतीं। अवध की जनता को अंग्रेजों के जुल्म से बचाने के लिए अंग्रेजों से मुकाबला करने का फैसला करती हैं। बेगम की कहानी कैसरबाग स्थित बली प्रेक्षागृह में आयोजित नाटक ‘बेगम हजरत महल’ के जरिए मंगलवार को मंच पर उतरी।
दृश्य भारती की ओर से अमजद अली खां द्वारा लिखित व नवाब मसूद अब्दुल्ला द्वारा निर्देशित नाटक में दिखाया गया कि वफादार सिपहसालार राजा जियालाल, राजा बालकिशन, महमूद अली खां बहादुर से मशविरा कर बेटे को बादशाह बना देती हैं और कानपुर के नाना साहेब और फैजाबाद के मौलवी अहमदउल्ला शाह को साथ लेकर फिरंगियों के खिलाफ जंग का एलान कर देती हैं। वो बेहद बहादुरी से अंग्रेजों का मुकाबला करती हैं और उन्हें शिकस्त भी देती हैं। लेकिन अपने ही कुछ गद्दारों की वजह से उन्हें शिकस्त खानी पड़ती है। 1857 की क्रांति में अंग्रेजों के खिलाफ अवध की बेगम हजरत महल के योगदान को नाटक में बखूबी दर्शाया गया।
गंगा-जमुनी तहजीब बनाए रखने की अपील
नाटक के जरिए लखनऊ के लोगों से गंगा-जमुनी तहजीब को बनाए रखने और हिंदू-मुस्लिम भाईचारे की भी अपील की गई। बड़ी संख्या में नाटक देखने पहुंचे लोगों ने इसके जरिए नवाबी दौर की तहजीब, हर कौम में एकता और क्रांति के समय लखनऊ के हालात को महसूस किया। नाटक में नवाब मसूद अब्दुल्लाह ने खुद वाजिद अली शाह की भूमिका निभाई, वहीं नवाब मीर जाफर अब्दुल्ला, सर हेनरी लॉरेंस के किरदार में नजर आए।
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दृश्य भारती की ओर से अमजद अली खां द्वारा लिखित व नवाब मसूद अब्दुल्ला द्वारा निर्देशित नाटक में दिखाया गया कि वफादार सिपहसालार राजा जियालाल, राजा बालकिशन, महमूद अली खां बहादुर से मशविरा कर बेटे को बादशाह बना देती हैं और कानपुर के नाना साहेब और फैजाबाद के मौलवी अहमदउल्ला शाह को साथ लेकर फिरंगियों के खिलाफ जंग का एलान कर देती हैं। वो बेहद बहादुरी से अंग्रेजों का मुकाबला करती हैं और उन्हें शिकस्त भी देती हैं। लेकिन अपने ही कुछ गद्दारों की वजह से उन्हें शिकस्त खानी पड़ती है। 1857 की क्रांति में अंग्रेजों के खिलाफ अवध की बेगम हजरत महल के योगदान को नाटक में बखूबी दर्शाया गया।
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गंगा-जमुनी तहजीब बनाए रखने की अपील
नाटक के जरिए लखनऊ के लोगों से गंगा-जमुनी तहजीब को बनाए रखने और हिंदू-मुस्लिम भाईचारे की भी अपील की गई। बड़ी संख्या में नाटक देखने पहुंचे लोगों ने इसके जरिए नवाबी दौर की तहजीब, हर कौम में एकता और क्रांति के समय लखनऊ के हालात को महसूस किया। नाटक में नवाब मसूद अब्दुल्लाह ने खुद वाजिद अली शाह की भूमिका निभाई, वहीं नवाब मीर जाफर अब्दुल्ला, सर हेनरी लॉरेंस के किरदार में नजर आए।
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