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Lucknow News: नाटक ने आत्ममंथन और सामाजिक चेतना का दिया संदेश
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नाटक ने आत्ममंथन और सामाजिक चेतना का दिया संदेश
लखनऊ। कैसरबाग स्थित राय उमानाथ बली प्रेक्षागृह में बृहस्पतिवार को मंचित नाटक ‘मैं कृष्ण हूं’ ने दर्शकों को सिर्फ धार्मिक आस्था ही नहीं, बल्कि आत्ममंथन और सामाजिक जिम्मेदारी का भी संदेश दिया। वरिष्ठ रंगकर्मी चंद्रभाष सिंह के इस नाटक का आयोजन उत्तर प्रदेश संस्कृति विभाग एवं रंगमंडल स्वर इंडिया एसोसिएशन की ओर से किया गया।
नाटक की शुरुआत कृष्ण के आत्ममंथन से होती है, जहां वे स्वयं यह सवाल उठाते हैं कि मानव ने उन्हें पूजा का विषय तो बना दिया, लेकिन उनके संघर्ष, विचार और जीवन के संदेशों को कहीं पीछे छोड़ दिया। यही सवाल पूरे नाटक की आत्मा बनकर दर्शकों के मन में गूंजता रहा।
इसके बाद कथा कंस की सत्ता-लिप्सा, देवकी-वसुदेव के कारावास और विपरीत परिस्थितियों में कृष्ण जन्म के प्रसंगों से आगे बढ़ती है। गोकुल की गलियों की सहजता और राधा-कृष्ण के आध्यात्मिक प्रेम को भी प्रभावशाली ढंग से मंच पर उतारा गया।
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नाटक का अंतिम दृश्य सबसे अधिक भावनात्मक और प्रभावी बनकर उभरा, जब कृष्ण ने सीधे दर्शकों से संवाद करते हुए कहा कि आज समाज को मंदिरों की मूर्तियों से अधिक ऐसे लोगों की आवश्यकता है, जो अन्याय के खिलाफ निर्भीक होकर खड़े हो सकें। इसी संदेश के साथ नाटक ने दर्शकों को अपने भीतर के ‘कृष्ण’ को पहचानने और जागृत करने की प्रेरणा दी।
जूही कुमारी, नीलम कुमारी, लावण्या बाजपेई, लता बाजपेई, शालू तिवारी, वीना सहगल, हर्षिता श्रीवास्तव, वैष्णवी श्रीवास्तव और मुकुल कुमार समेत कलाकारों ने प्रभावशाली अभिनय से प्रस्तुति को जीवंत बना दिया। वहीं, अनन्या अग्रवाल, अनन्या वर्मा और निवेदिता बनर्जी की आकर्षक नृत्य प्रस्तुतियों ने नाटक की भावनात्मक गहराई को और प्रभावी बनाया। नृत्य निर्देशन डॉ. उपासना दीक्षित ने किया।
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नाटक की शुरुआत कृष्ण के आत्ममंथन से होती है, जहां वे स्वयं यह सवाल उठाते हैं कि मानव ने उन्हें पूजा का विषय तो बना दिया, लेकिन उनके संघर्ष, विचार और जीवन के संदेशों को कहीं पीछे छोड़ दिया। यही सवाल पूरे नाटक की आत्मा बनकर दर्शकों के मन में गूंजता रहा।
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इसके बाद कथा कंस की सत्ता-लिप्सा, देवकी-वसुदेव के कारावास और विपरीत परिस्थितियों में कृष्ण जन्म के प्रसंगों से आगे बढ़ती है। गोकुल की गलियों की सहजता और राधा-कृष्ण के आध्यात्मिक प्रेम को भी प्रभावशाली ढंग से मंच पर उतारा गया।
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नाटक का अंतिम दृश्य सबसे अधिक भावनात्मक और प्रभावी बनकर उभरा, जब कृष्ण ने सीधे दर्शकों से संवाद करते हुए कहा कि आज समाज को मंदिरों की मूर्तियों से अधिक ऐसे लोगों की आवश्यकता है, जो अन्याय के खिलाफ निर्भीक होकर खड़े हो सकें। इसी संदेश के साथ नाटक ने दर्शकों को अपने भीतर के ‘कृष्ण’ को पहचानने और जागृत करने की प्रेरणा दी।
जूही कुमारी, नीलम कुमारी, लावण्या बाजपेई, लता बाजपेई, शालू तिवारी, वीना सहगल, हर्षिता श्रीवास्तव, वैष्णवी श्रीवास्तव और मुकुल कुमार समेत कलाकारों ने प्रभावशाली अभिनय से प्रस्तुति को जीवंत बना दिया। वहीं, अनन्या अग्रवाल, अनन्या वर्मा और निवेदिता बनर्जी की आकर्षक नृत्य प्रस्तुतियों ने नाटक की भावनात्मक गहराई को और प्रभावी बनाया। नृत्य निर्देशन डॉ. उपासना दीक्षित ने किया।

नाटक ने आत्ममंथन और सामाजिक चेतना का दिया संदेश

नाटक ने आत्ममंथन और सामाजिक चेतना का दिया संदेश

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नाटक ने आत्ममंथन और सामाजिक चेतना का दिया संदेश

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