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फेंके गए बच्चों में 67 प्रतिशत बेटियां, यहां पढ़ें- चौंकाने वाले आंकड़े

Mon, 12 Oct 2020 03:46 PM IST
पंकज श्रीवास्‍तव न्यूज डेस्क/अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क/अमर उजाला, लखनऊ Published by: पंकज श्रीवास्‍तव Updated Mon, 12 Oct 2020 03:46 PM IST
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The number of newborn babies being thrown is increasing every year, in which 67 percent are daughters
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला
बच्चों का फेंका जाना किसी भी समाज के लिए एक बड़ी समस्या है, लेकिन फेंके गए बच्चों में 67 फीसदी बेटियाें का होना इस समस्या को और भी गंभीर बना रहा है। आंकड़ों पर गौर करें तो हर साल फेंके जाने वाले नवजातों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। आलम यह है कि लोग बच्चों को किसी अनाथाश्रम में डालने के बजाय सड़क किनारे, झाड़ियों में मरने के लिए फेंक रहे हैं।
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वहीं फेंके गए बच्चों में 67 फीसदी बेटियों की संख्या उनके प्रति समाज के भेदभावपूर्ण और अधिक असंवेदनशील चेहरे को दिखाती है। सवाल यह है कि इस तरह बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ का संकल्प कैसे पूरा होगा। समाजशास्त्री व सामाजिक संगठनों का कहना है कि बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ जागरूकता अभियान को अधिक सार्थक बनाए जाने की जरूरत है।
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फेंके जाने वाले बच्चों की संख्या बढ़ी

The number of newborn babies being thrown is increasing every year, in which 67 percent are daughters
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला
चाइल्डलाइन के सलाहकार कृष्ण प्रताप सिंह बताते हैं कि 2007 से 2020 के वर्षों में लगातार फेंके जाने वाले बच्चों की संख्या बढ़ी है। यानी जितना अधिक जागरूकता का प्रचार-प्रसार हुआ है, उतने अधिक मामले भी दर्ज हुए हैं। 2008 में कुल 20 नवजात फेंके गए, जिसमें 17 बेटियां थीं। इसी तरह 2020 की अब तक की अवधि में सात नवजात फेंके गए हैं, जिनमें से छह लड़कियां हैं। 14 वर्षों का आंकड़ा देखें तो कुल 175 बच्चे कहीं सड़क तो कहीं झाड़ियों पर फेंके मिले। इनमें बेटों की संख्या 58 है, जबकि बेटियों की संख्या 117 है।

फेंके गए नवजात
वर्ष    बेटे    बेटियां    कुल  
2007    05    06    11
2008    03    17    20
2009    09    11    20
2010    05    11    16
2011    01    06    07
2012    05    03    08
2013    03    10    13
2014    06    10    16
2015    03    06    09    
2016    02    10    12
2017    03    05    08
2018    04    07    11
2019    08    09    17
2020    01    06    07   
कुल    58    117    175
 

दिखाई नहीं दे रहे जमीनी काम

The number of newborn babies being thrown is increasing every year, in which 67 percent are daughters
डॉ विशेष गुप्ता, प्रो. सुप्रिया सिंह - फोटो : अमर उजाला
राज्य बाल अधिकार आयोग के अध्यक्ष डॉ. विशेष गुप्ता कहते हैं कि सरकार अपने स्तर पर काम कर ही रही है। अब एनजीओ को आगे आना होगा और जमीनी स्तर पर काम करना होगा। इसके अलावा दत्तक ग्रहण के नियमों को शिथिल करना होगा, ताकि बेटियों को गोद लेने वाले आगे आ सकें।

नहीं खत्म हो रहा बेटा-बेटी में फर्क
समाजशास्त्री प्रो. सुप्रिया सिंह कहती है कि समाजीकरण सबसे बड़ी समस्या है। आज भी पालन-पोषण में बेटा-बेटी का फर्क दिखता है। कभी लड़कों को यह नहीं सिखाया जाता कि बाहर निकलने पर टीका-टिप्पणी नहीं करते, बल्कि लड़कियों को यह बताया जाता है कि ऐसा करना है, ऐसा नहीं। कुल मिलाकर बढ़ती लड़की को खुले दिल से समाज स्वीकार नहीं कर पाता है। फेंके जाने वाली बेटियों की बढ़ती संख्या इसी का नतीजा है।
 
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